जयंती एकादशी का व्रत एक पवित्र और पुण्यकारी व्रत है। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और सभी पापों का नाश हो जाता है। आत्मकल्याण चाहने वाले को जयंती एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु पार्श्व परिवर्तन करते हैं इसलिये इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है और भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग में समस्त लोक लेकर उसे पाताल भेजा था इसलिये इसे वामन एकादशी भी कहते हैं।
सर्वप्रथम जयंती (भाद्र शुक्ल पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Jayanti ekadashi vrat katha
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा – जयंती एकादशी व्रत कथा मूल संस्कृत में
युधिष्ठिर उवाच
नभस्यसिते पक्षे तु किं नामैकादशी भवेत् । को देवः को विधिस्तस्याः किं पुण्यं च वदस्व नः ॥१॥
श्रीकृष्ण उवाच
कथयामि महापुण्यां स्वर्गमोक्षप्रदायिनीम् । वामनैकादशीं राजन् ! सर्वपापहरां पराम् ॥
इमामेव जयन्त्याख्यां प्राहुरेकादशीं नृप। तस्या श्रवणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥
वाजपेयफलं प्रोक्तं नातः परतरं नृणाम् । पापिनां पापशमनं जयन्तीव्रतमुत्तमम् ॥
नातः परतरा राजन्न वै मोक्षप्रदायिनी। एतस्मात् कारणाद्राजन् कर्तव्या गतिमिच्छता ॥५॥
वैष्णवैर्मम भक्तैस्तु मनुजैस्तत्परायणैः । नभस्ते वामनो यैस्तु पूजितस्तैर्जगत्त्रयम् ॥
पूजितं नात्र संदेहस्ते यान्ति हरिसन्निधिम् । वामनः पूजितो येन कमलैः कमलेक्षणः ॥
नभस्यसितपक्षे तु जयन्त्येकादशी दिने । तेनार्चितं जगत्सर्वं त्रयो देवाः सनातनाः ॥
एतस्मात्कारणाद्राजन् कर्तव्यो हरिवासरः। अस्मिन् कृते न कर्तव्यं किञ्चिदस्ति जगत्त्रये ॥
अस्यां प्रसुप्तो भगवानेत्यंगपरिवर्त्तनम् । तस्मादेनां जनाः सर्वे वदन्ति परिवर्तिनीम् ॥१०॥
युधिष्ठिर उवाच
संशयोऽस्ति महान् मह्यं श्रूयतां च जनार्दन । कथं सुप्तोऽसि देवेश कथं यास्यङ्गवर्तनम् ॥
किमर्थं देवदेवेश बलिर्वद्धस्त्वयाऽसुरः । सन्तुष्टाः पृथिवीदेवाः किमकुर्वञ्जनार्दन ॥
को विधिः किं व्रतं चैव चातुर्मास्यमुपासताम्। त्वयि सुप्ते जगन्नाथे किं कुर्वन्ति जनाः प्रभो ॥
एतद्विस्तरतो ब्रूहि संशयं हर मे प्रभो । श्रीकृष्ण उवाच श्रूयतां राजशार्दूल कथा पापहरां पराम् ॥
बलिर्वै दानवः पूर्वमासीत्त्रेतायुगे नृप । अपूजयच्च मां नित्यं मद्भक्तो मत्परायणः ॥१५॥
जपैस्तु विविधैः सूक्तैर्यजते मां स नित्यशः । द्विजानां पूजको नित्यं यज्ञकर्म कृताशयः ॥
परन्त्विन्द्रकृतद्वेषो देवलोकमजीजयत् । मद्दत्तमिन्द्रलोकश्च जितस्तेन महात्मना ॥
विलोक्य च ततः सर्वे देवाः संहृत्य मन्त्रयन् । सर्वैर्मिलित्वा गन्तव्यं देवं विज्ञापितुं प्रभुम् ॥
ततश्च देवऋषिभिः साकमिन्द्रो गतः प्रभुम् । शिरसा ह्यवनीं गत्वा स्तुत इन्द्रेण सूक्तिभिः ॥
गुरुणा दैवतैः सार्द्धं बहुधा पूजितो ह्यहम्। ततो वामनरूपेण ह्यवतीर्णश्च पञ्चमः ॥२०॥
