देवशयनी एकादशी व्रत कथा – Devshayani ekadashi vrat katha

देवशयनी एकादशी व्रत कथा - Devshayani ekadashi vrat katha

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी है। इसका एक अन्य नाम पद्मा एकादशी भी है। इसमें राजा मान्धाता की कथा है जिसमें एक बार उनके राज्य में वर्षा बंद होने से अकाल हो गया और प्रजासहित अंगिरा मुनि के उपदेश से देवशयनी एकादशी का व्रत किया जिससे वर्षा हुई और अकाल का निवारण हो गया। सर्वप्रथम देवशयनी (आषाढ़ शुक्ल पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Devshayani ekadashi vrat katha

देवशयनी एकादशी व्रत कथा हिन्दी में

युधिष्ठिर बोले – हे केशव ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? उसका देवता कौन है और विधि क्या है ? ये मुझसे कहिए ।

श्रीकृष्णजी बोले – हे महीपाल ! जिस कथा को ब्रह्माजी ने महात्मा नारद जी से कहा है, उस आश्चर्य कराने वाली कथा को मैं तुमसे कहता हूँ । नारदजी ब्रह्माजी से पूछने लगे कि आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का क्या नाम है? प्रसन्न होकर विष्णु के आराधन के लिए मुझ से कहिये ।

ब्रह्माजी बोले – हे कलिप्रिय मुनिश्रेष्ठ ! तुम वैष्णव हो, तुमने बहुत सुन्दर प्रश्न किया। जगत में एकादशी से पवित्र और कोई पर्व नहीं है। सब पापों को नष्ट करने के लिए यत्नपूर्वक इसको करना चाहिये। इसलिए शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत मैं तुमसे कहूँगा । एकादशी का व्रत बहुत पवित्र है और पापों को नाश करके सब मनोरथों को पूर्ण करता है। जिन्होंने इसको नहीं किया वे नरक के भागी होते हैं।

आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम प‌द्मा है। हृषीकेश भगवान् को प्रसन्न करने के लिये यह उत्तम व्रत करना चाहिये । तुमसे मैं पुराण की सुन्दर कथा को कहता हूँ जिसके सुनने से बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं ।

सूर्यवंश में सत्यवादी, प्रतापी, मान्धाता नामक चक्रवर्ती राजा थे वे राजा धर्म से अपने पुत्र की तरह प्रजा का पालन करते थे। उनके राज्य में अकाल, रोग और मानसिक चिन्ता नहीं रहती थी । उनकी प्रजा आतंक रहित और धन-धान्य से पूर्ण थी। राजा के धनागार में अन्याय से अर्जित किया हुआ धन नहीं था। उन्हें राज्य करते हुए बहुत वर्ष बीत गये ।

फिर कभी पापों के फल उदय हो गये, तीन वर्ष तक उनके राज्य में वर्षा नहीं हुई। इससे उनकी प्रजा भूख-प्यास से पीड़ित होकर व्याकुल हो गई। अन्न के अभाव से पीड़ित होने के कारण उनके देश में स्वाहा, स्वधा, वषट्‌कार और वेद पाठ बन्द हो गया । फिर प्रजा आकर राजा से बोली –

हे राजन् ! प्रजा के हित करने वाले वचनों को सुनिये । बुद्धिमानों ने पुराणों में जल को नार कहा है। उस जल में भगवान् का अयन (स्थान) है, इससे भगवान् का नाम नारायण है। मेघरूपी विष्णु भगवान् सबमें व्याप्त हैं, वे ही वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न होता है, अन्न से प्रजा होती है । हे नृपते ! उस अन्न के न होने से प्रजा नष्ट हो जाती है। हे नृपश्रेष्ठ ! ऐसा यत्न करिये जिससे कल्याण हो ।

राजा बोले – आपने सत्य कहा, इसमें झूठ नहीं है, अन्न ईश्वर का रूप है, अन्न में सब निवास करते हैं । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही संसार वर्तमान है। ऐसा लोक में सुना जाता है और पुराणों में भी विस्तारपूर्वक कहा गया है । राजा के अधर्म से प्रजा को दुःख मिलता है। मैंने बुद्धि से विचार करते हुए अपना कोई दोष नहीं देखा, तथापि मैं प्रजा के हित के लिए यत्न करूँगा । ऐसा विचार करके राजा ने कुछ सेना साथ में ले ली।

ब्रह्माजी को प्रणाम करके गहन वन में चले गये, तपस्वी मुनीश्वरों के आश्रम में विचरने लगे । राजा ने ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि को देखा, जिनके तेज से दिशाओं में प्रकाश हो रहा था, वे दूसरे ब्रह्मा की के समान प्रतीत हो रहे थे । उनको देखकर जितेन्द्रिय राजा प्रसन्न हुए और सवारी से उतर कर हाथ जोड़कर चरणों में प्रणाम किया । ऋषि ने स्वस्तिवाचन किया और आशीर्वाद देकर राजा के राज्य के सातों अंगों की कुशल पूछी ।

राजा ने अपनी कुशल सुना कर ऋषि की कुशल पूछी, फिर मुनि ने राजा के आने का कारण पूछा । राजा ने अपने आने का कारण सुनाया; राजा बोले कि मैंने धर्म से पृथ्वी का पालन किया है । परन्तु मेरे राज्य में वर्षा नहीं हुई इसका कारण मैं नहीं जानता, इस सन्देह को दूर करने के लिए आपके पास आया हूँ । शान्ति और कल्याण की विधि से प्रजा के सुख का उपाय करिये।

ऋषि बोले – हे राजन् ! यह सतयुग सब युगों में उत्तम है, इस युग में मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हैं। इसमें धर्म के चारों चरण वर्तमान हैं। इस युग में ब्राह्मणों के अतिरिक्त और कोई तपस्या नहीं करते । हे राजेन्द्र ! आपके देश में शूद्र तप कर रहा है, उसके अनुचित कार्य करने से वर्षा नहीं हो रही है । उसको मारने का उपाय करें जिससे दोष शान्त हो ।

