एक दिन भगवान विष्णु के भक्त विष्णुदास ने भोजन बनाया, लेकिन कोई उसे चोरी कर ले गया। सात दिनों तक यह क्रम चलता रहा। विष्णुदास ने तय किया कि वे भोजन की सुरक्षा करेंगे। चुराने वाले व्यक्ति को एक चाण्डाल समझ कर उन्होंने दया दिखाई। जब चाण्डाल बेहोश हुआ, तो वह वास्तव में भगवान विष्णु निकले। विष्णुदास ने अद्भुत अनुभव किया और भगवान ने उन्हें अपने साथ वैकुण्ठधाम ले गए। राजा चोल ने देखा कि विष्णुदास भक्ति के कारण भगवान के पास जा रहे हैं जबकि उसने यज्ञ और दान किए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भगवान की कृपा भक्तिपूर्ण आस्था पर निर्भर करती है। सर्वप्रथम मूल माहात्म्य संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश ।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 मूल संस्कृत में
गणावूचतुः
कदाचिद्विष्णुदासोऽथ कृत्वा नित्यविधिं द्विजः । पाक कर्माकरोद्यावदहरत्कोऽप्यलक्षितः ॥१॥
तमदृष्ट्वाऽप्यसौ पाकं पुनर्नैवाकरोत्तदा । सायंकालार्चनस्याऽसौ व्रतभंगभयाद्द्विजः ॥२॥
द्वितीयेऽह्नि ततः पाकं कृत्वा यावत्स विष्णवे । उपहारार्पणं कर्तुं तावत्कोऽप्यहरत्पुनः ॥३॥
एवं सप्तदिनं तस्य पाकं कोऽप्यहरद्द्विज । जातः सविस्मयः सोऽथ मनस्येव व्यचारयत् ॥४॥
अहो नित्यं समभ्येत्य कः पाकं हरते मम । क्षेत्रसंन्यासिनां स्थानमत्याज्यं सर्वथा मया ॥५॥
पुनः पाकं विधायात्र भुज्यते यदि चेन्मया । सायंकालार्चनं चैतत्परित्याज्यं कथं मया ॥६॥
किंचित्पाकं विधायैतद्भोक्तव्यं तु मया नहि । अनिर्वेद्य हरौ सर्वं वैष्णवैर्नैव भुज्यते ॥७॥
उपोषितोऽहं च कथं तिष्ठाम्यत्र व्रतस्थितः । अद्य संरक्षणं सम्यक्पाकस्यात्र करोम्यहम् ॥८॥
इति पाकं विधायासौ तत्रैवालक्षितः स्थितः । तावद्ददर्श चांडालं पाकान्नहरणे स्थितम् ॥९॥
क्षुत्क्षामं दीनवदनमस्थिचर्मावशेषितम् । तमालोक्य द्विजाग्र्योभूत्कृपयापन्नमानसः ॥१०॥
विलोक्यान्नहरं विप्रस्तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत । कथमत्ति भवान्रूक्षं घृतमेतद्गृहाण भोः ॥११॥
इत्थं ब्रुवंतं विप्राग्र्यं आयांतं च विलोक्य सः । वेगादधावत्तद्भीत्या मूर्च्छितश्च पपात ह ॥१२॥
भीतं तं मूर्च्छितं दृष्ट्वा चांडालं स द्विजोत्तमः । वेगादभ्येत्य कृपया स्ववस्त्रांतैरवीजयत् ॥१३॥
अथोत्थितं तमेवासौ विष्णुदासो व्यलोकयत् । साक्षान्नारायणं देवं शंखचक्रगदाधरम् ॥१४॥
पीतांबरं चतुर्बाहुं श्रीवत्सांकं किरीटिनम् । अतसीपुष्पसंकाशं कौस्तुभोरःस्थलं विभुम् ॥१५॥
तं दृष्ट्वा सात्विकैर्भावैरावृतो द्विजसत्तमः । स्तोतुं चापि नमस्कर्तुं तदानालं बभूव सः ॥१६॥
अथ शक्रादयो देवास्तत्रैवाभ्याययुस्तदा । गंधर्वाप्सरसश्चापि जगुश्च ननृतुर्मुदा ॥१७॥
विमानशतसंकीर्णं देवर्षिगणसंकुलम् । गीतवादित्रनिर्घोषं स्थानं तदभवत्तदा ॥१८॥
ततो विष्णुः समालिंग्य स्वभक्तं सात्विकं तथा । सायुज्यमात्मनो दत्त्वाऽनयद्वैकुंठमंदिरम् ॥१९॥
विमानवरसंस्थानमास्थितं विष्णुसन्निधौ । दीक्षितश्चोलनृपतिर्विष्णुदासं ददर्श ह ॥२०॥
