देवोत्थान एकादशी व्रत कथा – Devotthana ekadashi vrat katha

देवोत्थान एकादशी व्रत कथा - Devotthana ekadashi vrat katha

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवोत्थान एकादशी है, प्रबोधिनी एकादशी भी एक अन्य नाम है। इस एकादशी को भगवान विष्णु का जागरण होता है। ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को इसकी कथा सुनाई है जिसका वर्णन स्कंदपुराण में है। इस कथा में एकादशी का माहात्म्य, तुलसी माहात्म्य, कार्तिक माह और चातुर्मास में भगवान विष्णु की पूजा माहात्म्य आदि भी बताया गया है।

सर्वप्रथम देवोत्थान (कार्तिक शुक्ल पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Devotthana ekadashi vrat katha

देवोत्थान एकादशी व्रत कथा हिन्दी में

ब्रह्माजी बोले – हे मुनिसत्तम ! पापों को दूर करने वाला, पुण्यों को बढ़ाने वाला, बुद्धिमानों को मोक्ष देने वाला प्रबोधिनी एकादशी माहात्य्य सुनो। हे विप्रेन्द्र! भागीरथी गंगा पृथ्वी पर तभी तक गरजती है जब तक पापों को नाश करने वाली कार्तिक में प्रबोधिनी एकादशी नहीं आती । तीर्थ, समुद्र, सरोवर तभी तक गरजते हैं, जब तक कार्तिक की प्रबोधिनी एकादशी नहीं आती । सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय का फल मनुष्य को प्रबोधिनी के उपवास से मिलता है ।

नारदजी बोले – एक बार भोजन से क्या पुण्य होता है। हे पितामह। नक्त भोजन और उपवास से क्या पुण्य होता है, सो मुझसे कहिये ।

ब्रह्माजी बोले – एक बार भोजन से एक जन्म का पाप दूर होता है। सायंकाल भोजन करने से दो जन्मों का पाप नाश और उपवास से सात जन्मों के पापों का नाश होता है । हे पुत्र ! जो वस्तु त्रिलोकी में कठिनता से प्राप्य है, जो मिल नहीं सकती, जो दिखाई नहीं देती ऐसी वस्तु को भी प्रबोधिनी देती है ।

सुमेरु और मन्दराचल पर्वत के समान पापों को यह पापनाशिनी एकादशी भस्म कर देती है । सहस्रों पूर्वजन्मों के किये हुए दुष्कर्मों को जागरण करने से रुई की तरह प्रबोधिनी जला देती है। हे मुनिशार्दूल ! जो स्वभाव से विधिपूर्वक प्रबोधिनी का उपवास करता है उसको जैसा फल कहा है वैसा ही प्राप्त होता है ।

रमा एकादशी व्रत कथा - Rama ekadashi vrat katha
रमा एकादशी व्रत कथा – Rama ekadashi vrat katha

हे मुनिश्रेष्ठ ! जो मेरे कथन के अनुसार थोड़ा भी सुकर्म करता है उसको सुमेरु के समान फल होता है । हे नारद! जो विधिरहित सुमेरु के समान भी सुकर्म को करता है उसको धर्म फल अणुमात्र भी नहीं मिलता है । जो संध्या नहीं करता, व्रत को बिगाड़ने वाला, नास्तिक, वेदनिन्दक, धर्मशास्त्र की निन्दा करने वाला है उसके शरीर में धर्म नहीं रहता । पर-स्त्रीगामी, मूर्ख, उपकार को न मानने वाला, विश्वासघात करने वाला इन मनुष्यों के शरीर में धर्म नहीं रहता है ।

ब्राह्मण अथवा शूद्र जो पराई स्त्री से, विशेष करके ब्राह्मणी से भोग करते हैं, वे दोनों चांडाल के समान हैं । हे मुनिशार्दूल ! जो ब्राह्मण सुहागिन अथवा विधवा ब्राह्मणी से विषय करता है वह वंशसहित नष्ट हो जाता है । जो अधम ब्राह्मण परस्त्री गमन करता है उसके सन्तान नहीं होती। जन्म भर जो पुण्य किया है उसका उसे फल नहीं होता।

जो गुरु और ब्राह्मणों को अहंकार दिखलाता है उसका पुण्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और धन, सन्तान नहीं होती । बुरे आचरण वालों, शूद्री से विषय करने वालों तथा दुर्जन की सेवा करने वालों का धर्म नहीं रहता । हे नृपश्रेष्ठ ! जो पतितों का संग करते हैं और जो उनके घर जाते हैं वे यमलोक को जाते हैं ।