राजा बोले – तप करते हुए को बिना अपराध मैं नहीं मारूंगा, दुःख दूर करने को धर्म का उपदेश दीजिये ।

ऋषि बोले – हे राजन् ! जो ऐसा है तो एकादशी का व्रत कीजिए, आषाढ़ के शुक्लपक्ष में प‌द्मा नाम की प्रसिद्ध एकादशी है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय अच्छी वर्षा होगी । यह सब सिद्धियों को देने वाली और सब उपद्रवों को नष्ट करने वाली है। हे नृप आप प्रजा और परिवार सहित इसका व्रत करें ।

मुनि का यह वचन सुनकर राजा अपने महल में आये । और आषाढ़मास में प‌द्मा एकादशी का व्रत किया । सब प्रजा और चारों वर्णों के मनुष्यों ने इस व्रत को किया । हे राजन् ! इस व्रत के करने पर सब राज्य में खूब वर्षा हुई । पृथ्वी जल से भर गई और अन्न से परिपूर्ण हो गई । भगवान् की कृपा से मनुष्यों को सुख हुआ । इस कारण यह उत्तम व्रत करना चाहिए। यह मनुष्यों को सुख और मोक्ष देने वाला है । इसके पढ़ने और सुनने से सब पापों से छूट जाता है।

हे राजन् ! यह एकादशी देवशयनी कहलाती है । हे राजशार्दूल ! भगवान् के प्रसन्त्र करने के लिए मोक्ष की इच्छा करने वालों को देवशयनी का व्रत सदा करना चाहिए । चातुर्मास्य व्रत का आरम्भ भी इसी में किया जाता है ।

युधिष्ठिर बोले – हे कृष्ण ! विष्णु के शयन का व्रत कैसे करना चाहिए? हे देव ! कृपा करके चातुर्मास्य के व्रत कहिए ।

श्रीकृष्ण बोले – विष्णु के शयनव्रत और चातुर्मास्य में जो व्रत कहे हैं उनको मैं तुमसे कहूँगा, तुम सुनो ।

श्रीकृष्ण बोले – आषाढ़ शुक्लपक्ष में जब सूर्य कर्क राशि पर आ जाय तब एकादशी के दिन जगत् के स्वामी मधुसूदन भगवान् को शयन कराना चाहिए । जब सूर्य तुला राशि पर आ जाए तब भगवान् का उत्थापन करना चाहिए । अधिक मास में भी क्रम से यही विधि कही है। इसके अतिरिक्त और महीने में भगवान् को शयन न करावे, न उद्यापन करे । आषाढ़ के शुक्लपक्ष में एकादशी का उपवास करके चातुर्मास्य के व्रतों का नियम करे ।

हे युधिष्ठिर ! शंख, चक्र गदाधारी भगवान् की प्रतिमा को स्थापित करके स्नान करावे । हे युधिष्ठिर! पीताम्बर धारण कराकर श्वेतवर्ण की शय्या पर स्वच्छ तकिया लगाकर श्वेत वस्त्र उढ़ाकर शयन करावे । इतिहास, पुराण और वेद के जानने वाले ब्राह्मण द्वारा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत) से स्नान करवावे । सुन्दर गंध लेपन करके धूप, दीप और सुन्दर फूलों से पूजन करे।

हे पांडव ! इस मन्त्र को बोले “हे हृषीकेश! मैंने लक्ष्मी सहित आपका पूजन करके शयन कराया । हे देवेश ! हे जनार्दन ! लक्ष्मी सहित कृपा करें । हे जगन्नाथ ! आपके शयन करने पर चर अचर सब संसार सो जाता है। आपके जागने पर सब संसार जागता है ।”

हे युधिष्ठिर ! इस तरह से विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करके उसके सामने बैठकर नियमों को ग्रहण करे । प्रातः संध्यादिक सब नित्यकर्म को पूरा करके देवोत्थापनी एकादशी तक महीने का नियम लूँगा । “हे प्रभो! मेरे इन शुद्ध नियमों को निर्विघ्नता से पूर्ण कीजिए।” इस प्रकार नम्नतापूर्वक शुद्ध चित्त से प्रार्थना करे मेरा भक्त स्त्री हो अथवा पुरुष वह दातुन-कुल्ला करके धर्म के लिए व्रत करे और इन नियमों का पालन करे ।

विष्णु भगवान् के व्रत के आरम्भ के पाँच समय कहे हैं। चातुर्मास्य के व्रतों का आरम्भ आषाढ़ में करना चाहिए । एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा, अष्टमी, कर्क की संक्रान्ति इसमें विधिपूर्वक व्रत का आरम्भ करे । मनुष्य चार प्रकार से व्रत को ग्रहण करके कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वादशी को उसे समाप्त करे ।

चातुर्मास्य करने वालों को जो फल होता है वह मैं पृथक् पृथक् तुमसे कहूँगा । आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी को उपवास करे । “हे अवनीपते ! मैं विधिपूर्वक भगवान् को स्नान कराता है।” हे जनाधिप ! उसका विष्णु के समान रूप होता है और अक्षय सुख को भोगता है । जो राजा देवता के उद्देश्य से ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा, भूमि, फल और सुवर्ण दान करता है; वह दूसरे इन्द्र की तरह स्वर्ग में अक्षय सुख को भोगता है, और निश्चय विष्णुलोक को प्राप्त होता है ।

जो कोई गन्ध, पुष्प, अक्षत से भगवान् का पूजन करके नैवेद्य और सोने का कमल ब्राह्मण को देता है, जो कोई व्रत करने वाला चातुर्मास्य में नित्य पूजन करता है वह अक्षय सुख पाता है और इन्द्रलोक को जाता है । जो कोई चार महीने तक तुलसी से भगवान् की पूजा करता है और सुवर्ण की तुलसी बनाकर ब्राह्मण को देता है । वह सुवर्ण के विमान में बैठकर विष्णुलोक को जाता है ।

