पद्मिनी एकादशी व्रत कथा – Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - Padmini ekadashi vrat katha

अधिकमास में प्रथम पक्ष शुक्ल होता है और द्वितीय पक्ष कृष्ण होता है। अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी एकादशी है। पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा में मुख्य रूप से एकादशी व्रत का माहात्म्य तो बताया ही गया है साथ ही एकादशी व्रत की विधि भी बताई गयी है। इस कथा में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के जन्म की भी कथा है। सर्वप्रथम पद्मिनी (अधिकमास शुक्ल पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा हिन्दी में

युधिष्ठिर बोले – हे जनार्दन ! मलमास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसका क्या नाम है ? और क्या विधि है ? सो मुझसे कहिये ।

श्रीकृष्ण जी बोले – मलमास में पद्मिनी नाम की पवित्र एकादशी होती है, यत्नपूर्वक उसका उपवास करने से वह प‌द्मनाभ के पुर को पहुँचा देती है । मलमास की एकादशी पवित्र और पापों को दूर करने वाली कही गई है, उसका फल ब्रह्माजी भी नहीं कह सकते ।

प्राचीन समय में ब्रह्माजी ने पद्मिनी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक नारदजी से वर्णन किया है। यह पापों को नाश करने वाला और भुक्ति-मुक्ति को देने वाला है ।

रमा एकादशी व्रत कथा - Rama ekadashi vrat katha
रमा एकादशी व्रत कथा – Rama ekadashi vrat katha

श्रीकृष्ण का वाक्य सुनकर धर्म के जानने वाले राजा युधिष्ठिर प्रसन्न हुए और भगवान् से एकादशी की विधि पूछने लगे । राजा के बचन सुनकर प्रसन्नता से खिले हुए कमल सरीखे नेत्र वाले

भगवान बोले – हे राजन् ! जो मुनियों को भी कठिन है वह मैं तुमसे कहूँगा । दशमी के दिन नियम करे, काँसे के बर्तन में भोजन, मांस, मसूर, चना, कोदों, शाक, शहद, पराया अन्न, ये दशमी के दिन वर्जित हैं, हविष्य अन्न भोजन करे। खारी नमक नहीं खाना चाहिये । दशमी के दिन भूमि पर शयन करे और ब्रह्मचर्य से रहे ।

एकादशी के दिन सबेरे उठकर शौच से निवृत्त होकर दातुन करे । बुद्धिमान मनुष्य बारह कुल्ले करके पवित्र होकर सावधानी से प्रातःकाल सुन्दर तीर्थ में स्नान करने को चला जाए। गोबर, मिट्टी, तिल, कुशा लेकर पवित्र होकर आमले का चूर्ण शरीर में लगाकर विधिपूर्वक स्नान करे । इस मन्त्र को पढ़े :

“सौ भुजा वाले श्रीकृष्ण रूपी बाराह ने तुमको धारण किया है। हे मृत्तिके ! कश्यपजी से अभिमंत्रित की हुई और ब्रह्माजी से दी हुई हो। मैंने शिर और नेत्रों में तुमको लगाया, मेरे अंग को पवित्र करो । हे मृत्तिके ! भगवान् के पूजन के योग्य मुझे करो, तुमको नमस्कार है । सब औषधियों से पैदा हुआ, गौ के उदर में स्थित, पृथ्वी को पवित्र करने वाला गोबर मुझे शुद्ध करे । ब्रह्माजी की थूक से पैदा हुए, लोक को पवित्र करने वाले, हे आमले ! स्पर्श करने से तू मेरे शरीर को पवित्र कर, तुझको नमस्कार है । हे देवताओं के देवता ! हे शंखचक्र गदा धारण करने वाले ! हे जगन्नाथ ! हे विष्णो ! मुझको तीर्थ में स्नान करने की आज्ञा दीजिये ।”

वरुण के मन्त्रों को जपकर गंगादि तीर्थों का स्मरण करके जहाँ कहीं जलाशय हो उसमें विधिपूर्वक स्नान करे । हे नृपसत्तम ! पीछे विधिपूर्वक मुख, पीठ, हृदय, भुजा, सिर और नीचे का अंग इनमें मार्जन करे । फिर सुखदायी, सफेद, शुद्ध, अखण्डित धोती पहनकर भगवान् का पूजन करे तो बड़ा पाप नष्ट हो जाता है । विधिपूर्वक, संध्या करके देव और पितरों का तर्पण करे, भगवान् के मन्दिर में आकर कमलापति का पूजन करे ।