हे वत्स ! स्वागत, आसन तथा भोजन से जिन मनुष्यों का धर्म नष्ट हो गया है उनकी कीर्ति, आयु, सन्तान और सुख नष्ट हो जाता है। जो नीच मनुष्य साधुओं का निरादर करते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम से हीन होकर नरक की अग्नि से भस्म होते हैं। जो नीच मनुष्य साधुओं का अपमान करके प्रसन्न होते हैं और जो अपमान करने वालों को नहीं रोकते, वे मूर्ख अपने कुल का नाश देखते हैं। शठ, चुगलखोर और भ्रष्टाचारी इनकी दान और हवन करने से भी गति नहीं होती । इसलिए जिससे संसार में निन्दा हो ऐसा कोई बुरा काम नहीं करना चाहिए । अच्छे कर्म करने चाहिये जिससे धर्म नष्ट न हो ।

जो कोई अपने मन में यह सोचते हैं कि हम प्रबोधिनी का व्रत करेंगे तो ऐसा विचार करने से ही उनके सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो कोई प्रबोधिनी की रात्रि में जागरण करता है, वह बीते हुए, वर्तमान और भविष्य के दस हजार कुल को विष्णुलोक में पहुंचा देता है । उसके पितृगण पूर्व जन्म के कर्मों से प्राप्त हुए नरक के दुःखों से छूटकर विष्णुलोक में प्रसन्न और सुशोभित होकर निवास करते हैं ।

हे मुने ! ब्रह्महत्या से लेकर बड़े पापों का करने वाला मनुष्य भी विष्णु भगवान् के जागरण करने से पापों से छूट जाता है । जो अश्वमेध आदि सुन्दर यज्ञों से फल नहीं मिलता, वह प्रबोधिनी का जागरण करने से सहज मिल जाता है । सब तीर्थों में स्नान करने और गौ, सुवर्ण, पृथ्वी का दान करने से वह फल नहीं मिलता जो एकादशी के जागरण से मिलता है । हे मुनिशार्दूल ! जिसने कार्तिक में प्रबोधिनी का व्रत किया है वही पुण्यात्मा और कुल को पवित्र करने वाला उत्पन्न हुआ है ।

जैसे मनुष्यों की मृत्यु निश्चय है, वैसे ही धन का नाश भी निश्चय है, यह समझकर हे मुनिश्रेष्ठ ! एकादशी का उपवास करना चाहिये। जो कोई विधिपूर्वक प्रबोधिनी का व्रत करता है, उसके घर में त्रिलोकी के सब तीर्थ आ जाते हैं । सब कामों को छोड़कर भगवान् के प्रसन्न करने के लिए कार्तिक में सुन्दर प्रबोधिनी का व्रत करना चाहिये । जो प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करता है वही ज्ञानी, योगी, तपस्वी और जितेन्द्रिय है, उसी को भोग और मोक्ष मिलता है ।

यह एकादशी विष्णु की प्यारी है और धर्म के सार को देने वाली है, इसका एक बार व्रत करने से ही मोक्ष का भागी हो जाता है । हे नारद ! प्रबोधिनी का उपवास करने से मनुष्य पुनर्जन्म नहीं लेता, इसलिए सब धर्मों को छोड़कर इसका उपवास करना चाहिये। कर्म, मन, वाणी से जो कुछ पाप किया है, उसको प्रबोधिनी के जागरण से भगवान् दूर कर देते हैं । हे वत्स ! प्रबोधिनी के दिन मनुष्य भगवान् के निमित्त स्नान, दान, जप, होम जो कुछ करते हैं वह अक्षय होता है ।

जो मनुष्य एकादशी का व्रत करके भक्ति से भगवान् का पूजन करते हैं उनके सौ जन्म के पाप दूर हो जाते हैं । हे पुत्र ! यह व्रत बड़े पापों के समूह को नष्ट करने वाला है, प्रबोधिनी के दिन इसका विधिपूर्वक उपवास करना चाहिये । इस व्रत से भगवान् को प्रसन्न करके दशों दिशाओं में प्रकाश करता हुआ मनुष्य विष्णुलोक को जाता है । हे मनुष्यों में श्रेष्ठ ! कान्ति की इच्छा करने वाले मनुष्यों को कार्तिक में प्रबोधिनी यत्न से करनी चाहिये ।