जो कोई गूगुल की धूप और दीपक अर्पण करता है वह सुख भोगने वाला धनवान् और भाग्यशाली होता है । चातुर्मास्य का व्रत समाप्त होने पर धूप और दीपक का दान करना चाहिए । जो कोई कार्तिक शुक्ला ११ तक पीपल अथवा विष्णु की परिक्रमा और नमस्कार करता है, जो कोई घुटने टेककर दोनों हाथों को जोड़कर स्तुति करता है, हृदय में ज्ञान रखता है उसको चतुरंग प्रदक्षिणा कहते हैं ।

जो कोई संध्या के समय ब्राह्मण और देवता के आँगन में दीपक जोड़ता है और नियम समाप्त होने पर सुवर्ण सहित दीपक, वस्त्र और तेल का दान करता है । वह तेजस्वी देवता होकर विमान में बैठता है। गन्धर्व, अप्सरा उसकी सेवा करते हैं और हवा खाता है । जो भगवान् का चरणामृत पीता है वह कष्ट से छूट जाता है और विष्णुलोक को प्राप्त होता है, फिर संसार में जन्म नहीं लेता। जो कोई ठाकुर जी के मन्दिर में बैठकर तीनों समय गायत्री का १०८ जप करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता ।

माला, पुस्तक, कमल, कमंडलु धारण किये हुए चार मुखवाली गायत्री वेदपाठी ब्राह्मणों के घर निवास करती हैं । सब लोकों में व्याप्त वेदत्रयी रूप सब शास्त्रों में कही हुई गायत्री देवी मनुष्यों को ज्ञान देती हैं। जो गायत्री का जप करता है उससे व्यासजी प्रसन्न होते हैं। इसके उद्यापन में शास्त्रविहित पुस्तक का दान करना चाहिए । “सब विद्याओं के समान शान्ति देने वाली सुन्दर अक्षरों की पुस्तक मैं देता हूँ इसलिए हे सरस्वति मेरे ऊपर प्रसन्न हों”, इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए ।

जो कोई नित्य प्रति पुराण अथवा धर्मशास्त्र को सुनता है वह पुण्यात्मा, सुखी, धनी तथा सत्य और पवित्रता से पूर्ण होता है । जो कोई सुवर्ण और वस्त्र समेत पुस्तक का दान करता है वह ज्ञानी लोक में प्रसिद्ध धर्मात्मा होता है और उसके बहुत से शिष्य होते हैं । जो कोई शिव अथवा केशव का जप करता है वह व्रत की समाप्ति में उस देवता की सुवर्ण की मूर्ति का दान करे ।

पाँचमुख वाले, बैल पर बैठने वाले हर, मुख में तीन नेत्र, कपाल, त्रिशूल, खट्वांग (बाघम्बर) धारी, जिनके माथे में चन्द्रमा हैं ऐसे सदाशिव हैं। आपने देवताओं के निमित्त अमृत को छोड़कर हालाहल विष को ग्रहण किया। हे ईश ! संसार के हित के लिए एक बाण से त्रिपुरासुर को भस्म किया । हे प्रभो ! आप रूप के देने वाले, पुण्यात्मा, दोषरहित और गुणवान् हैं। आप वैसा ही करिये, मैं आपकी शरण में हूँ। हे देववर ! आप प्रसन्न होइये; इस प्रकार प्रार्थना करे ।

नित्यकर्म करके सूर्य को अर्घ्य देवे, सूर्यमंडल में स्थित जनार्दन भगवान् का ध्यान करे । व्रत की समाप्ति में सुवर्ण, लाल वस्त्र और गोदान करने से आरोग्य, पूर्ण आयु, कीर्ति, लक्ष्मी और बल की प्राप्ति होती है । व्रत करने वाला चातुर्मास्य में भक्ति से व्याहृति अथवा गायत्री मन्त्र से तिल का हवन करता है । व्रत की समाप्ति में बुद्धिमान ब्राह्मण के लिए उसे १०८ अथवा २८ तिल के भरे हुए पात्र देने चाहिए । वह कायिक, वाचिक, मानसिक सब पापों से छूट जाता है। उसको रोग नहीं होता और उत्तम सन्तान होती है ।

हे देवदेव ! हे जगन्नाथ ! हे वाञ्छित फल को देने वाले ! मैं तिल का पात्र दान करूंगा, मेरे पाप को नष्ट करिये। इस प्रकार प्रार्थना करे। जो सावधान होकर चातुर्मास्य में अन्न का होम करे तो व्रत की समाप्ति में वस्त्र और सुवर्ण समेत घी का कलश दान करना चाहिए। ऐसा करने से आरोग्य, विशेष कान्ति, पुत्र, सौभाग्य और धन प्राप्त होता है। शत्रु की हानि होती है और ब्रह्मा के समान हो जाता है।

जो कोई पीपल की सेवा करके समाप्ति में वस्त्र का दान करता है वह सब पापों से छूटकर विष्णु का भक्त होता है । जो ब्राह्मण को सुवर्ण देता है उसको रोग नहीं होते । जो भगवान् को प्रसन्न करने वाली तुलसी को धारण करता है, उसके सब पाप दूर हो जाते हैं और वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है। हे पांडव ! व्रत की समाप्ति में उसे ब्राह्मणभोजन कराने चाहिए । जो कोई देवशयन होने पर अमृत से उत्पन्न हुई दूब को प्रातःकाल के समय माथे पर धारण करता है।

