इस आलेख में कार्तिक माहात्म्य का प्रथम अध्याय दिया गया है। पहले संस्कृत में मूल पाठ है और तत्पश्चात हिन्दी अर्थ और फिर संक्षिप्त या सारांश में। इस कथा में सत्यभामा ने भगवान कृष्ण से यह प्रश्न किया है कि 16000 रानियों में से वो श्रेष्ठ क्यों है, इसका कारण क्या है, उसने कौन सा पुण्य किया था, पूर्व जन्म में कौन थी इत्यादि। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा को उसके पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं जब उनका नाम गुणवती था। यही कथा सूत जी नैमिषारण्य में अनेकों ऋषियों को भी सुनाते हैं। Kartik mahatmya
कार्तिक माहात्म्य – प्रथमोध्यायः (कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1)
श्रीगणेशाय नमः
एकदास्वर्गलोकाद्वैनारदोद्वारिकांगतः ॥ दिदृक्षयाभगवतोदेवदेवस्य वेधसः ॥१॥
दृष्ट्वाकृष्णंततः पूजांकृत्वाभक्तिसमन्वितः॥ पारिजातस्यपुष्पैकं ददौभगवतेतदा ॥२॥
कृष्णोर्पितद्गृहीत्वातु रुक्मिण्यैदत्तवांस्तदा ॥ एतस्मिन्नंतरेचैव नारदोमुनिसत्तमः ॥३॥
सत्यभामामगात्तूर्ण कथयामास सर्वशः ॥ ततो जगाम भगवान्देवदेवो जनार्दनः ॥४॥
श्रीवत्सलांछनधरः सत्यभामा गृहंप्रति ॥ दृष्ट्वाप्रियां च विमनामेकांते समुपस्थिताम् ॥५॥
प्रहस्य च जगन्नाथोवासुदेवो ब्रवीदिदं ॥ प्रिये कुतोसि विमनास्तद्वदस्वममाग्रतः ॥६॥
ततो ब्रवीत्सत्यभामा क्रोधप्रस्फुरिताधरा ॥ मंदारपुष्पंकस्मात्त्वंरुक्मिण्यैदत्तवानसि ॥७॥
ततोब्रवीद्वासुदेवस्त्वंहिसत्येममांतिका ॥ ततो गरुडमानीय समारुह्यसभार्यया ॥८॥
स्वर्ग लोकमगात्तूर्ण कल्पवृक्ष जिघृक्षया ॥ उत्पाट्यमंदारतरुं जित्वाह्यदितिनंदनम् ॥९॥
द्वारिकामगमत्कृष्ण स्तुतः प्राह प्रियांसती ॥ गृहाणमंदारतरुं त्वं मे परमवल्लभा ॥१०॥
ततोब्रवीत्सत्यभामा नारदं मुनिपुंगवम् ॥ कथस्व महायोगिन ममाग्रे मुनिसत्तम् ॥११॥
येन मेकृष्णविश्लेषो न भवेच्चकथंचन ॥ ततः प्राहमुनिर्वाक्यं सत्यभामांयशस्विनीम् ॥१२॥
शृणुसत्येप्रवक्ष्यामि यद्ददातिभुनक्तितत् ॥ तस्माद्दानंददस्वैनं न वियोगो भविष्यति ॥१३॥
तथेत्युक्त्वाददौदानं नारदाय यशस्विनी ॥ ततस्तुनारदः कृष्णं संगृह्यह्यगमनमुनिः ॥१४॥
ततोऽब्रवीत्सत्यभामा नारदं मुनिपुंगवम् ॥ अस्मिंल्लोके वियोगस्य त्वयाऽकारिमयासह ॥१५॥
परलोके कथंत्वस्य वियोगो न भविष्यति ॥ ततोऽब्रवीन्मुनिवरः प्रहस्यवाक्य मे वचः ॥१६॥
तुलायां तोलयस्वैनं येनतुल्यो भविष्यति ॥ तत्प्रदेहि च मे मूल्यं तर्ह्येनंतुत्यजाम्यहम् ॥१७॥