भगवान् उवाच
अत्युग्ररूपेण तदा सर्वं ब्रह्माण्डरूपिणा । बालकेन जितः सोऽथ सत्यमालम्ब्य तस्थिवान् ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वया वामनरूपेण सोऽसुरश्च जितः कथम् । एतत् कथय देवेश मह्यं भक्ताय विस्तरात् ॥
श्रीकृष्ण उवाच
मया बालेन स बलिः प्रार्थितो बटुरूपिणा । पदत्रयमितां भूमिं देहि मे भुवनत्रयम् ॥
दत्तं भवति ते राजन्नात्र कार्या विचारणा । इत्युक्तश्च मया राजा दत्तवांस्त्रिपदां भुवम् ॥
संकल्पमात्राद्ववृधे देहस्त्रैविक्रमः परम् । भूर्लोके तु कृतौ पादौ भुवर्लोके तु जानुनी ॥२५॥
स्वर्लोके तु कटिं न्यस्य महर्लोके तथोदरम् । जनलोके तु हृदयं तपोलोके च कण्ठकम् ॥
सत्यलोके मुखं स्थाप्य उत्तमाङ्गं तथोर्ध्वतः । चन्द्रसूर्यग्रहाश्चैव भगणो योगसंयुतः ॥
सेन्द्राश्चैव तदा देवा नागाः शेषादयः परे । अस्तुवन् वेदसम्भूतैः सूक्तैश्च विविधैस्तु माम् ॥
करे गृहीत्वा तु बलिमब्रुवं वचनं तदा । एकेनपूरिता पृथ्वी द्वितीयेन त्रिविष्टपम् ॥
तृतीयस्य तु पादस्य स्थानं देहि ममानघ । एवमुक्ते मया सोऽपि मस्तकं दत्तवान् बलिः ॥३०॥
ततो वै मस्तके ह्येकं पदं दत्तं मया तदा । क्षिप्तौ रसातले राजन् दानवो मम पूजकः ॥
विनयावनतं दृष्ट्वा प्रसन्नोऽस्मि जनार्दनः । बले वसामि सततं सन्निधौ तव मानद ॥
इत्यवोचं महाभागं बलिं वैरोचनं तदा । नभस्ये शुक्लपक्षे तु परिवर्तिनि वासरे ॥
ममैका तत्र मूर्तिश्च बलिमाश्रित्य तिष्ठति । द्वितीया शेषपृष्ठे वै क्षीराब्धौ सागरोत्तमे ॥
सुप्यते च हृषीकेशो यावच्चायाति कार्तिकी । तावद्भवति तत्पुण्यं सर्वपुण्योत्तमं स्मृतम् ॥३५॥
एतस्मात् कारणाद्राजन् कर्तव्यैषा प्रयत्नतः । एकादशी महापुण्या पवित्रा पापहारिणी ॥
अस्यां प्रसुप्तो भगवानेत्यङ्गपरिवर्त्तनम् । एतस्यां पूजयेद्देवं त्रैलोक्यस्य पितामहम् ॥
दधिदानं प्रकर्त्तव्यं रौप्यतण्डुलसंयुतम् । रात्रौ जागरणं कृत्वा मुक्तो भवति मानवः ॥
एवं यः कुरुते राजन्नेकादश्या व्रतं शुभम् । सर्वपापहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥
स देवलोकं सम्प्राप्य भ्राजते चन्द्रमा यथा । शृणुयाच्चैव यो मर्त्यः कथां पापहरां पराम् ॥४०॥
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे भाद्रपदशुक्ले परिवर्तिन्येकादशीव्रतमाहात्म्यं सम्पूर्णम् ॥२०॥
जयंती एकादशी व्रत कथा हिन्दी में
युधिष्ठिर बोले – भाद्र शुक्लपक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? कौन देवता है? क्या विधि है और क्या पुण्य है सो हमसे कहें ।
श्रीकृष्ण बोले – हे राजन् ! स्वर्ग एवं मोक्ष को देने वाली, सब पापों को हरने वाली, परम पवित्र वामन एकादशी की कथा मैं तुमसे कहता हूँ, हे नृप ! इसको जयन्ती एकादशी भी कहते हैं। इसके श्रवणमात्र से सब पाप दूर हो जाते हैं । अश्वमेध यज्ञ का फल भी इसके व्रत से बड़ा नहीं है। इस जयन्ती का व्रत पापियों को दूर करने वाला है । हे राजन् ! इससे बढ़कर कोई मोक्ष देने वाली तिथि नहीं है। हे राजन् ! इसलिए सद्गति चाहने वाले को इसका व्रत करना चाहिए ।