एक मासे सुवर्ण की बनाई हुई राधाकृष्ण की मूर्ति की तथा महादेव-पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करे । कलश के ऊपर ताँबे अथवा मिट्टी के पात्र में उत्तम वस्त्र रखकर सुगन्धित वस्त्र रखकर सुगन्धित करके देवता को स्थापित करे । उसके ऊपर ताँबे, चाँदी एवं सुवर्ण का पात्र रक्खे, उसमे मूर्ति को रखकर विधिपूर्वक पूजन करे ।

सुन्दर जल, गन्ध, धूप, चन्दन, अगर, कपूर इनसे भगवान् का पूजन करे । कस्तूरी, कुंकुम, श्वेतकमल और उस ऋतु में पैदा हुए फूलों से परमेश्वर का पूजन करे । शक्ति के अनुसार अनेक प्रकार के नैवेद्य, धूप, दीपक, कपूर और आरती से केशव और शिव का पूजन करे, भगवान् के सामने नृत्य और कीर्तन करे ।

पतित मनुष्यों से बातचीत न करे, न स्पर्श करे, मिथ्या भाषण न करे, सत्य बोले, रजस्वला का स्पर्श न करे ब्राह्मण और गुरु की निन्दा न करे । वैष्णवों को संग लेकर ठाकुरजी के सामने कथा सुने ।

मलमास के शुक्लपक्ष की एकादशी में पानी भी न पिये । अथवा इस व्रत में जलपान व दूध पीकर रहना चाहिये और कुछ नहीं खाना चाहिये ।

रात में कीर्तन और बाजे बजाकर जागरण करना चाहिये । रात के प्रथम प्रहर की पूजा में नारियल रखकर अर्घ्य देना चाहिये। दूसरे में श्रीफल से, तीसरे में बिजौरे से । चौथे प्रहर में सुपारी से अर्घ्य देना चाहिये । विशेष करके नारंगी से पूजन करना उचित है।

प्रथम प्रहर में जागरण से अग्निष्टोम यज्ञ का पुण्य होता है । दूसरे प्रहर में जागरण से वाजपेय का, तीसरे प्रहर में जागरण से अश्वमेध का, चौथे प्रहर के जागरण से राजसूय का फल मिलता है ।

इस व्रत से अधिक न कोई पुण्य है, न कोई यज्ञ है, न कोई विद्या है, न कोई तपस्या है । जिस मनुष्य ने एकादशी का व्रत कर लिया उसने पृथ्वी के सब तीर्थ, सब क्षेत्र, इनका स्नान और दर्शन कर लिया । इस प्रकार सूर्योदय तक जागरण करे।

सवेरा होते ही अच्छे तीर्थ में जाकर स्नान करे । फिर घर पर आकर पहले कही विधि से भक्तिपूर्वक भगवान् का पूजन करे फिर उत्तम ब्राह्मणों को भोजन करावे ।

कलश आदि सामग्री और केशव भगवान् की प्रतिमा का विधिपूर्वक पूजन करके ब्राह्मण को दान कर दे । जो मनुष्य इस विधि से व्रत करता है उसको मुक्ति को देने वाला यह व्रत सफल हो जाता है ।

हे अनघ ! मलमास के शुक्लपक्ष की जो एकादशी की उत्तम विधि तुमने मुझसे पूछी सो मैंने कह दी । हे नृपनन्दन ! जो प्रसन्नता से पद्मिनी एकादशी का व्रत करता है उसने सब व्रत कर लिये । मलमास के कृष्णपक्ष की एकादशी की भी यही विधि है। इसका नाम परमा है और सब पापों को नाश कर देती है । यहाँ मैं एक सुन्दर कथा तुमसे कहूँगा जो कि पुलस्त्य मुनि ने विस्तारपूर्वक नारदजी से कही है ।