ततो गृहोपस्करणं सर्वमानीय तेन सा ॥ तोलयामास वैवसत्या न च तुल्योबभूव सः ॥१८॥
ततोहरिर्निदेशेन सत्यभामादृढव्रता ॥ तुलसीदल मानीय तोलयामास तेनतम् ॥१९॥
तेनतुल्योबभूवाथ भगवान्भक्तवत्सलः ॥ ततोगृहीत्वा तु दलं नारदो मुनिपुंगवः ॥२०॥
स्तुत्वा जनार्दनं देवं स्वर्गलोकंजगामसः ॥२१॥
श्रियः पतिमथामंत्र्य गतेदेवर्षिसत्तमे ॥ हर्षोत्फुल्लानना सत्या वासुदेवमथाब्रवीत् ॥२२॥
॥सत्योवाच ॥
धन्यास्मि कृतकृत्यास्मि सफलं जीवितं मम ॥ मज्जन्मनि निदाने च धन्यौ तौ पितरौ मम ॥२३॥
यौ मां त्रैलौक्यसुभगां जनयामासतुर्ध्रुवम् ॥ षोडशस्त्रीसहस्त्राणां वल्लभाऽहंयतस्तव ॥२४॥
यस्मान्मयाऽदिपुरुषः कल्पवृक्षसमन्वितः ॥ यथोक्तविधिना सम्यङ् नारदायसमर्पितः ॥२५॥
यद्वार्त्तामपि जानंति भूमि संस्थान जंतवः ॥ सोऽयंकल्पद्रुमो गेहे सदातिष्ठति चांगणे ॥२६॥
त्रैलोक्याधिपतेश्चाहं श्रीपते रतिवल्लभा ॥ अतोहं प्रष्टुमिच्छामि किंचित्त्वांमधुसूदन ॥२७॥
यदित्वंमत्प्रियकरः कथयस्वात्र विस्तरम् ॥ श्रुत्वातच्चपुनश्चाहं करोमि हितमात्मनः ॥२८॥
यथाकल्पंत्वया देव वियुक्तास्यान्न कर्हिचित् ॥
॥ सूतउवाच ॥
॥ इतिप्रियावचः श्रुत्वा स्मेरास्यः सगदाधरः ॥२९॥
सत्याकरं करेधृत्वाऽगमत्कल्पतरोः स्तलम् ॥ निषिध्यानुचरं लोकं सविलासः प्रियान्वितः ॥३०॥
प्रहस्य सत्यामामंत्र्य प्रोवाचजगतांपतिः। तत्प्रीतिपरितोषोत्थलसत्पुलकितांगकः ॥३१॥
॥श्रीकृष्णउवाच ॥
न मे त्वत्तः प्रियतमा काचिदन्या नितंबिनी ॥ षोडश स्त्री सहस्त्राणां प्रिया प्राणसमाह्यसि ॥३२॥
त्वदर्थंदेवराजेन विरोधोदैवतैः सह ॥ त्वया यत्प्रार्थितं कांते शृणुतच्चमहाद्भुतम् ॥३३॥
॥ सूतउवाच ॥
एकदा भगवान्कृष्णस्सत्यायाः प्रियकाम्यया ॥ वैनतेयं समारुढ इन्द्रलोकं तदागमत् ॥३४॥
कल्पवृक्षं याचितवानसोवदन्नददाम्यहं ॥ वैनतेयस्तदा क्रुद्धस्तदर्थं युयुधेतदा ॥३५॥
गोलोके गरुडोगोभिर्युद्धंचैवचकारसः ॥ गरुडस्य च तुंडेन पुच्छकर्णास्तदाऽपतन् ॥३६॥
रुधिरो पिपतोर्व्या त्रीणि वस्तूनिचाभवन् ॥ कर्णेभ्यश्चतमालं च पुच्छाद्गोमीबभूव ह ॥३७॥
रुधिरान्मे हदीजाता मोक्षार्थीदूरतस्त्यजेत् ॥ तस्मादेतत्रयं चैव न हि सेव्यंनरैः प्रिये ॥३८॥
गावस्तागरुडंश्रृङ्गैः प्रजहुः कुपितास्तदा ॥ गरुत्मतस्त्रयः पक्षाः पृथिव्यामपतनप्रिये ॥३९॥
पक्षात्प्राथमिकाज्जातोनीलकंठः शुभात्मकः ॥ द्वितीयाच्चमयूरोवै चक्रवाकस्तृतीयतः ॥४०॥
दर्शनाद्वै त्रयाणां तु शुभं फलमवाप्नुयात् ॥ तस्मादिदमुपाख्यानं वर्णितं च मयाप्रिये ॥४१॥