जिन मेरे वैष्णव भक्तों ने भादों के महीने में वामन देवजी का पूजन कर लिया, उन्होंने त्रिलोकी का पूजन कर लिया । जिसने कमल सरीखे नेत्र वाले वामन जी का कमलों से पूजन किया है वह निश्चय भगवान् के पास पहुँच जाता है ।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष में जयन्ती एकादशी के दिन जिसने भगवान् विष्णु का पूजन किया है, उसने सब जगत और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया। हे राजन् ! इसलिए जयंती अर्थात परिवर्तिनी या वामन एकादशी का व्रत करना चाहिए। इसके करने से तीनों लोकों में कुछ भी शेष नहीं रह जाता । इस एकादशी को शयन करते हुए भगवान् ने करवट ली है इसी से इसको परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं ।
युधिष्ठिर बोले – हे जनार्दन ! मुझको बड़ा संदेह है उसको दूर कीजिए । हे देवेश ! आप कैसे शयन करते हैं और किस प्रकार करवट लेते हैं। हे देवदेवेश ! आपने बलि राजा को क्यों बाँधा है ? हे जनार्दन ! ब्राह्मण क्या करने से प्रसन्न होते हैं? हे प्रभो ! चातुर्मास्य का व्रत करने वालों की कौन सी विधि है ? जगत के स्वामी ! आपके शयन करने पर मनुष्य क्या करते हैं ? हे प्रभो ! ये विस्तारपूर्वक मुझसे कहिए और मेरे संदेह को दूर कीजिये ।
श्रीकृष्ण बोले – हे राजशार्दूल ! इन पापों को दूर करने वाली कथा को सुनो । हे नृप ! पहिले त्रेता युग में बलि नाम का एक दैत्य था, वह भक्ति में तत्पर होकर नित्य प्रति मेरा पूजन करता था । वह अनेक प्रकार के सूक्तों से मेरा पूजन नित्यप्रति करता था। ब्राह्मणों का पूजन और यज्ञ भी किया करता था ।
परन्तु उस महात्मा ने इन्द्र से वैर करके मेरा दिया हुआ इन्द्रलोक और देवताओं का लोक जीत लिया । इस बात को देखकर सब देवताओं ने एकत्रित होकर विचार किया कि भगवान् के पास चलकर यह सब वृत्तान्त कहना चाहिये । फिर देवता और ऋषियों को लेकर इन्द्र, प्रभु के पास गये और पृथ्वी पर शिर झुकाकर सुन्दर वचनों से स्तुति की । देवताओं के साथ वृहस्पति जी ने मेरा अनेक बार पूजन किया । इसलिए मैंने पाँचवाँ अवतार वामन रूप से धारण किया । सम्पूर्ण ब्रह्मांड जिसमें स्थित है, ऐसे उस रूपधारी वामन ने सत्य में तत्पर राजा बलि को जीत लिया ।
युधिष्ठिर बोले – आपने वामन रूप से असुरराज बलि को कैसे जीत लिया ? हे देवेश ! यह कथा विस्तारपूर्वक कहिये, मैं आपका भक्त हूँ ।
श्रीकृष्ण बोले – मैंने ब्रह्मचारी बालक का रूप धारण करके बलिराजा से प्रार्थना की कि मुझे तीन पग भूमि दीजिए, वह मुझको तीनो लोकों के समान होगी । हे राजन् ! यह दान मुझको देना चाहिए । इसमें कुछ विचार नहीं करना चाहिए। ऐसा मेरे कहने पर राजा ने तीन पग भूमि दान कर दी । संकल्प करते ही त्रिविक्रम शरीर विशेष रूप से बढ़ने लगा ।