हे राजेन्द्र! लक्ष्मीनाथ के प्रसन्न करने को यह मन्त्र पढ़े। हे दूर्वे ! तू अमृत से पैदा हुई है। सुर, असुर सबसे तू वंदना की गई है । सौभाग्य और सन्तान देकर तू शीघ्रता से कार्य करने वाली है। हे कुरुश्रेष्ठ ! व्रत की समाप्ति में सोने की दूब बनवावें । उस दूब में अग्रभाग और पत्ते बनवाकर हे सुव्रत ! वस्त्र और दक्षिणा समेत उत्तम ब्राह्मण को दान करे और इस मन्त्र को पढ़े । जैसे शाखा और प्रशाखाओं से पृथ्वी पर तू फैली हुई है वैसे ही मुझको भी तू अजर-अमर संतान दे ।

इस प्रकार जो सावधानी से चातुर्मास्य का व्रत करता है। उसको दुःख और रोग का भय नहीं होता । उसको कभी अशुभ फल नहीं होता और पापों से छूटकर सब आनन्द को भोगकर स्वर्ग में सुख भोगता है । जो कोई केशव अथवा शिव के सामने नित्य कीर्तन करता है उसको जागरण का फल मिलता है । व्रत करने वाले को अन्त में सुन्दर बजने वाला घंटा देवता के निमित्त दान करना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए; गुरु की अवज्ञा और अनध्याय में जो मैंने पढ़ा है ।

हे सरस्वति ! हे जगत् की स्वामिनी ! हे संसार की मूर्खता दूर करने वाली ! हे ब्रह्माणि ! हे विष्णु और शिवादिकों से प्रार्थित !  हे सुन्दरमुखी ! मेरे अध्ययन में जो मूर्खता हुई है, उसको दूर कर । हे संसार को पवित्र करने वाली ब्रह्माणी ! तू घंटा के शब्द से प्रसन्न हो । जो मनुष्य ब्राह्मण को मेरा रूप समझकर उसके चरण के जल को नित्य पीता है । वह मानसिक, वाचिक और शारीरिक पापों से छूट जाता है। उसको रोग नहीं सताता और उसकी लक्ष्मी और आयु बढ़ती रहती है ।

व्रत की समाप्ति में दो अथवा एक दूध की गौ देनी चाहिए। हे राजेन्द्र ! जो शक्ति नहीं हो तो वस्त्र देने चाहिए । सब वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण को जो नित्य प्रणाम करता है, वह कृतकृत्य होकर सब पापों से छूट जाता है । जो पितरों की भक्ति करता है वह अखंड सुख को पाता है, व्रत की समाप्ति में जो ब्राह्मणों को भोजन कराता है उसकी आयु और धन बढ़ता है। जो प्रातःकाल सन्ध्या करके नियम की समाप्ति में ब्राह्मण को घी का घड़ा, दो वस्त्र, तिल और घंटा देता है, वह सरस्वती के तत्त्व को जानकर विद्यावान् होता है।

जो कपिला गौदान करता है वह धनवान होता है, जो श्रृंगार करके कपिला गौदान करता है अथवा पृथ्वी देता है वह दीर्घायु, प्रतापी चक्रवर्ती राजा होता है । सदा दान करने वाला मनुष्य सब दुःखों से छूटकर रूपवान् और भाग्यशाली होकर अखंड सुख भोगता है । शरीर में जितने रोम हैं उतने वर्ष तक स्वर्ग में इन्द्र की तरह बसता है। जो सूर्य अथवा गणेश को नित्य नमस्कार करता है, वह आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और उत्तम कान्ति को प्राप्त होता है।

गणेशजी की कृपा से उसकी इच्छा पूरी होती है । निःसन्देह सब जगह उसकी विजय होती है। सिन्दूर के समान लाल रंग का सूर्य बनवावे सम्पूर्ण कामना सिद्ध होने के लिए वह प्रतिमा ब्राह्मण को दे दे।

हृदय, दृष्टि, शिर, मन, वचन, पैर, हाथ, घुटने इन आठो अंगों से किया हुआ अष्टांग प्रणाम होता है। अष्टांग प्रणाम से जो भूमि का पूजन करता है । उसको वह गति मिलती है जो सौ यज्ञ करने से भी नहीं मिलती। जो चातुर्मास्य में शिवजी की प्रीति के लिए चाँदी दान करता है, अथवा शिवजी को प्रसन्नता के लिए अपनी शक्ति के अनुसार नित्य ताम्र दान करता है उसको शिवजी के भक्त सुन्दर पुत्र मिलते हैं । नियम की समाप्ति में चाँदी के बर्तन में शहद भरकर दान करना श्रेष्ठ है।

ताँबे के दान में ताँबे के बर्तन में गुड़ का दान करना उत्तम है। ताँबा पुष्टिकारक और सब देवताओं को प्यारा, सबकी रक्षा करने वाला और शुभ है इसलिए मुझे शांति दे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए । जो भगवान् के शयन करने पर शक्ति के अनुसार सुवर्ण, तिल और दो वस्त्रों का दान करता है, उसके सब पाप दूर हो जाते हैं । वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में शिवलोक को जाता है।

जो कोई सोना, चाँदी, ताँबा, अन्न इनका नित्य दान करता है । जो कोई नित्य श्राद्ध, देव-पूजा करके दक्षिणा देता है और चातुर्मास्य में ब्राह्मण को वस्त्र दान करता है । विष्णु भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हों, ऐसे कहकर जो ब्राह्मण का गंध-पुष्प आदि से पूजन करके नियम की समाप्ति में जो सुवर्ण की पट्टी वाली वस्त्र समेत शय्यादान करता है, उसको अखंड सुख मिलता है और कुबेर के समान धनी होता है ।

जो मनुष्य वर्षा ऋतु में गोपीचन्दन देता है, देवता के शरीर में कुंकुम अदि लगाता है, उससे भगवान प्रसन्न होकर भुक्ति और मुक्ति देते हैं । द्वारका में गोपियों के साथ जो श्रीकृष्ण ने जलकीड़ा की है, वहाँ की जो मृत्तिका है, उसको मुनीश्वरों ने गोपीचन्दन कहा है, वह पापों को दूर करता है । इससे यत्नपूर्वक उसका दान करना चाहिए। विष्णु भगवान् उसकी इच्छा पूरी करते हैं। नियम की समाप्ति में तराजू में गोपीचन्दन भरकर दान करना चाहिए । उसका आधा अथवा चौथाई वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिए।