सुपर्ण दर्शनाच्चैव यतो फलं लभतेनरः ॥ तत्फलंप्राप्नुयात्तेषां दर्शनाद्वैममालयम् ॥४२॥
अदेयमपि वा कार्यमकथ्यमपि यत्पुनः ॥ तत्करोमि कथं प्रश्नं कथयामि न मत्प्रिये ॥४३॥
पृच्छस्व सर्वं कथये यत्तेमनसि वर्तते ॥
॥ सत्योवाच ॥
दानं व्रतं तपो वापि किं तु पूर्वं कृतंमया ॥४४॥
येनाहं मर्त्यजा मर्त्ये भावातीताऽभवं किल ॥ तवांगार्धहरा नित्यं गरुडासनगामिनी ॥४५॥
इन्द्रादिदेवता वा समगमंया त्वयासह ॥ अतस्त्वांप्रष्टुमिच्छामि किं कृतं तु मयाशुभम् ॥४६॥
भवांतरे च किं शीला का चाहं कस्यकन्यका ॥
॥ श्रीकृष्णउवाच ॥
शृणुष्वैकमनाः कांते यथात्वं पूर्वजन्मनि ॥४७॥
पुण्यव्रतं कृतवती तत्सर्वं कथयामि ते ॥ आसीत्कृतयुगस्यांते मायापुर्यां द्विजोत्तमः ॥४८॥
आत्रेयो देवशर्मेति वेद वेदांगपारगः ॥ अतिथेयोग्नि शुश्रूषी सौरव्रत परायणः ॥४९॥
सूर्यमाराधयन्नित्यं साक्षात्सूर्य इवापरः ॥ तस्यातिवयसश्चासीन्नाम्ना गुणवती सुता ॥५०॥
अपुत्रः स स्वशिष्याय चंद्रनाम्ने ददौ सुताम् ॥ तमेव पुत्रवन्मेने स च तं पितृवद्वशी ॥५१॥
तौ कदाचिद्वनंयातौ कुशेध्म हरणार्थिनौ ॥ हिमाद्रिपादोपवने चेरतुस्तावितस्ततः ॥५२॥
तावुभौ राक्षसं घोरमायांतं तमपश्यताम् ॥ भयविह्वलसर्वांगावसमर्थौ पलायितुम् ॥५३॥
निहतौ रक्षसा तेन कृतांत समरुपिणा ॥ तौ तत्क्षेत्र प्रभावेण धर्मशीलतया पुनः ॥५४॥
वैकुंठभवनं नीतौमद्गणैर्मत्समीपगैः ॥ यावज्जीवं तु यत्ताभ्यां सूर्यपूजादिकं कृतम् ॥५५॥
तेनाहंकर्मणाताभ्यां सुप्रीतोह्यभवं किल॥ शैवाः सौराश्चगाणेशा वैष्णवाः शक्तिपूजकाः॥५६॥
मामेवप्राप्नुवंतीह वर्षांभः सागरं यथा ॥ एकोऽहं पंचधाजातः क्रिययानामभिः किल ॥५७॥
देवदत्तो यथाकश्चित्पुत्राद्याह्वाननामभिः ॥५८॥
ततश्चतौमद्भवनाधिवासिनौविमानयानौरविवर्चसावुभौ ॥
मत्तुल्यरुपौममसन्निधानगौदिव्यांगना चंदनभोगभोगिनौ ॥५९॥
॥ इतिश्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डेकार्तिकमाहात्म्येकृष्णसत्यासंवादेप्रथमोऽध्यायः ॥
कार्तिक माहात्म्य प्रथम अध्याय हिन्दी में
नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी हजार सनकादि ऋषियों से कहा: अब मैं आपको कार्तिक मास की कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जिसका श्रवण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त समय में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।
सूतजी ने कहा : श्रीकृष्ण जी से अनुमति लेकर देवर्षि नारद के चले जाने के पश्चात। सत्यभामा प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण से बोली :