वैकुंठभवनं यान्तं विष्णुदासं विलोक्य सः । स्वगुरुं मुद्गलं वेगादाह्वयेत्थं वचोऽब्रवीत् ॥२१॥
चोल उवाच
यत्स्पर्धया मया चैतद्यज्ञदानादिकं कृतम् । स विष्णुरूपधृग्विप्रो याति वैकुंठमंदिरम् ॥२२॥
दीक्षितेन मया सम्यक्सत्रेऽस्मिन्विष्णवे त्वया । हुतमग्नौ कृता विप्रा दानाद्यैः पूर्णमानसाः ॥२३॥
नैवाद्यापि समे देवः प्रसन्नो जायते ध्रुवम् । भक्त्यैव तस्य विप्रस्य साक्षात्कारं ददौ हरिः ॥२४॥
तस्माद्दानैश्च यज्ञैश्च नैव विष्णुः प्रसीदति । भक्तिरेव परं तस्य निदानं दर्शने विभोः ॥२५॥
गणावूचतुः
इत्युक्त्वा भागिनेयं स्वमभिषिच्य नृपासने । आबाल्याद्दीक्षितो यज्ञे सा पुत्रत्वमगाद्यतः ॥२६॥
तस्मादद्यापि तद्देशे सदा राज्यांशभागिनः । स्वस्रेया एव जायंते तत्कृताचारवर्तिनः ॥२७॥
यज्ञवाटं ततोऽभ्येत्य वह्निकुंडाग्रतः स्थितः । त्रिरुच्चैर्व्याजहाराशु विष्णुं संबोधयंस्तदा ॥२८॥
विष्णोर्भक्तिं स्थिरां देहि मनोवाक्कायकर्मभिः । इत्युक्त्वा सोऽपतद्वह्नौ सर्वेषामेव पश्यताम् ॥२९॥
मुद्गलस्तु तदा क्रोधाच्छिखामुत्पाटयत्स्वकाम् । ततस्त्वद्यापि तद्गोत्रे मुद्गला विशिखाभवन् ॥३०॥
तावदाविरभूद्विष्णुः कुंडाग्नौ भक्तवत्सलः । तमालिंग्य विमानाग्र्यं समारोहयदच्युतः ॥३१॥
तमालिंग्यात्मसारूप्यं दत्त्वा वैकुंठमंदिरम् । तेनैव सह देवेशो जगाम त्रिदशैर्वृतः ॥३२॥
नारद उवाच
यो विष्णुदासः स तु पुण्यशीलो यश्चोलभूपः स सुशील नामा ।
एतावुभौ तत्समरूपभाजौ द्वाःस्थौ कृतौ तेन रमाप्रियेण ॥३३॥
॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये कार्तिकामाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यभामासंवादे विष्णुदासचोलोपाख्यानं द्वाविंशोऽध्यायः ॥
कार्तिक मास कथा : कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 हिन्दी में
पार्षदों ने कहा – एक दिन की बात है, विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के पश्चात भोजन बनाया किन्तु कोई छिपकर उसे चुरा ले गया। विष्णुदास ने देखा भोजन नहीं है परन्तु उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि ऐसा करने पर सायंकाल की पूजा के लिए उन्हें अवकाश नहीं मिलता, अत: प्रतिदिन के नियम का भंग हो जाने के भय से दुबारा पाककर्म नहीं किया। दूसरे दिन पुन: उसी समय पर भोजन बनाकर वे ज्यों ही भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने के लिए गये त्यों ही किसी ने आकर फिर सारा भोजन चुरा लिया।
इस प्रकार सात दिनों तक लगातार कोई उनका भोजन चुराकर ले जाता रहा। इससे विष्णुदास को बड़ा विस्मय हुआ वे मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगे – अहो! कौन प्रतिदिन आकर मेरी रसोई चुरा ले जाता है। यदि दुबारा रसोई बनाकर भोजन करता हूँ तो सायंकाल की पूजा छूट जाती है। यदि रसोई बनाकर तुरन्त ही भोजन कर लेना उचित हो तो मुझसे यह न होगा क्योंकि भगवान विष्णु को सब कुछ अर्पण किये बिना कोई भी वैष्णव भोजन नहीं करता। आज उपवास करते मुझे सात दिन हो गये; इस प्रकार मैं व्रत में कब तक स्थिर रह सकता हूँ। अच्छा तो यही होगा कि आज मैं रसोई की भली-भाँति रक्षा करुँ।