जो कोई व्रत करने वाला विष्णु के शयन करने पर नित्य दान करता है, दक्षिणा समेत जो शक्कर और गुड़ दान करता है, ईख के सार से पैदा हुई शक्कर अमृत-कला कही गयी है, उसके दान से प्रसन्न होकर सूर्यनारायण इच्छानुसार फल देते हैं । व्रत की समाप्ति में बुद्धिमान् मनुष्य इस तरह उद्यापन करे ।

धन का लोभ न करके आठ-आठ पल के ताँबे के पात्र बनवावे । यदि असमर्थ हो तो चार-चार पल के ही बनवावे, यथाशक्ति आठ, चार या एक बनवावे । हर एक पात्र में शक्कर, फल और दक्षिणा रखकर कपड़ा लपेट दे और अन्न सहित श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दान करे। वस्त्र, शक्कर और सुवर्ण से युक्त ताम्रपात्र, जो कि सूर्य को प्रसन्न करने वाला, रोग और पापों को नष्ट करने वाला, मनुष्यों को पुष्टि, कीर्ति और सन्तान को देने वाला, सब मनोरथ और स्वर्ग को देने वाला और उत्तम आयु को बढ़ाने वाला है। इसलिए इसके दान से सदा मेरा यश हो । इस तरह से कहना चाहिए ।

इस प्रकार जो व्रत करे उसके पुण्य का फल सुनो : वह गन्धर्वविद्या से पूर्ण होकर सब स्त्रियों का प्रिय होता है । राजा को राज्य, पुत्र की कामना करने वाले को पुत्र, धन की इच्छा वाले को धन, जो किसी बात की इच्छा न करे उसे मोक्ष मिलता है । जो चातुर्मास्य में नित्य शाक, मूल, फल यथाशक्ति ब्राह्मणों को देता है, व्रत के अन्त में अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा सहित वस्त्र देकर बहुत समय सुख भोगकर वह मनुष्य राजयोगी होता है।

जैसे शाक मनुष्यों को तृप्तिकारक है उसी तरह सब देवताओं को भी प्रिय है, वैसे ही कन्द, मूल, पत्र, पुष्प ये देवर्षियों को प्रिय हैं। विष्णु के शयन करने पर चातुर्मास्य में जो इनका दान करता है, देवता उसका कल्याण करते हैं । हे अनघ ! जो कोई मनुष्य सूर्यनारायण की प्रसन्नता के लिए सुशील ब्राह्मण को सोंठ, मिर्च, पीपल देता है, उस सोंठ, मिर्च, पीपल में दक्षिणा रखकर हे सुव्रत ! इस मन्त्र को पढ़े। जैसे सोंठ, मिर्च, पीपल मनुष्यों के सब रोगों को दूर करते हैं। वैसे ही सूर्य भगवान इसके दान करने से प्रसन्न हों । बुद्धिमान् मनुष्य को इस तरह भले प्रकार से व्रत करके उद्यापन करना चाहिए ।

सुवर्ण की सोंठ, मिर्च और पीपल बनवा कर वस्त्र और दक्षिणा समेत बुद्धिमान् ब्राह्मण को देना चाहिए । इस तरह से जो व्रत करता है वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है, उसकी इच्छा पूरी होती है। अन्त में स्वर्ग को जाता है। जो सुबुद्धिमान् नित्य प्रति ब्राह्मण को मोती का दान करता है, वह अन्नवान्, धनवान्, यशस्वी राजा बनता है ।

जो चातुर्मास्य में नित्य प्रति दूध के घड़े को वस्त्र लपेटकर फल और दक्षिणा समेत दान करता है । सौभाग्यवती स्त्री को लक्ष्मी समझकर गन्ध-पुष्प से पूजन करता है, तांबूल (पान) और एक फल को ‘श्रीपतये नमः’ यह बोलकर जो दान करता है, व्रत की समाप्ति में ब्राह्मण-ब्राह्मणी को सूक्ष्म वस्त्र और आभूषणों से सुशोभित करके सुन्दर चमेली के फूलों से जो पूजन करते हैं, उद्यापन करने वाला यदि पुरुष है तो उसको अगले जन्म में स्त्री मिलती है जैसे माधव भगवान् को लक्ष्मी मिली है और स्त्री को उत्तम पति मिलता है ।

जो तांबूल का दान करता है अथवा जितेन्द्रिय होकर पान खाना छोड़ देता है उसको ताँबे का पान और दो लाल वस्त्र दक्षिणा सहित देने चाहिए । ऐसा करने से सब रोगों से छूटकर सुन्दर रूपवान, बुद्धिमान्, भाग्यशाली, सुरीले कंठ वाला पण्डित होता है । वह स्वर्गलोक में जाकर गन्धर्व होता है ।

ताम्बूल ब्रह्मा, विष्णु और शिव का रूप है, इसके दान करने से लक्ष्मी प्राप्त होती है । सुपारी में ब्रह्मा, पान के पत्ते में विष्णु निवास करते हैं। चूने में साक्षात् शिवजी रहते हैं, इसके दान करने से ब्रह्मादि देवता मुझको पूर्ण लक्ष्मी दें । इसके दान करने से मेरे भाग्य में सम्पत्ति बढ़े, ऐसी प्रार्थना करे । पान में सुपारी का चूर्ण रखकर चूना, लौंग, इलायची से युक्त गन्धर्व और अप्सराओं को प्रिय है। पान का दान करके प्रार्थना करे कि तुम प्रसन्न होकर मुझे धनवान् और निर्भय करो ।

