भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय का पूर्वजन्म में महर्षि कर्दमपुत्रों के रूप में उल्लेख है। एक यज्ञ के दौरान धन के विभाजन पर उन दोनों के बीच विवाद होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे एक-दूसरे को शाप देते हैं और मगरमच्छ तथा हाथी की योनि में गिर जाते हैं। अंततः भगवान विष्णु उनके उद्धार के लिए प्रकट होते हैं और उन्हें वैकुण्ठधाम ले जाते हैं। धर्मदत्त को इस कथा से उपदेश मिलता है कि भक्ति से वह भी वैकुण्ठधाम प्राप्त कर सकता है। सर्वप्रथम मूल माहात्म्य संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश ।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 23 मूल संस्कृत में
धर्मदत्त उवाच
जयश्च विजयश्चैव विष्णोर्द्वाऽस्थौ मया श्रुतौ । किंतु ताभ्यां पुरा चीर्णं यस्मात्तद्रूपधारिणौ ॥१॥
गणावूचतुः
तृणबिंदोस्तु कन्यायां देवहूत्यां पुरा द्विजः । कर्दमस्य तु दृष्ट्यैव पुत्रौ द्वौ संबभूवतुः ॥२॥
ज्येष्ठो जयः कनिष्ठोऽभूद्विजयश्चेति नामतः । अन्यस्यामभवत्पश्चात्कपिलो योगधर्मवित् ॥३॥
जयश्च विजयश्चैव विष्णुभक्तिरतौ सदा । संनियम्येंद्रियग्रामं धर्मशीलौ बभूवतुः ॥४॥
नित्यमष्टाक्षरी जाप्यौ विष्णुव्रतपरावुभौ । साक्षात्कारं ददौ विष्णुस्तयोर्नित्यार्चने सदा ॥५॥
मरुत्तेन कदाचित्तावाहूतौ यज्ञकर्मणि । जग्मतुर्यज्ञकुशलौ देवर्षिगणसेवितौ ॥६॥
जयस्तत्राभवद्ब्रह्मा याजको विजयोऽभवत् । ततो यज्ञविधिं कृत्स्नं परिपूर्णं च चक्रतुः ॥७॥
मरुतोऽवभृथस्नातस्ताभ्यां वित्तं ददौ बहु । तत्समादाय तौ वित्तं जग्मतुः स्वाश्रमं प्रति ॥८॥
यजनाय तदा विष्णोस्तुष्ट्यर्थं तौ तदा मुने । तद्धनं विभजंतो वै पस्पर्द्धाते परस्परम् ॥९॥
जयोऽब्रवीत्समो भागः क्रियतामिति तत्र सः । विजयश्चाब्रवीत्तत्र यल्लब्धं येन तस्य तत् ॥१०॥
ततो जयोऽशपत्क्रोधाद्विजयं क्षुब्धमानसः । गृहीत्वा न ददास्येतत्तस्माद्ग्राहो भवेति तम् ॥११॥
विजयस्तस्य तं शापं श्रुत्वा सोऽप्यशपच्च तम् । मतभ्रांतोशपद्यस्मात्तस्मान्मातंगतां व्रज ॥१२॥
तौ तथा चख्यतुर्विष्णुं दृष्ट्वा नित्यार्चने विभुम् । शापयोस्तुनिवृत्तिं तौ ययाचाते रमापतिम् ॥१३॥
जयविजयावूचतुः
भक्तावावां कथं देव ग्राहमांतगयोनिगौ । भविष्यावः कृपासिंधो तच्छापो विनिवर्त्यताम् ॥१४॥
श्रीभगवानुवाच
मद्भक्तयोर्वचोऽसत्यं न कदाचिद्भविष्यति । मयापि नान्यथा कर्तुं शक्यते तत्कदाचन ॥१५॥
प्रह्लादवचनात्स्तंभऽप्याविर्भूतो ह्यहं पुरा । तथांबरीषवाक्येन जातो मार्गे स्वयं किल ॥१६॥
तस्माद्ध्रुवमिमौ शापावनुभूय स्वयंकृतौ । लभेतां मत्पदं नित्यमित्युक्त्वांतर्दधे हरिः ॥१७॥
गणावूचतुः
ततस्तौ ग्राहमातंगा वभूतां गंडकी तटे । जातिस्मरौ च तद्योन्यामपि विष्णुव्रते स्थितौ ॥१८॥
कदाचित्स गजः स्नातुं कार्तिके गंडकीं गतः । तावज्जग्राह च ग्राहः संस्मरञ्छापकारणम् ॥१९॥
ग्राहगृहीतोऽसौ नागः संस्मार श्रीपतिं तदा । तावदाविर्भवद्विष्णुः शंखचक्रगदाधरः ॥२०॥
ततस्तौ ग्राहमातंगौ चक्रं क्षिप्त्वा समुद्धृतौ । दत्त्वा च निजसारूप्यं वैकुंठमनयद्विभुः ॥२१॥
तदाप्रभृति तत्स्थानं हरिक्षेत्रमिति श्रुतम् । चक्रसंघर्षणाद्यस्मिन्पाषाणोऽपि हि लांछितः ॥२२॥
ताविमौ विश्रुतौ लोके जयश्च विजयश्च ह । नित्यं विष्णुप्रियौ द्वाःस्थौ पृष्टौ यौ हि त्वया द्विज ॥२३॥
अतस्त्वमपि धर्मज्ञ नित्यं विष्णुव्रते स्थितः । त्यक्तमात्सर्यदंभो हि भवस्व समदर्शनः ॥२४॥
तुलामकरमेषेषु प्रातःस्नायी सदा भव । एकादशीव्रते तिष्ठ तुलसीवनपालकः ॥२५॥
