श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस कथा में कामिका एकादशी का महत्व बताया गया है और तुलसी का भी माहात्म्य बताया गया है। यहां ब्रह्मवैवर्तपुराणोक्त कामिका एकादशी व्रत कथा दी गयी है। सर्वप्रथम कामिका (श्रावण कृष्ण पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Kamika ekadashi vrat katha
कामिका एकादशी व्रत कथा मूल संस्कृत में
युधिष्ठिर उवाच
आषाढशुक्लपक्षे तु यद्देवशयनव्रतम् । तन्मया श्रुतपूर्वं हि पुराणे बहुविस्तरम् ॥
श्रीकृष्ण उवाच
श्रावणे कृष्णपक्षे तु किं नामैकादशी भवेत् । एतत् कथय गोविन्द वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि व्रतं पापप्रणाशनम् । नारदाय पुरा राजन् पृच्छते च पितामहः ॥
परं यदुक्तवांस्तात तदहं ते वदामि च ॥ नारद उवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽहं कमलासन ॥
श्रावणस्यासिते पक्षे किन्नामैकादशी भवेत् । को देवः को विधिस्तस्याः कि पुण्यं कथय प्रभो ॥५॥
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । शृणु नारद ते वच्मि लोकानां हितकाम्यया ॥
श्रावणैकादशी कृष्णा कामिकेति च नामतः । तस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफलं लभेत् ॥
तस्य यः पूजयेद्देवं शंखचक्रगदाधरम् ॥ श्रीधराख्यं हरिं विष्णुं माधवं मधुसूदनम् ॥
व्रजते ध्यायते यो बै तस्य पुण्यफलं शृणु । न गंगायां न काश्यां वै नैमिषे न च पुष्करे ॥
तत्फलं समवाप्नोति यत्फलं विष्णुपूजनात् । केदारे च कुरुक्षेत्रे राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥१०॥
न तत्फलमवाप्नोति यत्फलं कृष्णपूजनात् ससागरवनोपेतां यो ददाति वसुन्धराम् ॥
गोदावर्या गुरौ सिंहं व्यतीपाते च गण्डके । न तत्फलमवाप्नोति यत्फलं कृष्णपूजनात् ॥
कामिकाव्रतकारी च ह्युभौ समफलौ स्मृतौ । प्रसूयमानां यो धेनुं दद्यात् सोपस्करां नरः ॥
तत्फलं समवाप्नोति कामिकाव्रतकारकः । श्रावणे श्रीधरं देवं पूजयेद्यो नरोत्तमः ॥
तेनैव पूजिता देवा गन्धर्वोरगपन्नगाः । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कामिकादिवसे हरिः ॥१५॥
पूजनीयो यथाशक्त्या मनुष्यैः पापभीरुभिः । संसारार्णवमग्ना ये पापपंकसमाकुलाः ॥
तेषामुद्धरणार्थाय कामिकाव्रतमुत्तमम् । नातः परतरा काचित् पवित्रा पापहारिणी ॥
एवं नारद जानीहि स्वयमाह पुरा हरिः । अध्यात्मविद्यानिरतैर्यत्फलं प्राप्यते नरैः ॥
ततो बहुतरं विद्धि कामिकाव्रतसेवनात् रात्रौ जागरणं कुर्यात् कामिकाव्रतकृन्नरः ॥
न पश्यति यमं रौद्रं नैव पश्यति दुर्गतिम् । न पश्यति कुयोनिं च कामिकाव्रतसेवनात् ॥२०॥
कामिकायाः व्रतेनैव कैवल्यं योगिनो गताः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यो नियतात्मभिः ॥
तुलसीप्रभवैः पत्रैर्यो नरः पूजयेद्धरिम् । न वै स लिप्यते पापैः पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
सुवर्णभारमेकं तु रजतं च चतुर्गुणम् । तत्फलं समवाप्नोति तुलसीदलपूजनात् ॥
रत्नमौक्तिकवैदूर्यप्रवालादिभिरर्चितः । न तुष्यति तथा विष्णुस्तुलसीपूजनाद्यथा ॥
तुलसीमञ्जरीभिस्तु पूजितो येन केशवः । आजन्म कृतपापस्य तेन सम्मार्जिता लिपिः ॥२५॥