भूलोक में पैर फैला दिये, भुवर्लोक में जंघा हो गई, स्वर्गलोक में कटि, महर्लोक में उदर, जनःलोक में हृदय और तपोलोक में कंठ पहुँचा दिया । सत्यलोक में मुख और उससे ऊपर शिर को स्थापित कर दिया । सूर्य-चन्द्रमा से लेकर ग्रह, तारागण, योग ये सब आ गये । इन्द्र से लेकर देवता, शेष जी से लेकर नाग; ये वेद के मन्त्रों से अनेक प्रकार से स्तुति करने लगे ।
तब बलिराजा का हाथ पकड़कर मैंने उससे कहा कि एक पैर से तो पृथ्वी नाप ली और दूसरे से स्वर्ग को नाप लिया । हे अनघ ! मेरे तीसरे पैर के लिए स्थान बतलाओ । इस तरह मेरे कहने पर राजा ने अपना मस्तक दे दिया, तब मैंने उसके मस्तक पर एक पैर रख दिया। फिर मेरी पूजा करने वाला बलिराजा पाताल को चला गया । उसको नम्र देखकर मैं प्रसन्न हो गया और उससे कहा कि हे आदर करने वाले राजा ! मैं सदा तुम्हारे समीप रहूँगा ।
भादो शुक्लपक्ष की परिवर्तिनी एकादशी के दिन मैंने बड़भागी बलिराजा से ये वचन कहे । मेरी एक मूर्ति बलिराजा के आश्रम में निवास करती है और दूसरी मूर्ति क्षीरसागर में शेषजी के ऊपर शयन करती है । जब कार्तिक की एकादशी आती है वहाँ तक भगवान् शयन करते हैं। इस बीच में जो पुण्य किया जाय वह सब पुण्यों से उत्तम होता है ।
हे राजन् ! इस कारण से इस एकादशी का व्रत यत्नपूर्वक करना चाहिए। यह बहुत पवित्र है और पापों को दूर करने वाली है । सोते हुए भगवान् ने इस एकादशी को करवट ली है। इसमें त्रिलोकी के पितामह भगवान् का पूजन करना चाहिए । चाँदी और चावल सहित दही का दान करना चाहिए। रात्रि में जागरण करने से मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है ।
हे राजन् ! सब पापों को नष्ट करने वाली, इस लोक में सुख और अन्त में मोक्ष देने वाली इस सुन्दर एकादशी के व्रत को जो करता है वह देवलोक में जाकर चन्द्रमा की तरह प्रकाशित होता है। जो मनुष्य पापों को हरने वाली इस कथा को सुनता है उसको सहस्र अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है ।
जयंती एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ
भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम परिवर्तिनी एकादशी है। शयन किये भगवान विष्णु का इस एकादशी में पार्श्व परिवर्तन (करवट बदलना) होता है इसीलिए इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी एकादशी है, अन्य नाम वामन एकादशी, जयंती एकादशी भी है।
कथा के अनुसार राजा बलि से वामन भगवान ने इसी दिन तीन पग भूमि में सब-कुछ लेकर उसे पाताल लोक भेजकर सदा उसके पास रहने का वचन दिया था। भगवान विष्णु एक रूप से क्षीरसागर में और दूसरे रूप से पाताल में राजा बलि के यहां भी निवास करते हैं।
- वामन या जयंती एकादशी भाद्र मास के शुक्ल पक्ष में होती है।
- इसके अधिदेवता भगवान वामन हैं।
- वामन एकादशी की कथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।