“हे प्रभु! मैं धन्य हुई, मेरा जन्म सफल हुआ, मुझ जैसी त्रौलोक्य सुन्दरी के जन्मदाता भी धन्य हैं, जो आपकी सोलह हजार स्त्रियों के बीच में आपकी परम प्यारी पत्नी बनी। मैंने आपके साथ नारद जी को वह कल्पवृक्ष आदिपुरुष विधिपूर्वक दान में दिया, परन्तु वही कल्पवृक्ष मेरे घर लहराया करता है। यह बात मृत्युलोक में किसी स्त्री को ज्ञात नहीं है। हे त्रिलोकीनाथ! मैं आपसे कुछ पूछने की इच्छुक हूँ। आप मुझे कृपया कार्तिक माहात्म्य की कथा विस्तारपूर्वक सुनाइये जिसको सुनकर मेरा हित हो और जिसके करने से कल्पपर्यन्त भी आप मुझसे विमुख न हों।”
सूतजी आगे बोले: सत्यभामा के ऎसे वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने हँसते हुए सत्यभामा का हाथ पकड़ा और अपने सेवकों को वहीं रुकने के लिए कहकर विलासयुक्त अपनी पत्नी को कल्पवृक्ष के नीचे ले गये फिर हंसकर बोले: हे प्रिये! सोलह हजार रानियों में से तुम मुझे प्राणों के समान प्यारी हो। तुम्हारे लिए मैंने इन्द्र एवं देवताओं से विरोध किया था। हे कान्ते! जो बात तुमने मुझसे पूछी है, उसे सुनो।
एक दिन मैंने(श्रीकृष्ण) तुम्हारी(सत्यभामा) इच्छापूर्ति के लिए गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक जाकर कल्पवृक्ष मांगा। इन्द्र द्वारा मना किये जाने पर इन्द्र एवं गरुड़ में घोर संग्राम हुआ और गौ लोक में भी गरुड़ जी गौओं से युद्ध किया।

गरुड़ की चोंच की चोट से उनके कान एवं पूंछ कटकर गिरने लगे जिससे तीन वस्तुएँ उत्पन्न हुई। कान से तम्बाकू, पूँछ से गोभी और रक्त से मेहंदी बनी। इन तीनों का प्रयोग करने वाले को मोक्ष नहीं मिलता तब गौओं ने भी क्रोधित होकर गरुड़ पर वार किया जिससे उनके तीन पंख टूटकर गिर गये। इनके पहले पंख से नीलकण्ठ, दूसरे से मोर और तीसरे से चकवा-चकवी उत्पन्न हुए। हे प्रिये! इन तीनों का दर्शन करने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त हो जाता है।
यह सुनकर सत्यभामा ने कहा: हे प्रभो! कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों के विषय में बताइए कि मैंने पूर्व जन्म में कौन-कौन से दान, व्रत व जप नहीं किए हैं। मेरा स्वभाव कैसा था, मेरे जन्मदाता कौन थे और मुझे मृत्युलोक में जन्म क्यों लेना पड़ा। मैंने ऎसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मैं आपकी अर्द्धांगिनी हुई?
