# कथा - पुराण > शास्त्र पुराणों की कथा संस्कृत में हिन्दी भाव सहित ## Posts - [स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है - Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai](https://katha.karmkandsikhen.in/kalyug-kyu-shreshth-hai/): स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों - Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai : आत्मकल्याण करने के लिये ही सभी को मानव शरीर की प्राप्ति होती है जिसमें द्विजाति को बड़े ही क्लेश होते हैं। किन्तु स्त्री और शूद्रों को आत्मकल्याण के लिये अधिक श्रम/क्लेश करने की आवश्यकता नहीं होती है, स्त्री पति की सेवा मात्र से और शूद्र द्विजों की सेवा मात्र से आत्मकल्याण के अधिकारी हो जाते हैं एवं इसी कारण धन्य कहे गये हैं। इसके साथ ही सतयुग, त्रेता, द्वापर इन तीनों युगों की तुलना में कलयुग में बहुत ही अल्प प्रयास मात्र नाम संकीर्तन से ही आत्मकल्याण हो जाता है इसलिये अन्य सभी युगों की तुलना में कलयुग श्रेष्ठ होता है। - [पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - Padmini ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-padmini-ekadas/): पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - Padmini ekadashi vrat katha : अधिकमास में प्रथम पक्ष शुक्ल होता है और द्वितीय पक्ष कृष्ण होता है। अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी एकादशी है। पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा में मुख्य रूप से एकादशी व्रत का माहात्म्य तो बताया ही गया है साथ ही एकादशी व्रत की विधि भी बताई गयी है। इस कथा में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के जन्म की भी कथा है। - [देवोत्थान एकादशी व्रत कथा - Devotthana ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/devotthana-ekadashi-vrat-katha/): देवोत्थान एकादशी व्रत कथा - Devotthana ekadashi vrat katha : कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवोत्थान एकादशी है, प्रबोधिनी एकादशी भी एक अन्य नाम है। इस एकादशी को भगवान विष्णु का जागरण होता है। ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को इसकी कथा सुनाई है जिसका वर्णन स्कंदपुराण में है। इस कथा में एकादशी का माहात्म्य, तुलसी माहात्म्य, कार्तिक माह और चातुर्मास में भगवान विष्णु की पूजा माहात्म्य आदि भी बताया गया है। - [रमा एकादशी व्रत कथा - Rama ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/rama-ekadashi-vrat-katha/): रमा एकादशी व्रत कथा - Rama ekadashi vrat katha : इसमें महाराज मुचुकुन्द की पुत्री चंद्रभागा और उसके पति शोभन की कथा है। शोभन अतिदुर्बल था जो एक बार ससुराल गया जहां मनुष्यों की बात तो दूर पशुओं को भी एकादशी के दिन भोजन नहीं दिया जाता था। दुर्बल शोभन एकादशी करते हुये दिवंगत हो गया और एकादशी व्रत के प्रभाव से उसे दिव्यलोक की प्राप्ति हुई जो अस्थिर था। पुनः चंद्रभागा ने जब जाना तो अपने व्रत के प्रभाव से उस अस्थिर पुर को स्थिर कर दिया। - [पापांकुशा एकादशी व्रत कथा - Papankusha ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/papankusha-ekadashi-vrat-katha/): पापांकुशा एकादशी व्रत कथा - Papankusha ekadashi vrat katha : आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। पापों के लिये यह एकादशी अंकुश के सामान है इसीलिये इसका नाम पापांकुशा एकादशी है। मनुष्य जब तक पापांकुशा एकादशी नहीं करता है तब तक उसके शरीर का पाप नष्ट नहीं होता। इस एकादशी के प्रभाव से मनोकामना की पूर्ति होती है एवं स्वर्ग/मोक्ष के द्वार भी खुल जाते हैं। - [इंदिरा एकादशी व्रत कथा - Indira ekadashi vrat katha in hindi](https://katha.karmkandsikhen.in/indira-ekadashi-vrat-katha/): इंदिरा एकादशी व्रत कथा - Indira ekadashi vrat katha in hindi : आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने कथा कहते हुये महिष्मति पूरी के राजा इन्द्रसेन के द्वारा इंदिरा एकादशी व्रत करने से उसके पिता के सद्गति होने का माहात्म्य बताया। - [जयंती एकादशी व्रत कथा - Jayanti ekadashi vrat katha in hindi](https://katha.karmkandsikhen.in/jayanti-ekadashi-vrat-katha/): जयंती एकादशी व्रत कथा - Jayanti ekadashi vrat katha in hindi : कथा के अनुसार राजा बलि से वामन भगवान ने इसी दिन तीन पग भूमि में सब-कुछ लेकर उसे पाताल लोक भेजकर सदा उसके पास रहने का वचन दिया था। भगवान विष्णु एक रूप से क्षीरसागर में और दूसरे रूप से पाताल में राजा बलि के यहां भी निवास करते हैं। - [अजा एकादशी व्रत