या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुः पावनी ।
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासन्नविधायिनी भगवतः कृष्णस्य संरोपिता ।
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नमः ॥
दीपं ददाति यो मर्यो दिवारात्रे हरेर्दिने । तस्य पुण्यस्य संख्यानं चित्रगुप्तोऽपि वेत्ति न ॥
कृष्णाग्रे दीपको यस्य ज्वलेदेकादशीदिने । पितरस्तस्य तृप्यन्ति अमृतेन दिवि स्थिताः ॥
घृतेन दीपं प्रज्वाल्य तिलतैलेन वा पुनः । प्रयाति सूर्यलोकेऽसौ दीपकोटिशतैर्वृतः ॥
अयं तवाग्रे कथितः कामिकामहिमा मया । अतो नरैः प्रकर्तव्या सर्वपातकहारिणी ॥३०॥
ब्रह्महत्याऽपहरणी भ्रूणहत्याविनाशिनी । त्रिदिवस्थानदात्री च महापुण्यफलप्रदा ॥
श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्याः नरः श्रद्धासमन्वितः । विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे श्रावणकृष्णकामिकैकादशीवतमाहात्म्यं सम्पूर्णम् ॥१७॥
कामिका एकादशी व्रत कथा हिन्दी में
युधिष्ठिर बोले – पुराण में जो आषाढशुक्ला देवशयनी एकादशी का व्रत कहा है वह मैंने विस्तार से सुन लिया । हे गोविन्द । श्रावण कृष्णपक्ष में एकादशी का क्या नाम है, सो कहिए। हे वासुदेव ! आपको नमस्कार है ।
भगवान श्री कृष्ण बोले – हे राजन् ! पापों के नाश करने वाले व्रत को सुनो। प्राचीन समय में नारद जी के पूछने पर ब्रह्माजी ने उनसे कहा । उस उत्तम व्रत को मैं तुमसे कहता हूँ।
नारदजी बोले – हे भगवन् । हे कमलासन। मैं आपसे सुनना चाहता हूँ । हे प्रभो ! श्रावण कृष्णपक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? उसका कौन देवता है ? क्या विधि है और क्या पुण्य है सो कहिए ।
ब्रह्माजी बोले – हे नारद । संसार के हित के लिए मैं तुमसे कहता हूँ, तुम सुनो । श्रवण कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम कामिका है, उसके सुनने मात्र से अश्वमेध का फल मिलता है। उसमें जो शंख-चक-गदाधारी श्रीधर, मधुसूदन, हरि नाम वाले विष भगवान् का पूजन करता है । अथवा ध्यान करता है उसका जो फल है, उसे सुनो।
- जो फल गंगा, काशी, नैमिषारण्य और पुष्कर के स्नान से नहीं होता, वह फल विष्णु भगवान् के पूजन से होता है।
- जो फल सूर्यग्रहण में केदार क्षेत्र और कुरुक्षेत्र में स्नान-दान करने से नहीं होता, वह फल श्रीकृष्ण जी का पूजन करने से होता है।
- जो फल सरोवर और उपवन सहित भूमि-दान करने से; सिंह की बृहस्पति में गोदावरी में व्यतीपात और अतिगंड योग में स्नान से जो नहीं होता, वह श्रीकृष्ण जी के पूजन से प्राप्त होता है, कामिका का व्रत करने वाले को भी वही फल मिलता है ।
- सामग्री समेत ब्याती हुई गौ का दान करने से जो फल मिलता है, वही फल कामिका का व्रत करने वाले को प्राप्त होता है ।
जो उत्तम मनुष्य श्रावण में श्रीधर भगवान् का पूजन करता है, उसको देवता, गन्धर्व, उरग, पत्रग सबके पूजन का फल मिल जाता है, इसलिए कामिका एकादशी के दिन हरि का यत्न से पूजन करना चाहिए ।