चातुर्मास्य का व्रत करने वाली स्त्री अथवा पुरुष, ब्राह्मण-ब्राह्मणी के लिए लक्ष्मी और गौरी के निमित्त पात्र में हल्दी और दक्षिणा रखकर देते हैं । देवी मेरे ऊपर प्रसन्न हों इस प्रकार प्रार्थना करते हैं। वे दोनों स्त्री-पुरुष सुख भोगते हैं । भाग्यशाली होकर अखंड धन-धान्य, पुत्र, सुख और सुन्दर रूप पाकर अन्त में स्वर्ग का सुख भोगते हैं। महादेव पार्वती के निमित्त चातुर्मास्य में नित्य सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करके शक्ति के अनुसार “पार्वती के पति मेरे ऊपर प्रसन्न हों”, ऐसा कह दक्षिणा सहित सुवर्ण का दान करे ।

बुद्धिमान् मनुष्य उद्यापन के समय शिवजी की प्रतिमा सुवर्ण की बनवावे, गौ और बैल की पंचोपचार से पूजा करके जो मिष्ठान्न भोजन करावे उसके पुण्य का फल सुनो । व्रत के प्रभाव से सुन्दर भाग्य, पूर्ण आयु, सन्तान, अक्षय संपत्ति और सुन्दर यश होता है। यहाँ सब सुखों को भोगकर अन्त समय में शिवपुर को जाता है। वहाँ बहुत समय तक निवास करके पूर्ण सुख भोगता है । शेष पुण्य से मनुष्य लोक में आकर राजा होता है।

जो आलस्यरहित होकर चातुर्मास्य में फल का दान करता है, व्रत की समाप्ति में ब्राह्मण के लिए सुन्दर वस्त्र देता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं और उत्तम सन्तान मिलती है । फलदान के प्रभाव से वह नन्दन वन में आनन्द करता है। पुष्प दान के नियम में जो सुवर्ण के पुष्प देता है । वह पूर्ण भाग्यशाली होकर गन्धर्व पद को प्राप्त होता है ।

वासुदेव के शयन करने पर चातुर्मास्य में आलस्य को छोड़कर वामनजी के निमित्त दही, चामर और छह रसों का स्वादिष्ट भोजन करावे अथवा दान दे, किन्तु एकादशी को भोजन न करावे । इसी तरह ग्रहण आदि में दान करे। यदि नित्य दान न कर सके तो महीने के पाँच पर्वों में ही दान करना चाहिए । चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार अथवा शुक्रवार को दान करे । दोनों पक्षों की द्वादशी को अवश्य दान करना चाहिए।

इस नियम की समाप्ति में शक्ति के अनुसार भूमि का दान करना चाहिए । भूमि का दान करने की शक्ति न हो तो गौ का श्रृंगार करके दान करना चाहिए। जो गौ देने की शक्ति न हो तो वस्त्र, सुवर्ण और खड़ाऊँ देनी चाहिए। छत्र, पदत्राण और वस्त्र का दान सबसे श्रेष्ठ है । ब्राह्मण-भोजन का दान करे और क्षत्रिय प्रसन्नता से भूमि का दान करे । हे मुनिशार्दूल ! वैश्य, पृथ्वी के सिवाय और सब ठाकरे, समर्थ बाण और गृह भी पृथ्वी को छोड़कर और करे।

पहिले शिवजी के उपदेश से कुबेर, जह, गौतम और इन्द्र ने भी इस खत को धारण किया है। इसके करने से अक्षय अत्र पुत्रपौत्र और की शाप्ति होती है। पुष्ट शरीर और पूर्ण आयु होती है और शत्रु का भाग होता है । भगवान् का दूत, भक्त होकर वैकुण्ड को जाता है। आरोग्य अखंड सुख और धन मिलता है। उसकी स्त्री वंध्या नहीं होती, यह वत अनन्त फल देने वाला है जो सुन्दर दूध की गौ का दान श्रृंगार करके करता है रूप और शक्ति के अनुसार दक्षिणा देता है वह पराधीन नहीं होता और ज्ञानी होकर ब्रह्मलोक को जाता है। वह मनुष्य अपने पितरों सहित अक्षय सुख को पाता है।

जो मनुष्य वर्षाऋतु के चार महीनों में प्राजापत्य व्रत करता है, व्रत की पूर्ण समाप्ति में दो गौ दान करके और ब्राह्मण-भोजन कराके सब पापों से शुद्ध होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होता है । जो मनुष्य एक दिन अन्तर देकर उपवास करता है, उसको वस्त्र, सुवर्ण, शय्या, आठ दीपक और गौदान करना चाहिए । “भगवन् ! मेरे ऊपर प्रसन्न हों” ऐसा कहकर दो बैल भी देने चाहिये जो मनुष्य शाक, मूल, फल से चातुर्मास्य में निर्वाह करता है वह व्रत की समाप्ति में गोदान करके बैकुण्ठ को प्राप्त होता है।

जो दूध पीकर व्रत करे उसे व्रत के अन्त में दूध देनेवाली गौ का दान करना चाहिए, वह सनातन ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है । जो दोनों ऋतुओं में केले के पत्ते पर भोजन करता है, दो वस्त्र और काँसे का पात्र अपनी शक्ति के अनुसार देता है, वह सुखी रहता है । काँसे में ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी और सूर्य का निवास होता है, काँसा विष्णु का स्वरूप है। इसलिए विष्णु भगवान् मुझे शान्ति दें।

जो शरीर में तेल लगाना छोड़कर नित्य पलाश की पत्तल में भोजन करता है, वह पापों को ऐसे भस्म करता है जैसे अग्नि रुई के समूह को नष्ट कर जला देता है । ब्राह्मण की हिंसा करने वाले, मदिरा पीने वाला, बालघाती, मिथ्या बोलने वाले, स्त्रीघाती और व्रत को बिगाड़ने वाला, अगम्या से गमन करने वाले, विधवागामी, चांडालीगामी, ब्राह्मणी से गमन करने वाले । हे केशव ! इस व्रत के करने से सब पापों से छूट जाते हैं।