कथा - aja ekadashi katha in hindi](https://katha.karmkandsikhen.in/aja-ekadashi-katha/): अजा एकादशी व्रत कथा - aja ekadashi katha in hindi : भाद्रपद के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम अजा एकादशी है। युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने कथा में बताया कि यह एकादशी सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से संबंधित है। जब सत्यवादी हरिश्चंद्र के ऊपर दुखों का पहाड़ टूटा था तो उन्हें अपनी पत्नी और स्वयं तक को भी बेचना पड़ा था। सौभाग्य से गौतम मुनि का समागम हुआ और उन्होंने अजा एकादशी व्रत का उपदेश दिया जिसके प्रभाव से सत्यवादी हरिश्चंद्र के समस्त दुःख समाप्त हो गये। - [पुत्रदा एकादशी व्रत कथा, श्रावण शुक्ल - Putrada ekadashi vrat katha in hindi](https://katha.karmkandsikhen.in/putrada-ekadashi-vrat-katha-2/): पुत्रदा एकादशी व्रत कथा, श्रावण शुक्ल - Putrada ekadashi vrat katha in hindi : श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के पूछने पर महिष्मति पुरी के राजा महीजित की कथा सुनाई जो अपुत्र थे। लोमश ऋषि के उपदेश से प्रजा सहित उन्होंने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जिससे उनको पुत्र की प्राप्ति हुयी और इसी कारण इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। - [कामिका एकादशी व्रत कथा - kamika ekadashi vrat katha in hindi](https://katha.karmkandsikhen.in/kamika-ekadashi-vrat-katha/): कामिका एकादशी व्रत कथा - kamika ekadashi vrat katha in hindi : श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस एकादशी की कथा में विशेषतः एकादशी व्रत का माहात्म्य वर्णित है जिसको सुनने मात्र से भी वाजपेय यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। ब्रह्महत्या – गर्भहत्या जैसे जघन्य पाप भी इस एकादशी के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा में भगवान विष्णु को तुलसी अतिप्रिय है यह भी बताया गया है। - [देवशयनी एकादशी व्रत कथा - Devshayani ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/devshayani-ekadashi-vrat-katha/): देवशयनी एकादशी व्रत कथा - Devshayani ekadashi vrat katha : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी है। इसका एक अन्य नाम पद्मा एकादशी भी है। इसमें राजा मान्धाता की कथा है जिसमें एक बार उनके राज्य में वर्षा बंद होने से अकाल हो गया और प्रजासहित अंगिरा मुनि के उपदेश से देवशयनी एकादशी का व्रत किया जिससे वर्षा हुई और अकाल का निवारण हो गया। - [योगिनी एकादशी व्रत कथा - Yogini ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/yogini-ekadashi-vrat-katha/): योगिनी एकादशी व्रत कथा - Yogini ekadashi vrat katha : योगिनी एकादशी की कथा में हेममाली नामक यक्ष की कथा है जो कुबेर का माली था। एक दिन कुबेर भगवान शिव की पूजा कर रहा था किन्तु यह पुष्प लेकर उपास्थित न हुआ जिसके कारण कुबेर ने इसे कुष्ठ और पत्नी वियोग का श्राप दे दिया। कालक्रम से योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से हेममाली शापमुक्त होता है। - [निर्जला एकादशी व्रत कथा - Nirjala ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/nirjala-ekadashi-vrat-katha/): निर्जला एकादशी व्रत कथा - Nirjala ekadashi vrat katha : ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष की एकादशी का निर्जल उपवास करने से सारे पाप धुल जाते हैं और मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है, जो वर्षपर्यंत एकादशी करने में अक्षम हो वह इस एक निर्जला एकादशी व्रत करने से भी सभी एकादशी का फल प्राप्त कर लेता है। इस व्रत से सभी तीर्थों और दानों का फल मिलता है। - [अपरा एकादशी व्रत कथा - Apara ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/apara-ekadashi-vrat-katha/): अपरा एकादशी व्रत कथा - Apara ekadashi vrat katha : - [मोहिनी एकादशी व्रत कथा - Mohini ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/mohini-ekadashi-vrat-katha/): मोहिनी एकादशी व्रत कथा - Mohini ekadashi vrat katha : श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को वैशाख शुक्लपक्ष की एकादशी का महत्व बताया, जिसे मोहिनी एकादशी कहा जाता है। मोहिनी एकादशी का व्रत ऐसा है जो हर पाप का मिटा देता है। युधिष्टिर ने श्री कृष्ण से इसकी महिमा पूछी और उन्होंने राम और वशिष्ठ की कथा सुनाई। धृष्टबुद्धि जैसे पापी भी इस व्रत के प्रभाव से अपने पापों से छुटकारा पा सकते हैं तो सामान्य मनुष्यों की बात ही क्या है। - [वरुथिनी