कार्तवीर्य के द्वारा कारगर में बंदी हुए रावण को देखकर पुलस्त्य मुनि ने राजा कहकर उसको छुड़ा दिया । इस आश्चर्य को सुनकर दिव्य रूप नारदजी भक्तिपूर्वक पुलस्त्य मुनि से पूछने लगे कि इन्द्र समेत सब देवता जिस रावण ने जीत लिये उस युद्धकुशल रावण को कार्तवीर्य ने कैसे जीत लिया?  नारदजी का वचन सुनकर

पुलस्त्य मुनि बोले – हे वत्स ! मैं कार्तवीर्य की उत्पत्ति तुमसे कहूँगा, तुम सुनो । हे राजन् ! पहिले समय में त्रेतायुग में माहिष्मती पुरी में हैहयों के कुल में कृतवीर्य नाम का एक बड़ा राजा पैदा हुआ । उस राजा के एक हजार प्राणप्यारी रानियाँ थीं, परन्तु उनमें से किसी के राज को सँभालने वाला पुत्र नहीं हुआ । उसने देवता, पितृगण और बड़े-बड़े सिद्धों का पूजन किया और सिद्धों की आज्ञा से व्रत भी किये, परन्तु पुत्र नहीं हुआ ।

पुत्र के बिना राजा को राज्य सुखदायक नहीं मालूम होता था जैसे भूखे मनुष्य को विषय भोग अच्छे नहीं लगते । राजा ने मन में विचार किया कि तपस्या करने से इच्छा पूरी होती है, यह चित्त में सोचकर तपस्या करने का निश्चय किया । यह विचार कर वह धर्मात्मा चीर, वस्त्र और जटा धारण करके घर का भार मन्त्री को सौंपकर तप करने को चला गया ।

इक्ष्वाकु कुल में पैदा हुई, स्त्रियों में श्रेष्ठ, राजा हरिश्चन्द्र की पुत्री पद्मिनी उस राजा की रानी थी, उसने अपने पति को निकलते हुए देखा । वह रानी पतिव्रता थी, उसने अपने पति की तपस्या का उद्योग देखकर अपने सब आभूषणों को उतारकर चीर वस्त्र धारण कर लिये । अपने पति के साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गई।

राजा ने वहाँ जाकर दस हजार वर्ष तपस्या की, उसने गदाधर भगवान् का ध्यान किया तब भी राजा के पुत्र नहीं हुआ । उस श्रेष्ठ रानी ने अपने पति के शरीर में हड्डी का अवशेष बचा देखा । वह पद्मिनी नम्रता से पतिव्रता अनसूया से पूछने लगी कि हे साध्वि ! मेरे पति को तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गये, तो भी कष्टों को दूर करने वाले केशव प्रसन्न नहीं हुए, इसलिए हे महाभागे ! मुझको यथार्थ व्रत बतलावें, जिससे भगवान् मेरी भक्ति से प्रसन्न हो जायँ । जिससे श्रेष्ठ चक्रवर्ती पुत्र पैदा हो । तपस्या करने के लिए आते हुए राजा के पीछे-पीछे आती हुई पद्मिनी रानी की बात सुनकर पतिव्रता अनसूया प्रसन्न होकर कमलनयनी पद्मिनी से बोली –

“हे सुध्रु ! यह मलमास बारहों महीनों में अधिक श्रेष्ठ है । हे सुन्दर मुखवाली ! यह बत्तीस महीनों में आता है। इसमें परमा और पद्मिनी नाम की दो एकादशियाँ होती हैं । उनका व्रत करके विधिपूर्वक जागरण करना चाहिये। इसके करने से पुत्र देने वाले भगवान् शीघ्र प्रसन्न होंगे ।”

यह सुनकर अनसूया ने प्रसन्न होकर मेरी कही हुई विधिपूर्वक व्रत की विधि उसको समझा दी । अनसूया से कही हुई व्रत की विधि को सुनकर पुत्र होने की कामना से सब विधि को किया । एकादशी को न कुछ खाती, न जल पीती थी, रात्रि में नृत्यगीत से जागरण करती थी । व्रत पूर्ण होने पर केशव भगवान् शीघ्र प्रसन्न हो गये, गरुड़ पर बैठकर स्वयं बोले कि हे सुन्दरि ! वर माँग ।