व्रत की समाप्ति में चौंसठ पल का काँसे का बर्तन और बछड़ा समेत दूध की गौ वस्त्र उढ़ाकर श्रृंगार करके सुन्दर वेषधारी विद्वान् ब्राह्मण को देनी चाहिए । जो भूमि लीपकर नारायण का स्मरण करता हुआ भोजन करता है, उसे खेती के लिए जल के निकट की पृथ्वी का दान करना चाहिए । ऐसा करने से वह आरोग्य और पुत्रों से युक्त धर्मात्मा राजा होता है। शत्रु का भय नहीं होता। अन्त में विष्णुलोक को जाता है ।

जो बिना माँगे भोजन करने का नियम करता है उसे एक बैल, सुवर्ण, चन्दन और षड्रस भोजन का दान करना चाहिए, इससे परम गति को प्राप्त होता है । जो भगवान के शयन करने पर नक्तव्रत करता है और ब्राह्मणभोजन कराना है वह शिव लोक में सुख भोगता है । जो चातुर्मास्य में एक बार अल्पाहार करने का नियम करके भगवान का पूजन करता है वह स्वर्ग को जाता है। नियम की समाप्ति में ब्राह्मण-भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये।

जो मनुष्य चातुर्मास्य में धरती पर सोता है उसको सामग्री समेत शय्या दान करना चाहिए, ऐसा करने से वह शिवलोक में आनन्द भोगता है। जो मनुष्य चातुर्मास्य में तेल लगाना बन्द कर देता है और ब्राह्मणों के चरण धोकर भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देता है वह बैकुण्ठ को जाता है ।

जो आषाढ़ से लेकर चार महीने तक नख नहीं कटवाता, वह आरोग्य और पुत्र से युक्त धर्मात्मा राजा होता है । जो शिवजी और पार्वती को प्रसन्न करने के लिए खीर, नमक, शहद, को देता है, घी और फल को चातुर्मास्य में छोड़ता है । कार्तिक शुक्ला एकादशी वह शिवजी के व्रत के सेवन करने से के दिन उस छोड़ी हुई वस्तु को ब्राह्मण रुद्रलोक को जाता है । जो जौ अथवा सुन्दर चावल खाता है वह पुत्र, पौत्र आदि सहित शिवलोक में आनन्द पाता है।

भगवान् का भक्त तेल लगाना छोड़कर जो वर्षा ऋतु में भगवान् की पूजा करे तो वह वैष्णवों की गति को प्राप्त होता है । व्रत की समाप्ति में काँसे के बर्तन में तेल और सुवर्ण रखकर ब्राह्मण के लिए दान करे । वर्षा के चार महीनों में जो शाक आदि नहीं खाता वह बैकुण्ठ को जाता है और उसके पितर तृप्त हो जाते हैं । व्रत की समाप्ति में चाँदी के पात्र को कपड़े में लपेट कर, गन्ध, पत्र-पुष्प से उसका पूजन करे ।

मूल, पत्ता, करील का आगे का फल, गुद्दा, कवच, त्वचा, पर्व और फूल ये आठ तरह का शाक कहा गया है । व्रत पूर्ण होने के लिए वेद पढ़े हुए ब्राह्मणों की पूजा करके यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए । शिवजी की कृपा से वह शिवजी के रूप में मिल जाता है ।

जो मनुष्य गेहूँ को छोड़ने का नियम करता है, वह कार्तिक में सुवर्ण के गेहूँ और वस्त्र दान करके अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। गेहूँ सब जीवों के बल और पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। हव्य और कव्य में मुख्य हैं, इसलिए मुझे लक्ष्मी दें, इस तरह प्रार्थना करे ।

चातुर्मास्य में बैगन छोड़ना चाहिए । करेला, परवल, कद्दू, घिया अथवा जो फल अपने लिए प्रिय होवे उसे छोड़े । चातुर्मास्य पूरा होने पर चाँदी का बनवाकर बीच में यथाशक्ति मूँगा लगाकर उस फल का पूजन करे । दक्षिणा समेत भक्ति से ब्राह्मण को दान करे और इष्टदेव से प्रार्थना करे कि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों । वह मनुष्य दीर्घ आयु, आरोग्य, पुत्र, पौत्र, सुन्दर रूप, अक्षय संतान और यश को प्राप्त करते अन्त में स्वर्ग में आनन्द भोगता है । जो फल का त्याग करता है वह विष्णुलोक में पूज्य माना जाता है । व्रत की समाप्ति में सुवर्ण में फल बनवाकर ब्राह्मण को देने चाहिए।

श्रावण में हरा शाक, भादों में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में दाल त्याज्य है । ब्रह्मचारी, गृहस्थ, संन्यासी, वानप्रस्थ इन चारों आश्रम वालों को ये चारों वस्तुएँ नित्य वर्जित हैं । मनुष्य को प्रथम मास (श्रावण) में शाक का त्याग करना चाहिए । दूसरे महीने में दही छोड़ने का नियम करना उचित है, तीसरे महीने (आश्विन) में दूध छोड़ने का नियम करना चाहिए, चौथे मास (कार्तिक) में दाल छोड़ने का नियम करे । पेठा, उड़द, मूली, गाजर, करोदा, ईख, मसूर, तरबूजा, बैंगन ये चारों महीनों में वर्जित हैं।

हे विप्रेन्द्र ! विद्वानों ने इनका व्रत में त्याग कहा है। बेर, आमला, घीया, इमली इनका विशेषता से त्याग करे । पुराना आमला तथा इमली नहीं छोड़नी चाहिए । भगवान् के शयन करने पर चार महीने तक भक्तिमान पुरुष को मचान और खाट पर नहीं सोना चाहिए । ऋतुकाल के बिना स्त्री-गमन वर्जित है, ऋतुकाल में स्त्री-संभोग वर्जित नहीं है ।