हे वत्स ! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में किये हुए थोड़े अथवा बहुत से सौ जन्मों के पापों को; सूखे, गीले और छिपे हुए सब पापों को भक्ति से भगवान् का पूजन नष्ट कर देता है । यह पवित्र एकादशी धन-धान्य को देने वाली और सब पापों को दूर करने वाली है, भक्तिपूर्वक इसका व्रत करने से कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।

सूर्य, चन्द्र के ग्रहणों में स्नान, दान से जो फल होता है उससे हजार गुना फल एकादशी के जागरण से मिलता है । प्रबोधिनी के दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, भगवान् का पूजन इनमें से जो कुछ किया जाए उसका करोड़ गुणा फल होता है । कार्तिक की एकादशी का व्रत न करने से जन्म भर का किया हुआ सब पुण्य वृथा है । हे नारद ! जो मनुष्य कार्तिक में नियम और विष्णु का पूजन नहीं करता उसको जन्म भर के किये हुए पुण्य का फल नहीं मिलता । हे विप्रेन्द्र ! इसलिए सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले जनार्दन भगवान् की यत्न से सेवा करनी चाहिये ।

हे विप्रेन्द्र ! जो विष्णु का भक्त कार्तिक में पराये अन्न को स्वीकार नहीं करता उसको चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है । कार्तिक में मधुसूदन, जैसे शास्त्र की कथा-वार्ता से प्रसन्न होते हैं वैसे यज्ञ और हाथी आदि के दान से नहीं होते । जो मनुष्य कार्तिक में विष्णु की कथा को पूरी अथवा उसका आधा अथवा चौथाई श्लोक कहते व सुनते हैं उनको सौ गौदान का फल मिलता है । हे मुने ! कार्तिक के महीने में सब धर्मों को छोड़कर मेरे सामने बैठकर कथा कहनी और सुननी चाहिये । हे मुनिशार्दूल ! कल्याण के लिए अथवा धन के लोभ से जो कार्तिक में भगवान् की कथा कहता है वह अपने सैकड़ों कुलों का उद्धार कर देता है ।

जो मनुष्य कार्तिक में नित्य प्रति शास्त्राध्ययन के आनन्द से समय को व्यतीत करता है उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और दश हजार यज्ञ का फल प्राप्त होता है । जो मनुष्य विशेषकर कार्तिक में भगवान् की कथा सुनता है उसको एक सहस्र गोदान का फल मिलता है। जो भगवान् के प्रबोध के दिन कथा कहते व सुनते हैं, हे मुने! उनको सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वी के दान का फल मिलता है ।

हे मुनिशार्दूल ! जो मनुष्य सुन्दर विष्णु की कथा को सुनकर यथाशक्ति वक्ता का पूजन करते हैं, उनको सनातन स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी का वचन सुनकर फिर

नारदजी बोले – हे स्वामिन् हे सुरोत्तम! एकादशी की विधि मुझसे कहिये । जिस एकादशी के करने से जैसा फल मिले सो भी कहिये। नारदजी का वचन सुनकर

ब्रह्माजी बोले ~ हे द्विजोत्तम ! एकादशी को प्रातःकाल उठकर दातुन करके स्नान करे । नदी, तालाब, कुआँ, बावली अथवा घर में स्नान करके केशव भगवान् का पूजन करे, फिर कथा सुने । हे महाभाग ! नियम के लिए यह मन्त्र पढ़े “एकादशी को निराहार व्रत करके दूसरे दिन भोजन करूँगा, हे पुण्डरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा करें।” इस मन्त्र को चक्रधारी भगवान् के सामने पढ़े । भक्तिभाव से प्रसन्नतापूर्वक उपवास करे, रात्रि में भगवान् के समीप बैठकर जागरण करे ।

हे मुने ! जो गाता है, नाचता है, बाजे बजाता है अथवा भगवान् की कथा को कहता व सुनता है वह पुण्यात्मा तीनों लोकों के ऊपर निवास करता है । कार्तिक में प्रबोधिनी के दिन बहुत से फूल, फल, कपूर, अगुरु, कुंकुम से भगवान का पूजन करना चाहिये । हे मुनिसत्तम ! एकादशी के दिन लोभ न करना चाहिये, निर्लोभ होकर दान करना चाहिये इससे असंख्य पुण्य होता है । एकादशी के जागरण में अनेक प्रकार के सुन्दर फलों से भगवान् का पूजन और शंख में जल भरकर जनार्दन को अर्घ्य देना चाहिये ।