जो पाप से डरे हुए हैं उनको शक्ति के अनुसार भगवान् का पूजन करना चाहिए । जो संसाररूपी समुद्र में डूबे हुए हैं और पापरूपी कीचड़ में फंसे हुए हैं । उनके उद्धार के लिए कामिका एकादशी व्रत उत्तम है। इनसे बढ़कर पवित्र और पापों को दूर करने वाला व्रत नहीं है ।
हे नारद ! यह भगवान् ने स्वयं अपने मुख से कहा है, इसको तुम समझ लो । अध्यात्म-विद्या में लगे हुए मनुष्यों को जो फल मिलता है, उससे विशेष फल कामिका का व्रत करने से मिलता है । कामिका का व्रत करने वाला मनुष्य जो रात में जागरण करता है उसको भयंकर यमराज दिखाई नहीं देता, न उसकी दुर्गति होती है । कामिका का व्रत करने से कुयोनि में नहीं जाता। कामिका का व्रत करने से योगी मोक्ष को प्राप्त हो गये । इसलिए सावधानी से इसका व्रत करना चाहिए ।
तुलसी के पत्तों से जो हरि का पूजन करता है वह पापों से ऐसे दूर रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से दूर रहता है। एक भार सुवर्ण और चार भार चाँदी दान करने से जो फल होता है, वह फल तुलसीदल के पूजन से मिलता है । रत्न, मोती, पन्ना, मूँगा आदि के पूजन से विष्णु इतने प्रसन्न होते हैं, जिसने तुलसी की मंजरी से केशव भगवान् का पूजन किया है उसके जन्म भर के पापों का लेखा मिटा दिया।
तुलसी, दर्शन से सब पापों को दूर करने वाली, स्पर्श करने से देह को शुद्ध करने वाली, प्रणाम करने से रोगों को दूर करने वाली, सींचने से यमराज को डराने वाली है । पौधा लगाने से भगवान् के समीप पहुँचाने वाली तथा भगवान् के चरणों पर चढ़ाने से मोक्ष देने वाली है, उस तुलसी को नमस्कार है ।
जो एकादशी के दिन दिन-रात दीपदान करता है उसके पुण्य की संख्या को चित्रगुप्त भी नहीं जान सकते । एकादशी के दिन जिसका दीपक भगवान् के सामने जलता है, उसके पितर स्वर्ग में जाकर अमृत पीकर तृप्त हो जाते हैं । घी अथवा तेल से दीपक जलाने वाला मनुष्य करोड़ों दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्यलोक को जाता है ।
यह कामिका एकादशी की महिमा मैंने तुमसे कही है। इसलिए पापों को हरने वाली एकादशी का व्रत करना चाहिए । यह ब्रह्महत्या तथा गर्भहत्या को दूर करने वाली है। स्वर्ग तथा विशेष पुण्य देने वाली है । मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका माहात्म्य सुनकर बैकुण्ठ को चला जाता है ।
कामिका एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस एकादशी की कथा में विशेषतः एकादशी व्रत का माहात्म्य वर्णित है जिसको सुनने मात्र से भी वाजपेय यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। ब्रह्महत्या – गर्भहत्या जैसे जघन्य पाप भी इस एकादशी के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। इस कथा में बताया गया है कि बड़े-बड़े व्रत-दानादि करने से भी जितना पुण्य प्राप्त नहीं होता है उससे अधिक पुण्य कामिका एकादशी व्रत करने से होता है। इस एकादशी की कथा में भगवान विष्णु को तुलसी अतिप्रिय है यह भी बताया गया है।
- कामिका एकादशी श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में होती है।
- इसमें भगवान श्रीधर के नाम से पूजा करनी चाहिये।
- कामिका एकादशी का दूसरा नाम कामदा एकादशी भी है।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।