ऐसा निश्चय करके भोजन बनाने के पश्चात वे वहीं कहीं छिपकर खड़े हो गये। इतने में ही उन्हें एक चाण्डाल दिखाई दिया जो रसोई का अन्न हरकर जाने के लिए तैयार खड़ा था। भूख के मारे उसका सारा शरीर दुर्बल हो गया था मुख पर दीनता छा रही थी। शरीर में हाड़ और चाम के सिवा कुछ शेष नहीं बचा था। उसे देखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णुदास का हृदय करुणा से भर आया। उन्होंने भोजन चुराने वाले चाण्डाल की ओर देखकर कहा – भैया! जरा ठहरो, ठहरो! क्यों रूखा-सूखा खाते हो? यह घी तो ले लो।
इस प्रकार कहते हुए विप्रवर विष्णुदास को आते देख वह चाण्डाल भय के मारे बड़े वेग से भागा और कुछ ही दूरी पर मूर्छित होकर गिर पड़ा। चाण्डाल को भयभीत और मूर्छित देखकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास बड़े वेग से उसके समीप आये और दयावश अपने वस्त्र के छोर से उसको हवा करने लगे। तदन्तर जब वह उठकर खड़ा हुआ तब विष्णुदास ने देखा वहाँ चाण्डाल नहीं हैं बल्कि साक्षात नारायण ही शंख, चक्र और गदा धारण किये सामने उपस्थित हैं।
अपने प्रभु को प्रत्यक्ष देखकर विष्णुदास सात्विक भावों के वशीभूत हो गये। वे स्तुति और नमस्कार करने में भी समर्थ न हो सके तब भगवान ने सात्विक व्रत का पालन करने वाले अपने भक्त विष्णुदास को हृदय से लगा लिया और उन्हें अपने जैसा रूप (सारूप्य) देकर वैकुण्ठधाम को ले चले।
उस समय यज्ञ में दीक्षित हुए राजा चोल ने देखा – विष्णुदास एक श्रेष्ठ विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के समीप जा रहे हैं। विष्णुदास को वैकुण्ठधाम में जाते देख राजा ने शीघ्र ही अपने गुरु महर्षि मुद्गल को बुलाया और इस प्रकार कहना आरम्भ किया – जिसके साथ स्पर्धा करके मैंने इस यज्ञ, दान आदि कर्म का अनुष्ठान किया है वह ब्राह्मण आज भगवान विष्णु का रुप धारण करके मुझसे पहले ही वैकुण्ठधाम को जा रहा है।
मैंने इस वैष्णवधाम में भली-भाँति दीक्षित होकर अग्नि में हवन किया और दान आदि के द्वारा ब्राह्मणों का मनोरथ पूर्ण किया तथापि अभी तक भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए और इस विष्णुदास को केवल भक्ति के ही कारण श्रीहरि ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अत: जान पड़ता है कि भगवान विष्णु केवल दान और यज्ञों से प्रसन्न नहीं होते। उन प्रभु का दर्शन कराने में भक्ति ही प्रधान कारण है।
दोनों पार्षदों ने कहा – इस प्रकार कहकर राजा ने अपने भानजे को राज सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया। वे बचपन से ही यज्ञ की दीक्षा लेकर उसी में संलग्न रहते थे इसलिए उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था। यही कारण है कि उस देश में अब तक भानजे ही राज्य के उत्तराधिकारी होते हैं।