एकादशी व्रत कथा - Varuthini ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/varuthini-ekadashi-vrat-katha/): वरुथिनी एकादशी व्रत कथा - Varuthini ekadashi vrat katha : वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम वरूथिनी एकादशी है। इस एकादशी की कथा में एकादशी व्रत की विशेष विधियों और नियमों का वर्णन किया गया है। यह एकादशी पुनर्जन्म के दुःख से मुक्ति प्रदान करती है। राजा मान्धाता, धुन्धुमार इसी व्रत के प्रभाव से स्वर्ग गये। भगवान शंकर भी इसी व्रत को करके ब्रह्मकपाल से मुक्त हुये। - [कामदा एकादशी व्रत कथा - Kamada ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/kamada-ekadashi-vrat-katha/): कामदा एकादशी व्रत कथा - Kamada ekadashi vrat katha : कामदा एकादशी चैत्रमास के शुक्ल पक्ष में होती है। यह एकादशी भी सभी प्रकार के पापों से मुक्त करती है। विभिन्न प्रकार के श्राप, नजर आदि दोषों के निवारण हेतु कामदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। - [पापमोचनी एकादशी व्रत कथा - Papmochani ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/papmochani-ekadashi-vrat-katha/): पापमोचनी एकादशी व्रत कथा - Papmochani ekadashi vrat katha : कथा के अनुसार कुबेर के चैत्ररथ वन में च्यवन मुनि का आश्रम था जहाँ उनके पुत्र मेधावी मुनि भी तपस्या करते थे। उस वन में विहार करने के लिए इंद्र भी आया करते थे। एक बार उनके साथ आयी अप्सरा मंजुघोषा मेधावी मुनि पर मोहित हो गयी और उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करने लगी जिसमें कामदेव ने भी शंकर भगवान से वैर को याद करके उसका साथ दिया। - [आमलकी एकादशी व्रत कथा - Amalaki ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/amalaki-ekadashi-vrat-katha/): आमलकी एकादशी व्रत कथा - Amalaki ekadashi vrat katha : एक व्याधे ने भगवान की पूजा, कथा होते देखा-सुना, आहाररहित रहते हुये रात्रिजागरण भी कर लिया जिसके फलस्वरूप अगले जन्म में वह भी राजा बना और एक बार जब म्लेच्छों से घिर गया था तब एकादशी देवी ने प्रकट होकर म्लेच्छों का नाश किया। - [विजया एकादशी व्रत कथा - Vijaya ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/vijaya-ekadashi-vrat-katha/): विजया एकादशी व्रत कथा - Vijaya ekadashi vrat katha : कथा के अनुसार जब सीताहरण के बाद सेना के साथ लंका विजय करने के लिए भगवान श्रीराम समुद्रतट पर पहुंचे तो अथाह समुद्र को देखकर विचलित हो गये। भाई लक्ष्मण के बताने पर निकट में स्थित वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम पर गए तो उन्होंने विजया एकादशी व्रत करने का उपदेश दिया। भगवान श्रीराम ने मुनि की बताई विधि के अनुसार विजया एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से लंका विजय करके पुनः सीता और लक्ष्मण सही अयोध्या नगरी में वापस आये। - [जया एकादशी व्रत कथा - Jaya ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/jaya-ekadashi-vrat-katha/): जया एकादशी व्रत कथा - Jaya ekadashi vrat katha : माघ शुक्ला एकादशी, जिसे जया कहा जाता है, पापों को नष्ट करने वाली है। इस दिन व्रत करने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। वासुदेव की कृपा से यह एकादशी भक्तों को मोक्ष और स्वर्गलोक का सुख देती है। - [षट्तिला एकादशी व्रत कथा - Shattila ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/shattila-ekadashi-vrat-katha/): षट्तिला एकादशी व्रत कथा - Shattila ekadashi vrat katha : माघ महीने की षट्तिला एकादशी पर विशेष पूजा और तिल का दान करते हुए पापों का नाश किया जा सकता है। इसमें स्नान, उपवास और भगवान कृष्ण का स्मरण आदि करना चाहिये। पाठ में एक ब्राह्मणी की कथा भी है, जिसने कठिन व्रतों से स्वर्ग प्राप्त किया किन्तु अन्नदान नहीं करने के कारण उसके घर में धन और अन्न की कमी थी। अंततः उसने षट्तिला एकादशी का व्रत किया, जिससे उसे समृद्धि प्राप्त हुई। - [पुत्रदा एकादशी व्रत कथा - Putrada ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/putrada-ekadashi-vrat-katha/): पुत्रदा एकादशी व्रत कथा - Putrada ekadashi vrat katha : पुत्रदा एकादशी की कथा में राजा सुकेतुमान पुत्रहीनता से दुखी था, लेकिन इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। मुनियों की कृपा से राजा ने यह व्रत किया और सफलतापूर्वक एक तेजस्वी पुत्र पाया। यह व्रत न केवल इस लोक में पुत्र देता है, बल्कि मृत्यु के उपरांत स्वर्ग में भी स्थान दिलाता है। - [सफला एकादशी व्रत कथा - Safala ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/safala-ekadashi-vrat-katha/): सफला एकादशी व्रत कथा - Safala ekadashi vrat katha : पौष कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम 'सफला एकादशी' है। इस दिन नारायण का पूजन करनी चाहिए और अच्छे ऋतु-फलों से भगवान का पूजन करना चाहिए; स्वच्छ नारियल, बिजौरे, जम्बीरी, अनार, सुपारी आदि से विधिपूर्वक पूजन करें। व्रत वाले दिन दीपदान करने और जागरण करने का भी विशेष महत्व है। - [मोक्षदा एकादशी व्रत कथा - Mokshada ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/mokshada-ekadashi-vrat-katha/): मोक्षदा एकादशी व्रत कथा - Mokshada ekadashi vrat katha : मोक्षदा एकादशी व्रत की कथा राजा वैखानस से संबंधित है जिसमें राजा वैखानस अपने पिता के नरक में कष्ट भोगते देख कर मोक्ष के उपाय ढूंढते हैं। उन्हें मुनि का आशीर्वाद मिलता है, जो मोक्षदा एकादशी करने का सुझाव देते हैं। राजा वैखानस ने इस व्रत को विधिपूर्वक किया और भगवान विष्णु की उपासना की, जिसके बाद उन्होंने अपने पिता को स्वर्ग में स्थान प्राप्त करते देखा। - [उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा - utpanna ekadashi vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/utpanna-ekadashi-vrat-katha/): मार्गकृष्ण उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा - utpanna ekadashi vrat katha in hindi : हेमन्त ऋतु के मार्गशीर्ष माह में कृष्णपक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। दशमी की शाम दातुन करें और रात को भोजन न करें। एकादशी को सुबह संकल्पपूर्वक कार्य करें और स्नान करें। स्नान के बाद चंदन का तिलक लगाएं। भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें। रात्रि में जागरण करते हुए श्री हरि का नाम जप करें। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-29/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29 - क्या आप जानते हैं कि पीपल के पेड़ की पूजा केवल शनिवार को क्यों होती है? ऋषियों के सवाल पर सूतजी ने एक रोचक कथा सुनाई। सूतजी ऋषियों को बताते हैं कि पीपल की पूजा का मूल कारण अलक्ष्मी और लक्ष्मी के बीच का संबंध है। लक्ष्मी जी और उनकी कुरूप बहन अलक्ष्मी के इस विवाह संबंधी जटिलता में दो बातें छिपी हैं: पारिवारिक सम्मान और अलक्ष्मी की रहन-सहन की इच्छा। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-28/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 - प्राचीनकाल में भगवान शिव तथा माता पार्वती विहार कर रहे थे। उस समय उनके विहार में विघ्न उपस्थित करने के उद्देश्य से अग्निदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। विहार के आनन्द में विघ्न उपस्थित हो जाने के कारण कुपित होकर माता पार्वती ने सभी देवताओं को शाप दे दिया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 27 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-2-2/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 27 - भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेतपति धनेश्वर को नरकों का अनुभव कराने के बाद बताया कि इन नरकों में पापियों को कठोर दंड मिलता है, जैसे तप्तबालुक, अन्धतामिस्र, और कुम्भीपाक। जो लोग भूखों की सहायता नहीं करते या गरिमामयी वस्तुओं का अपमान करते हैं, वे इन नरकों में सज़ा के लिए जाते हैं। अंत में, धनेश्वर को यक्षलोक ले जाकर राजा बनाया गया, और उसके नाम पर तीर्थ बना, जिसे पुण्य स्थान माना गया। कार्तिक मास का व्रत मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-26/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 - उसी समय नारदजी आए और कहा कि धनेश्वर ने पुण्यात्माओं के दर्शन-संभाषण-स्पर्श आदि संसर्ग से पुण्य प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि धनेश्वर के पाप नष्ट हो चुके हैं क्योंकि यह पुण्य कर्म करने वाले लोगों के संपर्क में रहा है। इसके बाद यमराज ने धनेश्वर को नरक दिखाने की आज्ञा दी। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 25 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-25/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 25 - सतयुग में देश, त्रेता में ग्राम तथा द्वापर में कुलों को दिया पुण्य या पाप मिलता था, लेकिन कलियुग में कर्त्ता को ही भोगना पड़ता है। संसर्ग से पाप व पुण्य दूसरे को मिलते हैं। मैथुन में एकत्र होना और एक साथ भोजन करने से पाप-पुण्य का फल मिलता है। जो पंक्ति में बैठे हुए भोजन करने वालों की पत्तल लांघता है, वह अपने पुण्य का भाग देता है। बिना ऋण उतारे मृत्यु को प्राप्त होने पर ऋण देने वाले पुण्य के भागी होते हैं। इस प्रकार दूसरों के लिए पुण्य या पाप बिना दिए भी मिल सकते हैं, किन्तु यह नियम कलियुग में लागू नहीं होते। कलियुग में तो कर्त्ता को ही अपने पाप व पुण्य भोगने पड़ते हैं। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 24 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-24/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 24 - ब्रह्मा ने यज्ञ करने का निर्णय लिया था और उस वक्त त्वरा और गायत्री के बीच विवाद हुआ। यज्ञ के समय त्वरा ने गायत्री को अपनी जगह बैठाने पर शाप दिया, कि सब देवता नदियां बन जाएंगे और गायत्री ने त्वरा को भी नदी बनने का श्राप दे दिया। इस पर देवता परेशान हुए और उनकी अनुपस्थिति के कारण यज्ञ में विघ्न आ गया। अंत में, सब देवता अपने अंशों से नदियाँ बने, जिसमें कृष्णा और वेणी शामिल हैं। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 23 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-23/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 23 - इस कथा में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय की उत्पत्ति और उनके चरित्र का वर्णन है। ये दोनों ब्रह्मन ऋषि कर्दम के पुत्र थे, जो भगवान विष्णु की अनंत भक्ति में लीन रहते थे। यज्ञ में भाग लेने के दौरान धन के वितरण में उनके बीच विवाद हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने एक-दूसरे को शाप दिया। भगवान विष्णु ने उनके दिए गए शापों को भोगने के बाद उन्हें उद्धार कर वैकुण्ठधाम पहुँचाया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-22/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 - एक दिन विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के बाद भोजन बनाया, किन्तु कोई उसे चुरा ले गया। उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि पूजा का समय छूट जाता। अगले दिन भी भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने जाते समय भोजन फिर चुराया गया। इस क्रम में सात दिन बीत गये। विष्णुदास सोचने लगे - कौन ऐसा कर रहा है? उन्होंने रसोई की रक्षा करने का निश्चय किया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-21/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - विष्णु पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा - सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की विधिपूर्वक आराधना करते हैं। इनमें कौन-सा साधन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, यह जानने के लिए पार्षदों ने पूर्वजन्म की कथा सुनाने लगे। उन्होंने बताया कि कांचीपुरी में चोल नामक एक राजा हुए थे, जिनके शासन में कोई दरिद्र या दुःखी नहीं था। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 20 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-20/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 20 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें साधुवाद है, क्योंकि तुम सदैव भगवान विष्णु के भजन में तत्पर रहते हो और दीनों पर दया करते हो। आपने जो कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उसके आधे भाग का दान देने से आपको दूना पुण्य प्राप्त हुआ है और सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो गये हैं। इसके (कलहा) भी सैकड़ों जन्म के पाप समाप्त हो गये हैं, और अब यह दिव्य विमान के साथ वैकुण्ठधाम में जायेगी। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 19 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-19/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 19 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - सह्य पर्वत पर धर्मदत्त नामक एक धर्मज्ञ ब्राह्मण रहते थे। एक दिन कार्तिक मास में भगवान विष्णु के समीप जागरण करने के लिए वे भगवान के मंदिर की ओर चले। मार्ग में एक भयंकर राक्षसी आई। उसके बड़े दांत और लाल नेत्र देखकर ब्राह्मण भय से थर्रा उठे। उन्होंने पूजा की सामग्री से उस राक्षसी पर प्रहार किया। हरिनाम का स्मरण करके तुलसीदल मिश्रित जल से उसे मारा, इसलिए उसका सारा पातक नष्ट हो गया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 18 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-18/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 18 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 17 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-17/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 17 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - जलंधर युद्धभूमि में भगवान शिव की शक्ति से प्रभावित होकर माया का उपयोग करता है और मायागौरी का निर्माण करता है। भगवान शिव पार्वती की पीड़ा देख व्याकुल हो जाते हैं, किन्तु विष्णु के समझाने पर माया का निवारण हो जाता है। शिवजी की रौद्र अवस्था से दैत्य भाग जाते हैं। अंत में, जलंधर का विनाश होता है और देवताओं की प्रसन्नता होती है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 16 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-16/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 16 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में : इस अध्याय की कथा में दो मुख्य बिन्दु है : प्रथम यह कि पातिव्रत्य धर्म की महत्ता। द्वितीय यह कि छल/असत्य आदि के माध्यम से प्रहार करने वाले के लिये उसी प्रकार से प्रत्युत्तर देना चाहिये। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-15/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में - वीरभद्र को भूमि पर गिरा देख शिवगणों में हाहाकार मच गया और वो वहां चले गये जहां भगवान शंकर थे। तब स्वयं भगवान शंकर युद्ध करने आये एवं जलंधर के साथ उनका युद्ध होने लगा, जब जलंधर को प्रतीत हुआ कि भगवान शिव अजेय हैं तो उसने माया का प्रयोग किया और सभी अचेत से हो गये - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-14/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में - कार्तिक माहात्म्य के चौदहवें अध्याय में नंदीश्वर, गणेश और कार्तिकेय इन तीनों के साथ कालनेमि, शुम्भ और निशुंभ के युद्ध का वर्णन है। जब दैत्यसेना पीड़ित होने लगी तब स्वयं जलंधर युद्ध करने आ गया। जलंधर ने वीरभद्र के मस्तक पर परिघ से प्रहार किया जिससे वह छिन्नमस्तक होकर रुधिर वमन करता हुआ भूमि पर गिर गया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-13/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 - इस कथा का एक अन्य आशय भी है वो यह है कि यदि आप धर्म का पालन करते भी हैं किन्तु देवताओं को अप्रसन्न कर रखा है तो वो असंतुष्ट देवता आपके विनाश का कारण बनते हैं। जलंधर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता था, रावण-कंस आदि की भांति न तो दुराचारी था न ही आततायी। फिर भी नारद जी ने देवताओं का हित साधने हेतु उस कर्म के लिये प्रेरित किया जो उसके विनाश का कारण बना। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 12 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-12/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 12 - जलंधर कामपीड़ित हो जाता है और पार्वती को प्राप्त करने के लिए राहु को शिव के पास भेजता है। शिव का रौद्र पुरुष राहु को रोकता है, जबकि राहु शिव की शरण लेकर रक्षा की प्रार्थना करता है। शिव उसे छोड़ने का आदेश देते हैं। रौद्र पुरुष को अंत में शिव द्वारा अपना द्वारपाल बनाया जाता है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 11 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-11/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 11 - जलंधर भगवान विष्णु से लक्ष्मी और गणों सहित अपने निवास पर रहने का वर मांगता है, जो विष्णु स्वीकार कर लेते हैं। तत्पश्चात जलंधर त्रिभुवन पर शासन करता है, देव-दानव-यक्ष-गन्धर्व आदि सभी उसके वशवर्ती हो जाते हैं,देवताओं के सभी रत्नादि पर भी जलंधर का अधिकार हो जाता है। जलंधर प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करता है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 10 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-10/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 10 - वृंदा से विवाहित जलंधर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था, एक बार संयोग से उसे राहु का कटा सिर दिखा जिसके बारे में उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से प्रश्न किया तो शुक्राचार्य ने समुद्रमंथन से अमृत-रत्नादि निकलने से लेकर अमृतपान करने वाले राहु का भगवान विष्णु द्वारा सिर कटने की पूरी कथा बताई, जिसे सुनकर जलंधर अत्यंत क्रुद्ध हुआ और दैत्यों की सेना जुटाकर देवताओं से युद्ध करने लगा। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 9 मूल संस्कृत में](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-9/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 9 - जब इन्द्र और बृहस्पति भगवान शंकर के दर्शन के लिए गए, तो शंकर जी ने उनकी परीक्षा लेने हेतु जटाधारी रूप धारण किया। इन्द्र के अहंकार के कारण भगवान शिव से वाद-विवाद हुआ, भगवान शिव के नेत्रों से जो क्रोध निकला, उसे समुद्र में फेंक दिया, जिसके परिणामस्वरूप रुदन करता एक बालक उत्पन्न हुआ जिसे जलंधर कहा गया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 मूल संस्कृत में और हिन्दी अर्थ सहित](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-8/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 - कार्तिक व्रत की पूर्णता उसके उद्यापन से होती है, जो विशिष्ट विधियों द्वारा सम्पन्न होता है। कार्तिक माह के आठवें अध्याय में नारद मुनि महाराज पृथु को बताते हैं कि उद्यापन के लिए तुलसी के आसपास सुंदर मंडप बनाकर भगवान विष्णु और उनके द्वारपालों की मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। उपवास, गीत-संगीत और व्रत की नियमित विधियों के पालन से पापों का नाश और विष्णु लोक की प्राप्ति संभव है। उद्यापन से व्रतकर्ता को भगवान की कृपा मिलती है और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 7](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-7/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 7 : कार्तिक और माघादि मासव्रत करने वालों के लिये कुछ विशेष नियम बताये गये हैं और अन्य सभी व्रतों में भी इनका पालन करना आवश्यक होता है। इस प्रकार कार्तिक माहात्म्य के सातवें अध्याय में मुख्य रूप से नियमों की चर्चा - कर्तव्य और अकर्तव्य, विहित और निषिद्ध, ग्राह्य और त्याज्य आदि की चर्चा की गयी है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-6/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6 : कार्तिक, माघ आदि मासों में प्रातः स्नान मुख्य कर्म होता है, कार्तिक माहात्म्य के छठे अध्याय में मुख्य रूप से स्नान की विधि बताई गयी है। घर, जलाशय आदि में स्नान करने संबंधी फलों का उल्लेख संगम/तीर्थों में स्नान के फल को अनंत बताया गया है। स्नानोपरांत तर्पण करने का निर्देश भी दिया गया है जो महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु की पूजा तो करे ही साथ ही ब्राह्मण की पूजा भी करे ऐसा भी बताया गया है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-5/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 : इसमें नित्यकर्म अर्थात शौच, शुद्धि आदि के विधान का उल्लेख करते हुये विष्णु-शिव आदि की पूजा करने, भजन-कीर्तन-नृत्य आदि का विधान बताया गया है। देवताओं के लिये वर्जित पुष्पों का भी इस आलेख में वर्णन किया गया है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-4/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4 : देवताओं का दुःख सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें शंखचूड़ वध करने का आश्वासन/वर दिया और मत्स्यावतार ग्रहण करके कश्यप ऋषि के अंजलि वाले जल में प्रकट हुये और बढ़ने लगे, महर्षि कश्यप ने उन्हें क्रमशः कमंडल,कूप, तालाब, समुद्र में रखा। फिर भगवान ने शंखचूड़ का वध करके वेद लिया। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 : Kartik Mahatmya](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-3/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 : Kartik Mahatmya - कार्तिक मास में व्रत करने वालों को सब प्रकार से धन, पुत्र-पुत्री आदि देते रहना और उनकी सभी आपत्तियों से रक्षा करना। हे धनपति कुबेर! मेरी आज्ञा के अनुसार तुम उनके धन-धान्य की वृद्धि करना क्योंकि इस प्रकार का आचरण करने वाला मनुष्य मेरा रूप धारण कर के जीवनमुक्त हो जाता है। - [कार्तिक माहात्म्य द्वितीयोध्यायः - Kartik Mahatmya Adhyay 2](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-2/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 2 - Kartik Mahatmya Adhyay 2 : सत्यभामा पति की मृत्यु हो गयी तो शोकाकुल होने पर भी उसने धैर्य धारण किया और पति की अंतिम क्रिया करने के उपरांत आजीवन दो विशेष व्रतों का पालन करती रही एक एकादशी और दूसरी कार्तिक। दूसरे अध्याय की कथा में यह स्पष्ट हो जाता है कि कार्तिक मास भी एक व्रत ही है। - [कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1 - Kartik mahatmya](https://katha.karmkandsikhen.in/kartik-mahatmya-1/): कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1 - Kartik mahatmya : एकदास्वर्गलोकाद्वैनारदोद्वारिकांगतः ॥ दिदृक्षयाभगवतोदेवदेवस्य वेधसः ॥१॥ दृष्ट्वाकृष्णंततः पूजांकृत्वाभक्तिसमन्वितः॥ पारिजातस्यपुष्पैकं ददौभगवतेतदा ॥२॥ कृष्णोर्पितद्गृहीत्वातु रुक्मिण्यैदत्तवांस्तदा ॥ एतस्मिन्नंतरेचैव नारदोमुनिसत्तमः ॥३॥ - [ऋषि पंचमी व्रत कथा](https://katha.karmkandsikhen.in/hrishi-panchami/): ऋषि पंचमी व्रत कथा : भाद्र शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी कहा जाता है। इस दिन व्रत पूर्वक अरुंधतिसहित सप्तर्षियों का पूजन करना चाहिये। पूजा करने के उपरांत कथा श्रवण करे और फिर विसर्जन दक्षिणा करे। इस व्रत का माहात्म्य चकित करने वाला है क्योंकि यह व्रत प्रायश्चित्तात्मक है। स्त्रियां जो रजस्वला संबंधी स्पर्शास्पर्श नियमादि का उल्लंघन करती हैं चाहे ज्ञात रूप से हो अथवा अज्ञात रूप से ऋषि पंचमी के प्रभाव से उस दोष का शमन हो जाता है। - [जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - Jitiya Vrat Katha](https://katha.karmkandsikhen.in/jitiya-vrat-katha/): जीवित्पुत्रिका व्रत कथा : स्त्रियां पुत्र और पति की दीर्घायु कामना से जितिया का कठिन व्रत किया करती हैं। यह व्रत इतना कठिन होता है कि सामान्य व्रतों की तुलना में अधिक काल तक उपवास करना पड़ता है और उसमें भी बड़ी बात है कि जल आदि का ग्रहण करना भी निषिद्ध होता है। - [अनन्त व्रत कथा - Anant Vrat Katha 1 Chap.](https://katha.karmkandsikhen.in/anant-puja-katha/): अनन्त व्रत कथा : भाद्र शुक्ल चतुर्दशी को अनंत व्रत - पूजा की जाती है और कथा श्रवण करके अनंत धारण किया जाता है। बात जब कथा श्रवण की आती है तो देववाणी अर्थात संस्कृत का विशेष महत्व व फल होता है। - [महालक्ष्मी व्रत कथा - Mahalaxmi Vrat Katha](https://katha.karmkandsikhen.in/mahalaxmi-vrat-katha/): महालक्ष्मी व्रत कथा - Mahalaxmi Vrat Katha : पूजा करने के बाद प्रतिदिन कथा भी श्रवण करनी चाहिये। कथा श्रवण के विषय में जो महत्वपूर्ण तथ्य है वो यह है कि हिन्दी आदि अन्य स्थानीय भाषाओं में भाव समझने के लिये तो सुना जा सकता है किन्तु फलदायकता हेतु संस्कृत में ही श्रवण करनी चाहिये। - [सिद्धिविनायक व्रत कथा - Siddhivinayak Vrat Katha](https://katha.karmkandsikhen.in/siddhivinayak-katha/): सिद्धिविनायक व्रत कथा में भरद्वाज मुनि सूत से पूछते हैं कि विघ्नों का निवारण कैसे होगा। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उत्तर में सिद्धिविनायक की पूजा व्रत करने को कहा गया, जिससे नष्टराज्य की पुनर्प्राप्ति हो सकती है। सिद्धिविनायक की पूजा से सभी कार्यों की सफलता होती है और चाहे विद्या हो या धन, विजय या सौभाग्य, सब इच्छाएं पूर्ण होती हैं। - [हरितालिका (तीज) कथा](https://katha.karmkandsikhen.in/teej-ka-mahatwa-aur-vrat-puja-katha/): हरितालिका (तीज) कथा : पूजा का काल प्रदोषकाल ही होता है अतः प्रदोषकाल में ही पूजा करे। पवित्रीकरणादि करके सर्वप्रथम संकल्प करे। यदि चौदह वर्षों तक ही करना हो तो प्रथम वर्ष चौदह वर्ष करने का संकल्प करे, अन्य वर्षों में संकल्प करे। यदि 14 वर्ष से अधिक भी करना हो तो 14 वर्षों वाला संकल्प प्रथम वर्ष न करे। - [श्री राम नवमी व्रत कथा - Ram Navami vrat katha](https://katha.karmkandsikhen.in/ram-navami-vrat-katha/): Ram Navami vrat katha : श्री रामनवमी व्रत से जितना पुण्य प्राप्त होता है उतना पुण्य कठिन तपस्या करने से भी प्राप्त नहीं होता। श्री रामनवमी व्रत से जितना पुण्य प्राप्त होता है उतना पुण्य पूरी पृथ्वी दान करने से भी नहीं होता। - [श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में - संपूर्ण कथा सातों अध्याय (7Chapter)](https://katha.karmkandsikhen.in/satynarayan-vrat-katha/): श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में : सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में अवश्य सुनें। कथा सुनने का पुण्य संस्कृत (देववाणी) में सुनने से ही मिलता है। हिन्दी या अन्य भाषाओं में समझने के लिये कर सकते हैं। कथा का पुण्य पाने के लिये ब्राह्मण के द्वारा ही सुने। कथा सुनते समय कथावाचक से नीचे आसन रखें। हाथों में फूल रखकर कथा सुने और कथा के बाद भगवान को चढ़ा दें। कथा के समय आपस में बातचीत न करें। यदि संस्कृत समझ में न भी आये तो भी ध्यान से संस्कृत पाठ को अवश्य सुनें। - [एकादशी व्रत कथा - संक्षेप में 26 एकादशी की व्रत कथा](https://katha.karmkandsikhen.in/ekadashivratkatha/): एकादशी व्रत कथा : सभी एकादशी के अलग-अलग नाम कहे गए हैं अरु सभी एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा भी विभिन्न नामों से की जाती है। सभी एकादशी के फल भी अलग-अलग बताये गए हैं जो नामानुसार परिलक्षित भी होते हैं। यहाँ सभी एकादशी के कथा संक्षेप में प्रस्तुत की जा रही है। यथाशीघ्र प्रत्येक एकादशी की अलग-अलग पूर्ण कथा भी प्रस्तुत की जाएगी। ## Pages - 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