मधु (महुआ) धुली, सहजना ये चातुर्मास्य में वर्जित हैं। बैंगन, तरबूजा, बेल, गूलर, निःसटा ये जिसके पेट में हैं उससे भगवान् दूर रहते हैं। उपवास, नक्त भोजन, एक बार भोजन, अयाचित इनमें से कोई नियम करे। यदि नियम करने की शक्ति न हो तो प्रातःकाल और सायंकाल भोजन करे ।

जो नित्य भगवान का पूजन करता है वह वैकुण्ठ को जाता है। जो भगवान के गीत गाता और बाजे बजाता है, वह गन्धर्व-लोक को जाता है । चातुर्मास्य में शहद छोड़ने से राजा होता है, गुड़ छोड़ने से सन्तान की वृद्धि होती है । हे राजन् ! तेल छोड़ने से सुन्दर शरीर होता है। कुसुम का तेल छोड़ने से शत्रु का नाश होता है । महुआ का तेल छोड़ने से भाग्यशाली होता है । कड़वा, तीखा, मीठा, कसैला और नमक इन रसों को छोड़ने से कुरूप और दुर्गन्ध वाला नहीं होता। पुष्य आदि छोड़ने से स्वर्ग में विद्याधर होता है ।

जो योगाभ्यासी होता है वह ब्रह्मा की पदवी को प्राप्त करता है। ताम्बूल (पान) छोड़ने से रोगी का रोग शीघ्र दूर हो जाता है । पैर और मस्तक में तेल मर्दन छोड़ने से प्रकाशमान और दिव्य इन्द्रिय वाला होकर कुबेर के तुल्य धनवान् होता है । दही, दूध छोड़ने से गोलोक को जाता है। स्थालीपाक छोड़ने से इन्द्रलोक को जाता है । एक दिन छोड़कर व्रत करने से ब्रह्मलोक में सुख भोगता है। जो चार महीने तक बाल और नख नहीं कटवाता । हे राजन् ! उसकी एक कल्प तक की आयु होती है, इसमें सन्देह नहीं है।

जो ‘नमो नारायणाय’ मंत्र को जपता है उसको अनन्त फल मिलता है । भगवान् के चरण-कमलों का स्पर्श करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो हरिमन्दिर में लाख परिक्रमा करता है वह हंसों के विमान में बैठकर बैकुण्ठ जाता है । तीन रात भोजन का त्याग करने से स्वर्ग में देवताओं की तरह आनन्द करता है । हे राजन् ! पराया अन्न छोड़ने से मनुष्य देवता हो जाता है।

जो कोई चारो मास में प्राजापत्य व्रत करता है । वह कायिक, वाचिक, मानसिक इन तीनो पापों से छूट जाता है। जो चातुर्मास्य में तप्तकृच्छ्र और अतिकृच्छ्र व्रत करता है । वह परमलोक को जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। जो चारों मास में चान्द्रायण व्रत करता है । वह दिव्य शरीर धारण करके शिवलोक को जाता है। जो चातुर्मास्य में अन्न आदि खाना छोड़ता है, वह हरि-सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है, फिर संसार में जन्म नहीं लेता । जो भिक्षा माँगकर खाता है वह वेदों में पारंगत हो जाता है ।

जो चारों मासों में दूध पीकर रहता है उसका कभी वंश नष्ट नहीं होता । हे पार्थ ! पंचगव्य के पीने से चान्द्रायण का फल मिलता है। तीन दिन जल छोड़ने से रोग से दुखी नहीं होता । हे पार्थ ! इन नियमों के करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। जिस दिन से भगवान क्षीरसागर में शयन करते हैं और जब जागते हैं, उतने दिन तक एकाग्र चित्त से उपवास करने वाले मनुष्यों को गरुड़ध्वज भगवान् श्रेष्ठगति देते हैं ।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ

कथा के अनुसार सतयुग में एक सूर्यवंशी राजा मान्धाता विख्यात हुये जो धर्मपूर्वक प्रजा पालन करते थे और उनका राज्य हर तरह से संपन्न था। एक बार पूर्व पाप के कारण अकाल पड़ गयी और सारे धर्म-कर्म का भी लोप हो गया।

३ वर्षों बाद प्रजा व्याकुल होकर राजा के पास वर्षा हेतु उचित प्रयत्न का प्रस्ताव लेकर पहुंची तो मान्धाता सेना के साथ वन में ऋषि-मुनियों के आश्रम में भटकने लगे। दैवकृपा से एक दिन उन्हें अङ्गिरा का दर्शन प्राप्त हुआ तो दंडवत करके सारी व्यथा सुनाते हुये समाधान के लिये उपाय पूछा। इस पर अङ्गिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है और सतयुग में शूद्रों को तपस्या करने का अधिकार नहीं है, तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है जिसका तुम्हें वध करना होगा।

इसपर राजा मान्धाता ने कहा कि किसी निरपराधी तपस्यारत को मारने में मैं समर्थ नहीं हूँ, कृपया कोई अन्य धर्माचरण का उपदेश करें। फिर अङ्गिरा ऋषि ने पद्मा एकादशी का उपदेश दिया, राजा और प्रजा सबने पद्मा एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से शीघ्र प्रचुर वर्षा हो गयी। इसके साथ ही इसी दिन चातुर्मास्य का आरम्भ होता है और भगवान विष्णु को शयन कराया जाता है। कथा में चातुर्मास्य की भी विशेष चर्चा करते हुये दान के विषय में बहुत विस्तार से वर्णन किया गया है।

  • पद्मा एकादशी या देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में होती है।
  • इसके अधिदेवता भगवान हृषिकेश हैं।
  • इस एकादशी को करने से विभिन्न प्रकार के उपद्रवों का शमन होता है।

कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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