एक दिन वे दोनों कुश व समिधा लेने के लिए जंगल में गये। जब वे हिमालय की तलहटी में भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें एक राक्षस आता हुआ दिखाई दिया। उस राक्षस को देखकर भय के कारण उनके अंग शिथिल हो गये और वे वहाँ से भागने में भी असमर्थ हो गये तब उस काल के समान राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। चूंकि वे धर्मात्मा थे इसलिए मेरे पार्षद उन्हें मेरे वैकुण्ठ धाम में मेरे पास ले आये। उन दोनों द्वारा आजीवन सूर्य भगवान की पूजा किये जाने के कारण मैं दोनों पर अति प्रसन्न हुआ।
गणेश जी, शिवजी, सूर्य व देवी, इन सबकी पूजा करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मैं एक होता हुआ भी काल और कर्मों के भेद से पांच प्रकार का होता हूँ। जैसे- एक देवदत्त, पिता, भ्राता, आदि नामों से पुकारा जाता है। जब वे दोनों विमान पर आरुढ़ होकर सूर्य के समान तेजस्वी, रूपवान, चन्दन की माला धारण किये हुए मेरे भवन में आये तो वे दिव्य भोगों को भोगने लगे।
कार्तिक माहात्म्य प्रथम अध्याय हिन्दी में भावार्थ/सारांश
नैमिषारण्य तीर्थ में श्री सूतजी ने अट्ठासी हजार ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा कि अब वह उन्हें कार्तिक मास की वह कथा सुनाएंगे, जिसे सुनने से सभी पापों का शमन हो जाता है और अंततः वैकुण्ठधाम की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि जब नारद जी चले गए, तब सत्यभामा प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण से बोलीं,
“भगवान, मैं धन्य हो गई, मेरा जन्म सफल हो गया है; आप जैसे पति के साथ विवाह हुआ। मैंने आपके साथ नारद जी को वह कल्पवृक्ष आदिपुरुष विधिपूर्वक दान किया, किंतु वही कल्पवृक्ष मेरे घर पर लहराया करता है। यह बात किसी को ज्ञात नहीं है। भगवान, कृपया मुझे कार्तिक माहात्म्य की कथा सुनाएं, जिससे मेरा कल्याण हो और जिससे आप मुझसे कभी विमुख न हों।”
श्री सूतजी ने आगे कहा कि सत्यभामा के यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उनका हाथ थामा और कल्पवृक्ष के नीचे ले जाकर कहा,
“प्रिये, तुम्हें मैं अपनी सोलह हजार रानियों में सबसे अधिक प्रिय मानता हूँ; तुम्हारे लिए मैंने इन्द्र और देवताओं से भी विरोध किया। तुम्हारी इच्छापूर्ति के लिए एक दिन मैंने गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक जाकर इन्द्र से कल्पवृक्ष मांगा। इन्द्र के मना करने पर गरुड़ और इन्द्र में घोर संग्राम हुआ, फिर गरुड़ ने गौ लोक में भी युद्ध किया। गरुड़ की चोंच लगने से तम्बाकू, गोभी और मेहंदी का निर्माण हुआ। इनका उपयोग करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। गौओं के क्रोधित होकर आक्रमण करने से गरुड़ के तीन पंख गिर गए, जिनसे नीलकंठ, मोर और चकवा-चकवी प्रकट हुए। इनका दर्शन करने से शुभ फल प्राप्त होता है।”
सत्यभामा ने कहा, “हे प्रभु! कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों के बारे में बताएं। मैंने क्या पुण्य किए थे जिससे मैं आपकी अर्द्धांगिनी बनी?” श्रीकृष्ण ने कहा, “प्रिये, अब तुम्हारे पूर्व जन्म की कथा सुनो। सतयुग के अंत में मायापुरी में देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण निवास करता था, जो वेद-वेदान्त का ज्ञाता था। उसकी गुणवती नामक बेटी थी, जिसका विवाह उसने चन्द्र नामक शिष्य से किया। एक दिन दोनों जंगल गए और एक राक्षस ने आकर उन्हें मार दिया। उनकी सूर्य भगवान की पूजा से मैं उन पर प्रसन्न हुआ और मेरे पार्षद उन्हें मेरे वैकुण्ठ धाम ले आए।”
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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