ब्राह्मणानपि गाश्चापि वैष्णवांश्च सदा भज । मसूराश्चारनालाश्च वृंताकानपि खाद मा ॥२६॥
एवं त्वमपि देहांते तद्विष्णोः परमं पदम् । प्राप्नोषि धर्मदत्त त्वं तद्भक्त्यैव यथा वयम् ॥२७॥
तवाजन्मव्रतात्तस्माद्विष्णुसंतुष्टिकारकात् । न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै ॥२८॥
धन्योऽसि विप्राग्र्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकरं जगद्गुरोः ।
यत्पुण्यभागाप्तफलं मुरारेः प्रणीयतेऽस्माभिरियं सलोकताम् ॥२९॥
नारद उवाच
इत्थं तौ धर्मदत्तं तमुपदिश्य विमानगौ । तया कलहया सार्द्धं वैकुंठभवनं गतौ ॥३०॥
धर्मदत्तोप्यसौ जातप्रत्ययस्तद्व्रते स्थितः । देहांते तद्विभोः स्थानं भार्याभ्यामन्वितोऽभ्यगात् ॥३१॥
इतिहासमिमं पुराभवं शृणुते यश्च पुमान्यथाविधि ।
हरिसंनिधिकारिणीं मतिं लभतेऽसौ कृपया जगद्गुरोः ॥३२॥
॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये कार्तिकामाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यभामासंवादे कलहायावैकुण्ठप्राप्तिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥
कार्तिक मास कथा : कार्तिक माहात्म्य अध्याय 23 हिन्दी में
धर्मदत्त ने पूछा – मैंने सुना है कि जय और विजय भी भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं। उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा पुण्य किया था जिससे वे भगवान के समान रूप धारण कर वैकुण्ठधाम के द्वारपाल हुए?
दोनों पार्षदों ने कहा – ब्रह्मन! पूर्वकाल में तृणविन्दु की कन्या देवहूति के गर्भ से महर्षि कर्दम की दृष्टिमात्र से दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें से बड़े का नाम जय और छोटे का नाम विजय हुआ। ये दोनों भाई विशेष रूप से भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे और उनके प्रति उनकी सच्ची आस्था अद्वितीय थी। पीछे उसी देवहूति के गर्भ से योगधर्म के जानने वाले भगवान कपिल भी उत्पन्न हुए। जय और विजय सदा भगवान की भक्ति में तत्पर रहते थे, जिससे उनकी भक्ति की कथा दूर-दूर तक फैली हुई थी। वे नित्य अष्टाक्षर मंत्र का जप और वैष्णव व्रतों का पालन करते थे, जिससे उनके चरित्र में दिव्यता बसती थी।
एक समय राजा मरुत्त ने उन दोनों को अपने यज्ञ में बुलाया। वहाँ जय को ब्रह्मा और विजय को आचार्य बनाया गया। उन्होंने यज्ञ की सम्पूर्ण विधि पूर्ण की और यज्ञ में भाग लेने वाले अन्य ब्राह्मणों के साथ मिलकर महान उत्सव का आयोजन किया। यज्ञ के अंत में अवभृथस्थान के पश्चात राजा मरुत्त ने उन दोनों को बहुत धन दिया, जिसे प्राप्त कर दोनों भाई अत्यंत प्रसन्न हुए। धन लेकर दोनों भाई अपने आश्रम पर गये, जहाँ उन्होंने उस धन का विभाग करने लगे तो उस समय दोनों में विवाद उत्पन्न हो गया।
- जय ने कहा – इस धन को बराबर-बराबर बाँट लिया जाए ताकि किसी को कोई असुविधा न हो।
- विजय का कहना था – नहीं, जिसको जो मिला है वह उसी के पास रहे ताकि स्वामित्व बना रहे।
तब जय ने क्रोध में आकर लोभी विजय को शाप दिया – तुम ग्रहण कर के देते नहीं हो, इसलिए ग्राह अर्थात मगरमच्छ हो जाओ। जय के शाप को सुनकर विजय ने भी शाप दिया – तुमने मद से भ्रान्त होकर शाप दिया है, इसलिए तुम मातंग अर्थात हाथी की योनि में जाओ।
तत्पश्चात उन्होंने भगवान से शाप निवृति के लिए प्रार्थना की। श्री भगवान ने कहा – तुम मेरे भक्त हो, तुम्हारा वचन कभी असत्य नहीं होगा। तुम दोनों अपने ही दिए हुए इन शापों को भोग कर फिर से मेरे धाम को प्राप्त होगे। ऐसा कहकर भगवान विष्णु अन्तर्धान हो गए। तदनन्तर वे दोनों गण्डकी नदी के तट पर ग्राह और गज हो गए। उस योनि में भी उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण बना रहा और उनके हृदय में भगवान विष्णु के प्रति भक्ति की ज्योति जलती रही।