भानजे को राज्य देकर राजा यज्ञशाला में गये और यज्ञकुण्ड के सामने खड़े होकर भगवान विष्णु को सम्बोधित करते हुए तीन बार उच्च स्वर से निम्नांकित वचन बोले – भगवान विष्णु! आप मुझे मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा होने वाली अविचल भक्ति प्रदान कीजिए। इस प्रकार कहकर वे सबके देखते-देखते अग्निकुण्ड में कूद पड़े।
इसी घटना में एक और विषय जुड़ गया, उपरोक्त विषय को लेकर वो मुद्गल ऋषि व्यथित हो गये और उन्होंने अपनी शिखा उखाड़ कर फेंक दिया और तब से मुद्गल गोत्रवाले शिखा धारण नहीं करते हैं।
बस, उसी क्षण भक्तवत्सल भगवान विष्णु अग्निकुण्ड में प्रकट हो गये। उन्होंने राजा को भी हृदय से लगाकर एक श्रेष्ठ विमान में बैठाया और उन्हें अपने साथ लेकर वैकुण्ठधाम को प्रस्थान किया। नारद जी बोले – हे राजन्! जो विष्णुदास थे वे तो पुण्यशील नाम से प्रसिद्ध भगवान के पार्षद हुए और जो राजा चोल थे उनका नाम सुशील हुआ। इन दोनों को अपने ही समान रूप देकर भगवान लक्ष्मीपति ने अपना द्वारपाल बना लिया।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 भावार्थ/सारांश
पार्षदों ने कहा – एक दिन विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के बाद भोजन बनाया, किन्तु कोई उसे चुरा ले गया। उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि पूजा का समय छूट जाता। अगले दिन भी भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने जाते समय भोजन फिर चुराया गया। इस क्रम में सात दिन बीत गये। विष्णुदास सोचने लगे – कौन ऐसा कर रहा है? उन्होंने रसोई की रक्षा करने का निश्चय किया। जब वे छिपकर खड़े हुए, तो एक चाण्डाल अन्न चुराने आया। उसे देख विष्णुदास का हृदय करुणा से भर आया और उन्होंने कहा – यह घी ले लो।
चाण्डाल उनके देखते ही भागा और मूर्छित होकर गिर पड़ा। विष्णुदास ने उसे हवा दी और जब वह उठ खड़ा हुआ, तब उन्होंने देखा कि वहाँ नारायण स्वयं उपस्थित हैं। प्रभु को देख वे स्तुति करने में असमर्थ हो गये। भगवान ने उन्हें हृदय से लगा लिया और वैकुण्ठधाम को ले गये। यज्ञ में राजा चोल ने देखा कि विष्णुदास विमान पर भगवान विष्णु के समीप जा रहे हैं। राजा ने गुरु महर्षि मुद्गल को बताया कि वह ब्राह्मण भगवान का रूप है। उसने दान और यज्ञ किए, पर भगवान मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए।
इसी कारण राजा ने अपने भानजे को राज सिंहासन पर अभिषिक्त किया और यज्ञकुण्ड के सामने खड़ा होकर भगवान विष्णु से कहा – मुझे अविचल भक्ति प्रदान करें। यह कहकर वे अग्निकुण्ड में कूद पड़े। भक्तवत्सल भगवान विष्णु भी वहाँ प्रकट हुए और राजा को अपने साथ वैकुण्ठधाम ले गये। नारद जी बोले – विष्णुदास पुण्यशील नाम के पार्षद बने और राजा चोल सुशील हुए। सभी देवताओं ने भगवान विष्णु की जयजयकार की।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।