कार्तिक माहात्म्य के दूसरे अध्याय में सत्यभामा के पूर्वजन्म की कथा है जिसका आरंभ प्रथम अध्याय में हुआ था। पूर्वजन्म में सत्यभामा का नाम गुणवती था और जब उसके पति की मृत्यु हो गयी तो शोकाकुल होने पर भी उसने धैर्य धारण किया और पति की अंतिम क्रिया करने के उपरांत आजीवन दो विशेष व्रतों का पालन करती रही एक एकादशी और दूसरी कार्तिक। दूसरे अध्याय की कथा में यह स्पष्ट हो जाता है कि कार्तिक मास भी एक व्रत ही है। इस आलेख में कार्तिक माहात्म्य अध्याय 2 की कथा पहले संस्कृत में तत्पश्चात हिन्दी में और फिर उसका सारांश दिया गया है।
कार्तिक माहात्म्य द्वितीयोध्यायः – Kartik Mahatmya Adhyay 2
श्रीकृष्ण उवाच
ततो गुणवती श्रुत्वा रक्षसा निहतावुभौ । पितृभर्तृजदुःखार्त्ता करुणां पर्यदेवयत् ॥१॥
गुणवत्युवाच
हा नाथ हा पितस्त्यक्त्वा गच्छतं क्व मया विना । बालाहं किं करोम्यद्य ह्यनाथा भवतोर्विना ॥२॥
को नु मामास्थितां गेहे भोजनाच्छादनादिभिः । अकिंचित्कुशलां स्नेहात्पालयिष्यति दूषिताम् ॥३॥
क्व यास्यामि क्व तिष्ठामि किं करोमि यथा गृणन् । विधात्रा हा हताऽस्म्यद्य कथं जीवामि बालिशा ॥४॥
श्रीकृष्ण उवाच
एवं बहुविलप्याथ कुररीव भृशातुरा । हतभाग्या हतसुखा हताशा हतजीविता ॥५॥
शरणं कं प्रयाम्यद्य यो मे दुःखं प्रमार्जति । पपात भूमौ विकला रंभा वातहता यथा ॥६॥
चिरादाश्वास्य सा भूयो विलप्य करुणं बहु । निमग्ना दुःखजलधौ शोकार्त्ता समवर्त्तत ॥७॥
सा गृहोपस्करान्सर्वान्विक्रीय शुभकर्मकृत् । तयोश्चक्रे यथाशक्ति पारलौक्यमतन्द्रिता ॥८॥
तस्मिन्नेव पुरे वासं चक्रे प्रभृतिजीवितम् । विष्णुभक्तिपरा शांता सत्यशौचा जितेंद्रिया ॥९॥
व्रतद्वयं तया सम्यगाजन्म मरणात्कृतम् । एकादशीव्रतं सम्यक्सेवनं कार्त्तिकस्य च ॥१०॥
एतद्व्रतद्वयं कांते ममातीव प्रियंकरम् । भुक्तिमुक्तिकरं पुण्यं पुत्रसंपत्तिदायकम् ॥११॥
कार्तिके मासि ते नित्यं तुलासंस्थे दिवाकरे । प्रातः स्नास्यंति ते मुक्ता महापातकिनोऽपि च ॥१२॥
स्नानं जागरणं दीपं तुलसीवनसेवनम् । कार्त्तिके मासि कुर्वंति ते नरा विष्णुमूर्त्तयः ॥१३॥
संमार्जनं गृहे विष्णोः स्वस्तिकादि निवेदनम् । विष्णुपूजां प्रकुर्वंति जीवन्मुक्ताश्च ते नराः ॥१४॥
इत्थं दिनत्रयमपि कार्तिके ये प्रकुर्वते । देवानामपि ते वंद्याः किं यैराजन्मतः कृतम् ॥१५॥
इत्थं गुणवती सम्यक्प्रत्यब्दं व्रतिनि ह्यभूत् । नित्यं विष्णोः प्रपूजायां भक्ता तत्परमानसा ॥१६॥
कदाचिज्जरुसा साऽथ कृशाङ्गी ज्वरपीडिता । स्नातुं गंगां गता कांते कथंचिच्छनकैस्तदा ॥१७॥
यावज्जलांतरगता कंपिता शीतपीडिता । तावत्सा विह्वलाऽपश्यद्विमानं प्राप्तमंबरात् ॥१८॥
शंखचक्रगदापद्मैरायुधैरुपलक्षिताः। विष्णुरूपधराः सम्यग्वैनतेय ध्वजांकितं ॥१९॥
आरोह्य व्योमानं तमप्सरोगणसेविताम् । चामरैर्वीज्यमानां तां वैकुंठमनयन्गणाः ॥२०॥
अथ सा तद्विमानस्था ज्वलदग्निशिखोपमा । कार्त्तिकव्रतपुण्येन मत्सान्निध्यगताऽभवत् ॥२१॥
अथ ब्रह्मादिदेवानां यथा प्रार्थनया भुवम् । आगच्छता गणाः सर्वे यातास्तेऽपि मया सह ॥२२॥
एते हि यादवाः सर्वे मद्गणा एव भामिनि । पिता ते देवशर्माऽभूत्सत्राजिदभिधो ह्ययम् ॥२३॥
यश्चंद्रशर्मा सोऽक्रूरस्त्वं सा गुणवती शुभा । कार्त्तिकव्रतपुण्येन बहुमत्प्रीतिदायिनी ॥२४॥
ममद्वारि त्वया पूर्वं तुलसीवाटिका कृता । तस्मादयं कल्पवृक्षस्तवांगणगतआः शुभे ॥२५॥
कार्तिके दीपमानं च यत्त्वया तु कृतं पुनः । त्वद्देहगेहसंस्थेयं तस्माल्लक्ष्मीः स्थिराऽभवत् ॥२६॥
यच्च व्रतादिकं सर्वं विष्णवे भर्तृरूपिणे । निवेदितवती तस्मान्मम भार्यात्वमागता ॥२७॥