जगत के रक्षक भगवान् का यह वचन सुनकर पद्मिनी प्रसन्न होकर मन्द मुस्कान करके बोली कि मेरे पति को बहुत बड़ा वरदान दीजिये । पद्मिनी के वचन सुनकर प्रिय बोलने वाले श्रीकृष्ण भगवान् प्रसन्न हुए और बोले कि हे भद्रे ! तूने मुझे प्रसन्न कर लिया । जैसा मलमास मुझे प्यारा है वैसा दूसरा नहीं है। उसमें सुन्दर एकादशी मुझको विशेष प्रिय है । हे सुन्दर मुखवाली ! सुन्दर भृकुटी वाली ! तूने विधिपूर्वक एकादशी का व्रत किया है जैसा कि अनसूया ने तुमसे कहा है, इससे मैं तुम पर प्रसन्न हूँ । तुम्हारे पति को मैं इच्छानुसार वर दूँगा ।

यह कह कर संसार के दुःख हरने वाले भगवान् राजा से बोले – हे राजेन्द्र ! अपनी इच्छानुसार वर माँग लो। रानी ने तुम्हारी कामना सिद्ध होने के लिए मुझे प्रसन्न कर लिया । विष्णु का वचन सुनकर राजा प्रसन्न हो गया। जिसको सब लोक नमस्कार करे ऐसा बड़ी भुजाओं वाला पुत्र माँगा । हे जगत् के स्वामी ! हे मधुसूदन ! तुमको छोड़कर देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य, दानव, राक्षस ये कोई जिसको न जीत सके ऐसा पुत्र चाहिए ।

राजा के ऐसे कहने पर ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कह कर भगवान् अन्तरधान हो गये। राजा भी रानी समेत हृष्ट, पुष्ट और प्रसन्न हो गया। स्त्री-पुरुषों से युक्त रमणीक अपने नगर में आ गया ।

पद्मिनी के बड़ा बलवान कार्तवीर्य नामक पुत्र हुआ । उसके समान त्रिलोक में कोई मनुष्य नहीं था । इससे दशकन्ध रावण को उसने युद्ध में हरा दिया । चक्रपाणि गदाधर भगवान् के सिवा त्रिलोक में उसके जीतने के लिए कोई समर्थ नहीं है ।

मलमास के प्रसाद और पद्मिनी के उपवास से उसने रावण को जीत लिया, इसमें तुमको विस्मय नहीं करना चाहिए । देवताओं के देवता भगवान् ने महाबली कार्तवीर्य को दिया था। ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि प्रसन्न होकर चले गये ।

श्रीकृष्ण बोले – तुमने जो मलमास के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत पूछा था वह मैंने तुमसे कह दिया । जो मनुष्य इसको करेंगे वे विष्णुलोक को प्राप्त होंगे। जो तुम इच्छानुसार फल चाहते हो तो तुम भी इस व्रत को करो । केशव का वचन सुनकर धर्मराज बहुत प्रसन्न हुए। अपने भाइयों को संग लेकर युधिष्ठिर ने भी व्रत किया ।

सूतजी बोले – हे द्विज ! पहिले तुमने जो एकादशी का पवित्र व्रत पूछा था सो मैंने परम पवित्र व्रत-तुमसे कह दिया। फिर अब क्या सुनने की इच्छा है ?  इस विधि से जो मनुष्य भक्ति से मलमास की एकादशी का व्रत करेंगे और जिसने सुखदेनी शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत किया है, वे मनुष्य धन्य हैं । जो मनुष्य इसकी सब विधि को सुनेंगे वे पुण्य के भागी होंगे और जो सब कथा को पढ़ेंगे वे बैकुण्ठ को जाएँगे ।

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ

पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा में दशमी से प्रारम्भ करके द्वादशी तक के नियमों का वर्णन करते हुये एकादशी व्रत की सम्पूर्ण विधि का वर्णन किया गया है। इसके साथ ही सहस्रार्जुन द्वारा रावण को बंदी बनाने का प्रसंग उपस्थित होने पर कार्तवीर्य अर्जुन के जन्म की भी कथा बताई गयी है और इस प्रकार से पद्मिनी एकादशी का माहात्म्य बताया गया है।

कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *