कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य - एकोनत्रिंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29

पीपल के वृक्ष की पूजा केवल शनिवार को होती है क्योंकि यह माता लक्ष्मी और उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी के बीच के संबंधो का प्रतीक है। जब भगवान विष्णु ने अलक्ष्मी का विवाह उद्दालक ऋषि से कराया, तो अलक्ष्मी ने बताया कि उसे केवल बुरे स्थान पसंद हैं। फिर भी, भगवान विष्णु ने उसे पीपल के नीचे रहने का आश्वासन दिया। इस वृक्ष के नीचे श्रद्धालु उसकी पूजा करते हैं, जिससे लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। कार्तिक माहात्म्य के उनत्तीसवें अध्याय में अलक्ष्मी (दरिद्रा) के विवाह से लेकर पीपल वृक्ष में वास करने तक की कथा है। सर्वप्रथम मूल माहात्म्य संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश ।

कार्तिक मास कथा : कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29 हिन्दी में

ऋषियों ने पूछा – हे सूतजी! पीपल के वृक्ष की शनिवार के अतिरिक्त सप्ताह के शेष दिनों में पूजा क्यों नहीं की जाती?

सूतजी बोले – हे ऋषियों! समुद्रमंथन करने से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान विष्णु को समर्पित कर दी थी। जब भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो ;

लक्ष्मी जी बोली – हे प्रभु! जब तक मेरी बड़ी बहन का विवाह नहीं हो जाता तब तक मैं छोटी बहन आपसे किस प्रकार विवाह कर सकती हूँ इसलिए आप पहले मेरी बड़ी बहन का विवाह करा दें, उसके बाद आप मुझसे विवाह कीजिए। यही नियम है जो प्राचीनकाल से चला आ रहा है, और इसी क्रम में माता-पिता और परिवारजन का आदर भी होना आवश्यक है।

सूतजी ने कहा – लक्ष्मी जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की बड़ी बहन का विवाह उद्दालक ऋषि के साथ सम्पन्न करा दिया। लक्ष्मी जी की बड़ी बहन अलक्ष्मी जी बड़ी कुरुप थी, जिसका मुख बड़ा, दाँत चमकते हुए, उसकी देह वृद्धा की भाँति, नेत्र बड़े-बड़े और बाल रुखे थे, जिससे वह देखकर कोई भी संकोच करता था। भगवान विष्णु द्वारा आग्रह किये जाने पर ऋषि उद्दालक उससे विवाह कर के उसे वेद मन्त्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम ले आये। वेद ध्वनि से गुंजित हवन के पवित्र धुंए से सुगन्धित उस ऋषि के सुन्दर आश्रम को देखकर अलक्ष्मी को बहुत दु:ख हुआ।

वह महर्षि उद्दालक से बोली – चूंकि इस आश्रम में वेदध्वनि गूँज रही है इसलिए यह स्थान मेरे रहने योग्य नहीं है, इसलिए आप मुझे यहाँ से अन्यत्र ले चलिए। उसकी बात सुनकर

महर्षि उद्दालक बोले – तुम यहाँ क्यों नहीं रह सकती और तुम्हारे रहने योग्य अन्य कौन सा स्थान है वह भी मुझे बताओ। यह सुनकर

अलक्ष्मी बोली – जिस स्थान पर वेद की ध्वनि होती हो, अतिथियों का आदर-सत्कार किया जाता हो, यज्ञ आदि होते हों, ऐसे स्थान पर मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर पति-पत्नी आपस में प्रेम से रहते हों पितरों के निमित्त यज्ञ होते हों, देवताओं की पूजा होती हो, उस स्थान पर भी मैं नहीं रह सकती।

जिस स्थान पर वेदों की ध्वनि न हो, अतिथियों का आदर-सत्कार न होता हो, यज्ञ न होते हों, पति-पत्नी आपस में क्लेश करते हों, पूज्य वृद्धो, सत्पुरुषों तथा मित्रों का अनादर होता हो, जहाँ दुराचारी, चोर, परस्त्रीगामी मनुष्य निवास करते हों, जिस स्थान पर गायों की हत्या की जाती हो, मद्यपान, ब्रह्महत्या आदि पाप होते हों, ऐसे स्थानों पर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवास करती हूँ।

सूतजी बोले – अलक्ष्मी के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर उद्दालक का मन खिन्न हो गया। वह इस बात को सुनकर मौन हो गये। उनकी चुप्पी में एक गहरा विचार था। थोड़ी देर बाद वे बोले कि ठीक है, मैं तुम्हारे लिए ऐसा ही स्थान ढूंढ दूंगा। जब तक मैं तुम्हारे लिए ऐसा स्थान न ढूंढ लूँ तब तक तुम इसी पीपल के नीचे चुपचाप बैठी रहना।

महर्षि उद्दालक उसे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठाकर उसके रहने योग्य स्थान की खोज में निकल पड़े परन्तु जब बहुत समय तक प्रतीक्षा करने पर भी वे वापस नहीं लौटे तो अलक्ष्मी विलाप करने लगी। उसकी व्यथा सुनकर उसकी नैतिकता भी कमजोर होने लगी। जब वैकुण्ठ में बैठी लक्ष्मी जी ने अपनी बहन अलक्ष्मी का विलाप सुना तो वे व्याकुल हो गई। वे दुःखी होकर भगवान विष्णु से बोली –

हे प्रभु! मेरी बड़ी बहन पति द्वारा त्यागे जाने पर अत्यन्त दुःखी है। यदि मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ तो आप उसे आश्वासन देने के लिए उसके पास चलिए। लक्ष्मी जी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित उस पीपल के वृक्ष के पास गये जहाँ अलक्ष्मी बैठकर विलाप कर रही थी। उसे आश्वासन देते हुए

भगवान विष्णु बोले – हे अलक्ष्मी! तुम इसी पीपल के वृक्ष की जड़ में सदैव के लिए निवास करो क्योंकि इसकी उत्पत्ति मेरे ही अंश से हुई है और इसमें सदैव मेरा ही निवास रहता है। प्रत्येक वर्ष गृहस्थ लोग तुम्हारी पूजा करेगें और उन्हीं के घर में तुम्हारी छोटी बहन का वास होगा। स्त्रियों को तुम्हारी पूजा विभिन्न उपहारों से करनी चाहिए, जैसे मिठाइयाँ, वस्त्र, और आभूषण, ताकि तुम उन पर अपनी कृपा बरसाती रहो। मनुष्यों को पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से तुम्हारी पूजा करनी चाहिए तभी तुम्हारी छोटी बहन लक्ष्मी उन पर प्रसन्न होगी।

सूतजी बोले – ऋषियों! मैंने आपको भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा तथा पृथु-नारद का संवाद सुना दिया है जिसे सुनने से ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करता है। यदि अब भी आप लोग कुछ पूछना चाहते हैं तो अवश्य पूछिये, मैं उसे अवश्य कहूँगा। सूतजी के वचन सुनकर शौनक आदि ऋषि थोड़ी देर तक प्रसन्नचित्त वहीं बैठे रहे, तत्पश्चात वे लोग बद्रीनारायण जी के दर्शन हेतु चल दिये।

जो मनुष्य इस कथा को सुनता या सुनाता है उसे इस संसार में समस्त सुख प्राप्त होते हैं।

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 29 भावार्थ/सारांश

इस कथा में एक गूढ़ संदेश छिपा है। क्या आप जानते हैं कि पीपल के पेड़ की पूजा केवल शनिवार को क्यों होती है? ऋषियों के सवाल पर सूतजी ने एक रोचक कथा सुनाई। सूतजी ऋषियों को बताते हैं कि पीपल की पूजा का मूल कारण अलक्ष्मी और लक्ष्मी के बीच का संबंध है। लक्ष्मी जी और उनकी कुरूप बहन अलक्ष्मी के इस विवाह संबंधी जटिलता में दो बातें छिपी हैं: पारिवारिक सम्मान और अलक्ष्मी की रहन-सहन की इच्छा। समुद्रमंथन से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान विष्णु को समर्पित कर दी गई थी।

जब भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से विवाह के लिए अपनी बड़ी बहन का विवाह कराने की शर्त रखती है। भगवन विष्णु ने किसी प्रकार ऋषि उद्दालक को मनाकर उनके साथ अलक्ष्मी का विवाह कर दिया। ऋषि उद्दालक उसे वेद मंत्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम ले आए। अलक्ष्मी ने इस आश्रम को रहने योग्य नहीं माना, क्योंकि वहां यज्ञ और वेदों की ध्वनि थी। अलक्ष्मी, जो कुरूप है, अपनी स्थिति को समझते हुए बताती है कि उसे केवल अशुद्ध स्थानों पर खुशी मिलती है।

अलक्ष्मी की बातें सुनकर ऋषि का मन खिन्न हो गया और उन्होंने अलक्ष्मी को पीपल के नीचे बिठाकर उसके रहने योग्य स्थान की खोज में निकल पड़े। जब बहुत काल तक वह लौटे नहीं, तो अलक्ष्मी विलाप करने लगी। लक्ष्मी जी ने इसका दुख भगवान विष्णु से कहा। भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के साथ पीपल के वृक्ष के पास गये और अलक्ष्मी को आश्वासन दिया कि वह पीपल के वृक्ष की जड़ में निवास करे क्योंकि पीपल उन्हीं का अंश है। भगवान विष्णु ने उसे यह आश्वासन भी दिया कि उसकी पूजा भी करेंगे।

कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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