आजन्ममरणात्पूर्वं कार्त्तिके यद्व्रतं कृतम् । कदाचिदपि तेनैव मद्वियोगं न यास्यसि ॥२८॥
एवं ये कार्त्तिके मासे नरा व्रतपरायणाः । मत्सान्निध्यं गतास्तेऽपि प्रीतिदा त्वं यथा मम ॥२९॥
यज्ञदानव्रततपः कारिणो मानवाः खलु । कार्त्तिकव्रतपुण्यस्य नाप्नुवंति कलामपि ॥३०॥
सूत उवाच
इत्थं निशम्य भुवनाधिपतेस्तदानीं प्राक्पुण्यजन्मभव वैभव जातहर्षा ।
विश्वेश्वरं त्रिभुवनैक निदानभूतं कृष्णंप्रणम्य वचनं निजगाद सत्या ॥३१॥
॥इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥
कार्तिक माहात्म्य अध्याय २ हिन्दी में
भगवान श्रीकृष्ण आगे बोले : हे प्रिये! जब गुणवती को राक्षस द्वारा अपने पति एवं पिता के मारे जाने का समाचार मिला तो वह विलाप करने लगी,
“हा नाथ! हा पिता! मुझको त्यागकर तुम कहां चले गये? मैं अकेली स्त्री, तुम्हारे बिना अब क्या करूँ?अब मेरे भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था कौन करेगा। घर में प्रेमपूर्वक मेरा पालन-पोषण कौन करेगा? मैं कुछ भी नहीं कर सकती, मुझ विधवा की कौन रक्षा करेगा, मैं कहां जाऊँ? मेरे पास तो अब कोई ठिकाना भी नहीं रहा।”
इस प्रकार विलाप करते हुए गुणवती चक्कर खाकर धरती पर गिर पड़ी और बेहोश हो गई।
बहुत देर बाद जब उसे होश आया तो वह पहले की ही भाँति करुण विलाप करते हुए शोक सागर में डूब गई। कुछ समय के पश्चात जब वह संभली तो उसे ध्यान आया कि पिता और पति की मृत्यु के बाद मुझे उनकी क्रिया करनी चाहिए। जिससे उनकी गति हो सके इसलिए उसने अपने घर का सारा सामान बेच दिया और उससे प्राप्त धन से उसने अपने पिता एवं पति का श्राद्ध आदि कर्म किया। तत्पश्चात वह उसी नगर में रहते हुए आठों पहर भगवान विष्णु की भक्ति करने लगी। उसने मृत्युपर्यन्त नियमपूर्वक सभी एकादशियों का व्रत और कार्तिक महीने में उपवास एवं व्रत किये।

हे प्रिये! एकादशी और कार्तिक व्रत मुझे बहुत ही प्रिय हैं। इनसे मुक्ति, भुक्ति, पुत्र तथा सम्पत्ति प्राप्त होती है। कार्तिक मास में जब तुला राशि पर सूर्य आता है तब ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करने व व्रत व उपवास करने वाले मनुष्य मुझे बहुत प्रिय हैं क्योंकि यदि उन्होंने पाप भी किये हों तो भी स्नान व व्रत के प्रभाव से उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
कार्तिक में स्नान, जागरण, दीपदान तथा तुलसी के पौधे की रक्षा करने वाले मनुष्य साक्षात भगवान विष्णु के समान है। कार्तिक मास में मन्दिर में झाड़ू लगाने वाले, स्वास्तिक बनाने वाले तथा भगवान विष्णु की पूजा करने वाले मनुष्य जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पा जाते हैं।
यह सुनकर गुणवती भी प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक कार्तिक का व्रत और भगवान विष्णु की पूजा करने लगी। हे प्रिये! एक बार उसे ज्वर हो गया और वह बहुत कमजोर भी हो गई फिर भी वह किसी प्रकार गंगा स्नान के लिए चली गई। गंगा तक तो वह पहुंच गई परन्तु शीत के कारण वह बुरी तरह से कांप रही थी, इस कारण वह शिथिल हो गई; तब मेरे (भगवान विष्णु) दूत उसे मेरे धाम में ले आये।
तत्पश्चात ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना पर जब मैंने कृष्ण का अवतार लिया तो मेरे गण भी मेरे साथ इस पृथ्वी पर आये जो इस समय यादव हैं। तुम्हारे पिता पूर्वजन्म में देवशर्मा थे तो इस समय सत्राजित हैं। पूर्वजन्म में चन्द्र शर्मा जो तुम्हारा पति था, वह डाकू है और हे देवि! तू ही वह गुणवती है। कार्तिक व्रत के प्रभाव के कारण ही तू मेरी अर्द्धांगिनी हुई है।