सब तीर्थों में स्नान और अनेक प्रकार के दान करने से जो फल होता है उससे करोड़ गुना फल प्रबोधिनी में अर्घ्य देने से मिलता है । हे मुनिश्रेष्ठ ! जो दिव्य अगस्त्य के फूलों से जनार्दन का पूजन करता है, उसके लिए इन्द्र भी हाथ जोड़ते हैं ।

  • हे विप्रेन्द्र ! तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् वह फल नहीं देते, जैसा अगस्ति के फूलों से शृंगार करने से फल देते हैं ।
  • हे कलिवर्द्धन ! जो कार्तिक में भक्तिपूर्वक भगवान् की बेलपत्र से पूजा करते हैं उनकी मुक्ति हो जाती है ।
  • हे वत्स ! कार्तिक में जो तुलसी के पत्ते और फूल से जनार्दन की पूजा करते हैं, उनके दश हजार वर्ष के पाप भस्म हो जाते हैं ।

तुलसी का दर्शन, स्पर्श, ध्यान, कीर्तन, नमस्कार, स्तुति करने से, पौधा लगाने से, सींचने और नित्य पूजन करने से तुलसी शुभ फल देती है । जो नित्य प्रति तुलसी की नौ प्रकार की भक्ति करते हैं । वे करोड़ों युग तक वैकुण्ठ में निवास करते हैं । हे मुने ! लगाई हुई तुलसी की जितनी जड़ फैलती है उतने ही हजार युग तक उनका पुण्य फैलता है । हे मुने ! जिन मनुष्यों की लगाई हुई तुलसी की जब तक शाखा प्रशाखा, बीज, पुष्प, पत्ते भूमि पर बढ़ते हैं । उनके कुल में जो उत्पन्न हो चुके हैं और जो उत्पन्न होंगे, वे हजार कल्प तक वैकुण्ठ में निवास करते हैं ।

जो कदम्ब के फूलों से जनार्दन की पूजा करते हैं वे चक्रधारी भगवान् की कृपा से यमलोक में नहीं जाते । कदम्ब के फूल को देखकर केशव भगवान् प्रसन्न होते हैं। हे विप्र ! यदि सची कामनाओं को देने वाले भगवान् का कदम्ब के फूलों से पूजन कर दिया जाए तो फिर कहना ही क्या है । कार्तिक में गुलाब के फूलों से जो परम भक्ति से भगवान् का पूजन करता है वह मुक्ति का भागी होता है । बकुल और अशोक के फूलों से जो जगत के स्वामी भगवान की पूजा करते हैं, उनको जब तक सूर्य-चन्द्रमा हैं तब तक शोक नहीं होगा ।

जो सफेद या लाल कनेर के फूलों से जगन्नाथ की पूजा करते हैं, उनसे चारों युगों में केशव भगवान प्रसन्न रहते हैं। जो बड़भागी मनुष्य केशव के ऊपर आम का बौर चढ़ाते हैं, उनको करोड़ गोदान का फल मिलता है । जो दूब के अंकुर से भगवान् का पूजन करते हैं, उनको पूजा का सौ गुणा फल प्राप्त होता है। हे नारद ! जो छींकरे के पत्तों से सुखदायी भगवान् का पूजन करते हैं, वे भयंकर यमलोक के मार्ग को सरलता से पार कर जाते हैं ।

जो वर्षा ऋतु में चंपा के फूलों से देवेश भगवान् का पूजन करते हैं, वे मनुष्य फिर संसार में जन्म नहीं लेते । हे विप्रर्षे ! जो मनुष्य जनार्दन भगवान् के ऊपर पकड़ी का फूल चढ़ाते हैं, उनको एकपल सुवर्ण चढ़ाने का फल मिलता है । जो मनुष्य सुनहरी केतकी का फूल जनार्दन भगवान् पर चढ़ाता है, गरुड़ध्वज भगवान् उसके करोड़ जन्मों के पापों को भस्म कर देते हैं । जो कुंकुम के समान लाल रंग की सुगन्धित शतपत्री का फूल जगन्नाथ पर चढ़ाता है, उसका श्वेतद्वीप में निवास होता है ।

हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार रात्रि में भुक्ति-मुक्ति को देने वाले केशव भगवान् का पूजन करके प्रातःकाल उठकर नदी के तट पर चला जाए वहाँ स्नान, जप और नित्य कर्म करके घर जाकर विधिपूर्वक केशव भगवान् का पूजन करे । व्रत की पारणा के लिए बुद्धिमान् मनुष्य ब्राह्मण-भोजन करावे, भक्तियुक्त चित्त से सिर झुकाकर क्षमा माँगे। फिर भोजन-वस्त्र से गुरु की पूजा करनी चाहिये और चक्रपाणि भगवान् को प्रसन्न करने के लिए दक्षिणा और गौ देनी चाहिये । ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक भूयसी दक्षिणा देनी चाहिये । जो वस्तु छोड़ी है उन नियमों को ब्राह्मणों के सामने छोड़ना चाहिये ।

ब्राह्मणों के सामने उस नियम को कहकर यथाशक्ति दक्षिणा दे। हे राजन् ! नक्त भोजी मनुष्य अच्छे ब्राह्मणों को भोजन करावे । अयाचित नियम में सुवर्ण सहित बैल का दान करे। जिसने मांस भक्षण छोड़ दिया है उसको दक्षिणा सहित गौ देनी चाहिये । आमले से स्नान करने के नियम में दही और शहद देना, अन्न के छोड़ने के नियम में चामर देना चाहिये । हे राजन् ! भूमि पर सोने वाले को गद्दा और चादर समेत शय्या देनी चाहिये । पत्तल पर भोजन करने वाले को बर्तन में घी भरकर देना चाहिये । मौन धारण करने वाले को घण्टा, तिल और सुवर्ण देना चाहिये और ब्राह्मण को घी मिला हुआ अन्न भोजन कराना चाहिये ।

बाल धारण करने वाले को बट्टा, जूता त्याग करने वाले को एक जोड़ा जूता दान करना चाहिये । मौन छोड़ने वाले को शक्कर देना चाहिये, विष्णु के मन्दिर में अथवा देवस्थान में नित्य दीपक जलाना चाहिये । नियम की समाप्ति में ताँबे या सुवर्ण की बेली में घी भरकर उसमें लाख बत्ती रखकर विष्णु के भक्त ब्राह्मण को देना चाहिये । एक दिन छोड़कर उपवास करने में आठ कलश, वस्त्र और सुवर्ण से सुशोभित करके देना चाहिये । यदि ये सब न बन सके तो ब्राह्मण का वचन ही सब सिद्धियों को देने वाला है। ब्राह्मणों को नमस्कार करके विदा करे। फिर आप भोजन करे ।

चार महीनों में जो छोड़ा है उसकी समाप्ति को, हे राजेन्द्र ! जो बुद्धिमान इस प्रकार आचरण करता है उसको अनन्त फल मिलता है । अन्त में बैकुण्ठ को जाता है । जो मनुष्य चातुर्मास्य के नियम को निर्विघ्न समाप्त कर देता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, फिर संसार में जन्म नहीं लेता, अर्थात् मुक्त हो जाता है । हे महीपाल! ऐसा करने से व्रत पूर्ण हो जाता है। यदि व्रत बिगड़ जाए तो वह मनुष्य अन्धा व कोढ़ी हो जाता है। जो तुमने मुझसे पूछा था वह मैंने तुमसे कहा । इसके पढ़ने और सुनने से भी गोदान करने का फल होता है ।

देवोत्थान एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवोत्थान एकादशी है। इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है और देव उठनी एकादशी भी इसी को कहते हैं। एकभुक्त करने से १ जन्म के पाप का नाश होता है, नक्तव्रत करने से २ जन्मों के पाप का नाश होता है और उपवास करने से ७ जन्मों के पाप का नाश होता है। देवोत्थान एकादशी नहीं करने पर जन्मभर के सभी पुण्य वृथा हो जाते हैं।

इस कथा में एकादशी के नियमों की विस्तृत चर्चा की गयी है साथ ही दान के ऊपर भी विशेष चर्चा है। वर्त्तमान में चिंताजनक ये है कि व्रत करने वालों को न ही नियमों/विधियों का पालन करना स्वीकार है और दान शब्द की चर्चा भी नहीं चाहते। तुलसी विवाह कब होता है – देवोत्थान एकादशी को ही होता है।

  • देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में होती है।
  • इसे प्रबोधिनी या देवउठनी एकादशी भी कहते हैं।

कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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