किसी समय वह गजराज कार्तिक मास में स्नान के लिए गण्डकी नदी गया, तो उस समय ग्राह ने शाप के हेतु को स्मरण करते हुए उस गज को पकड़ लिया। ग्राह से पकड़े जाने पर गजराज ने भगवान रमानाथ का स्मरण किया, तभी भगवान विष्णु शंख, चक्र और गदा धारण किए वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने चक्र चलाकर ग्राह और गजराज दोनों का उद्धार किया और उन्हें अपने ही जैसा रूप देकर वैकुण्ठधाम को ले गए। तब से वह स्थान हरिक्षेत्र (हरिहरक्षेत्र) के नाम से प्रसिद्ध है।
वे ही दोनों विश्वविख्यात जय और विजय हैं जो भगवान विष्णु के द्वारपाल हुए हैं। धर्मदत्त! तुम भी ईर्ष्या और द्वेष का त्याग करके सदैव भगवान विष्णु के व्रत में स्थिर रहो, समदर्शी बनो, कार्तिक, माघ और वैशाख के महीनों में सदैव प्रात:काल स्नान करो। एकादशी व्रत के पालन में स्थिर रहो। तुलसी के बगीचे की रक्षा करते रहो, और अपने जीवन में सच्चाई एवं धर्म का पालन करते रहो। ऐसा करने से तुम भी शरीर का अन्त होने पर भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होवोगे।
भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाले तुम्हारे इस व्रत से बढ़कर न यज्ञ हैं, न दान है और न तीर्थ ही हैं। विप्रवर! तुम धन्य हो, जिसके व्रत के आधे भाग का फल पाकर यह स्त्री (कलहा) हमारे द्वारा वैकुण्ठधाम में ले जायी जा रही है। नारद जी बोले – हे राजन! धर्मदत्त को इस प्रकार उपदेश देकर वे दोनों विमानचारी पार्षद उस कलहा के साथ वैकुण्ठधाम को चले गये।
धर्मदत्त जीवनभर भगवान के व्रत में स्थिर रहे और देहावसान के बाद उन्होंने अपनी दोनों स्त्रियों के साथ वैकुण्ठधाम प्राप्त कर लिया। इस प्राचीन इतिहास को जो सुनता है और सुनाता है, वह जगद्गुरु भगवान की कृपा से उनका सान्निध्य प्राप्त कराने वाली उत्तम गति को प्राप्त करता है।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 23 भावार्थ/सारांश
जय और विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं। दोनों ने पूर्वजन्म में महर्षि कर्दम के दृष्टिमात्र से उत्पन्न होकर भगवान विष्णु की भक्ति की। राजा मरुत्त ने उन्हें अपने यज्ञ में बुलाया, जहाँ जय को ब्रह्मा और विजय को आचार्य की पदवी मिली। धन वितरण पर विवाद हुआ, जय ने विजय को शाप दिया – तुम मगरमच्छ हो जाओ।
विजय ने भी जय को हाथी की योनि में जाने का शाप दिया। फिर जब शांत हुये तो अचंभित हुये कि धन के लिये ये क्या कर लिया और भगवान विष्णु से श्राप का निराकरण करने को कहा। भगवान विष्णु ने कहा – तुम मेरे भक्त हो, ये शाप भोग कर फिर से मेरे धाम को प्राप्त होगे। वे गण्डकी नदी के तट पर ग्राह और गज बन गए। किसी समय गजराज कार्तिक मास में स्नान के लिए गण्डकी नदी गया, तो ग्राह ने उसे पकड़ लिया।
गजराज ने भगवान रमानाथ का स्मरण किया, तभी भगवान विष्णु शंख, चक्र और गदा धारण किए वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने ग्राह और गजराज दोनों का उद्धार किया और उन्हें वैकुण्ठधाम ले गए। वह स्थान हरिक्षेत्र (हरिहरक्षेत्र) के नाम से प्रसिद्ध है। वे विश्वविख्यात जय और विजय हैं, जो भगवान विष्णु के द्वारपाल हुए हैं।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।