पूर्व जन्म में तुमने मेरे मन्दिर के द्वार पर तुलसी का पौधा लगाया था। इस समय वह तेरे महलों के आंगन में कल्पवृक्ष के रुप में विद्यमान है। उस जन्म में जो तुमने दीपदान किया था उसी कारण तुम्हारी देह इतनी सुन्दर है और तुम्हारे घर में साक्षात लक्ष्मी का वास है। चूंकि तुमने पूर्वजन्म में अपने सभी व्रतों का फल पतिस्वरुप विष्णु को अर्पित किया था उसी के प्रभाव से इस जन्म में तुम मेरी प्रिय पत्नी हुई हो। पूर्वजन्म में तुमने नियमपूर्वक जो कार्तिक मास का व्रत किया था उसी के कारण मेरा और तुम्हारा कभी वियोग नहीं होगा।
इस प्रकार कार्तिक मास में व्रत आदि करने वाले मनुष्य मुझे तुम्हारे समान प्रिय हैं। दूसरे जप तप, यज्ञ, दान आदि करने से प्राप्त फल कार्तिक मास में किये गये व्रत के फल से बहुत थोड़ा होता है अर्थात कार्तिक मास के व्रतों का सोलहवां भाग भी नहीं होता है।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 2 सारांश/भावार्थ
सत्यभामा पूर्व जन्म में गुणवती नामक ब्राह्मण कन्या थी जिसका पति असमय स्वर्गवासी हो गया और विलाप करते हुये गुणवती बेहोश हो गयी। फिर चेतना आने पर उसने पति के सद्गति का विचार करके धैर्य धारण करते हुये उसकी अंतिम क्रिया को संपन्न किया। तत्पश्चात आजीवन दो व्रतों एकादशी और कार्तिक मास; को करते हुये भगवान विष्णु की भक्ति में जीवन व्यतीत करने लगी।
यहां पर आध्यात्मिक और सांसारिक दृषिकोण का अंतर समझा जा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आत्मकल्याण का प्रयास करना चाहिये किन्तु सांसारिक दृष्टिकोण से पति की मृत्यु तो दूर की बात है एक पति का त्याग कर दूसरा पति भी करने का समर्थन किया जाता है। वास्तव में वैश्विक रूप से लोगों के विचारों को जो प्रभावित करने वाले हैं वो नास्तिक और भोगवादी हैं। वर्त्तमान भारत में भी आत्मकल्याण का विचार करने वाले नगण्य होते जा रहे हैं और भोगवादी रक्तबीज की तरह विस्तार।
पूरी-की-पूरी राजव्यवस्था भोगवाद के सिद्धांत से संचालित हो रही है एवं सभी विधान भी भोगवाद के समर्थन में ही बनाये जा रहे हैं। जिसने भोगवाद को संरक्षण दिया उसे सुधारवादी और महान कहा जाता है, उसी की पूजा की जाती है। जो आत्मकल्याण संबंधी विचारों और विषयों की चर्चा करता है उसे १९वीं सदी का घोषित किया जाता है। उन सभी भोगवादियों को कार्तिक माहात्म्य की कथा श्रवण-मनन और चिंतन करने की आवश्यकता है।
इसके साथ ही दूसरे अध्याय में तुलसी के पौधा लगाने का महत्व, दीपदान का महत्व, भगवान को कर्मार्पण करने का महत्व बताते हुये कार्तिक मास का भी माहात्म्य बताया गया है।
यही बताते हुये भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा को कहते हैं : “पूर्व जन्म में तुमने मेरे मन्दिर के द्वार पर तुलसी का पौधा लगाया था। इस समय वह तेरे महलों के आंगन में कल्पवृक्ष के रुप में विद्यमान है। उस जन्म में जो तुमने दीपदान किया था उसी कारण तुम्हारी देह इतनी सुन्दर है और तुम्हारे घर में साक्षात लक्ष्मी का वास है। चूंकि तुमने पूर्वजन्म में अपने सभी व्रतों का फल पतिस्वरुप विष्णु को अर्पित किया था उसी के प्रभाव से इस जन्म में तुम मेरी प्रिय पत्नी हुई हो। पूर्वजन्म में तुमने नियमपूर्वक जो कार्तिक मास का व्रत किया था उसी के कारण मेरा और तुम्हारा कभी वियोग नहीं होगा।”
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
6 thoughts on “कार्तिक माहात्म्य द्वितीयोध्यायः – Kartik Mahatmya Adhyay 2”