जब सत्यभामा ने अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत सुना तो मन में के प्रश्न उत्पन्न हुआ कि अंततः सभी मास, काल, तिथि तो भगवान के अंश ही हैं फिर कार्तिक और एकादशी श्रेष्ठ कैसे हो सकता है, सभी श्रेष्ठ ही हैं, यह अंतर क्यों है ? और सत्यभामा ने भगवान कृष्ण से यही प्रश्न किया जिसका उत्तर देते हुये भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व की एक कथा सुनाना आरंभ किया जो नारद जी ने पृथु को भी सुनाया था। इस आलेख में कार्तिक माहात्म्य के तीसरे अध्याय की कथा दी गयी है। सबसे पहले मूल कथा अर्थात संस्कृत में है, ततपश्चात हिन्दी में दिया गया है और फिर भावार्थ/सारांश दिया गया है।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3
सत्योवाच
सर्वेऽपि कालावयवास्तव कालस्वरूपिणः । समानास्तु कथं नाथ मासानां कार्तिको वरः ॥१॥
एकादशी तिथीनां च मासानां कार्त्तिकः प्रियः । कथं ते देवदेवेश कारणं किं च कथ्यताम् ॥२॥
श्रीकृष्ण उवाच
साधु पृष्टं त्वया सत्ये शृणुष्वैकाग्रमानसा । पृथोर्वैन्यस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ॥३॥
एवमेव पुरा पृष्टो नारदः पृथुना प्रिये । उवाच कार्त्तिकाधिक्ये कारणं सर्वविन्मुनिः ॥४॥
नारद उवाच
शंखनामाऽभवत्पूर्वमसुरः सागरात्मजः । त्रिलोकीमथने शक्तो महाबलपराक्रमः ॥५॥
जित्वा देवान्निराकृत्य स्वर्गलोकान्महासुरः । इंद्रादिलोकपालानामधिकारांस्तथाहरत् ॥६॥
तद्भयादथ ते देवाः सुवर्णाद्रिगुहां गताः । न्यवसन्बहुवर्षाणि सावरोधाः सबान्धवाः ॥७॥
बद्धासना गुहादुर्ग संस्थितास्त्रिदशा यदा । तद्वश्या न बभूवुस्ते तदा दैत्योऽविचारयत् ॥८॥
हृताधिकारास्त्रिदशा मया यद्यपि निर्जिताः । भवंति बलयुक्तास्ते करणीयं मयाऽत्र किम् ॥९॥
अद्य ज्ञातं मया देवा वेदमंत्र बलान्विताः । तान्हरिष्ये ततः सर्वे बलहीना भवंति हि ॥१०॥
नारद उवाच
इति मत्वा ततो दैत्यो विष्णुमालक्ष्य निद्रितम् । सत्यलोकाज्जहाराशु वेदानां च गणं प्रभुः ॥११॥
नीतास्तु तेन ते वेदास्तद्भयात्तु निराक्रमन् । तोयानि विविशुस्तेऽत्र यज्ञमंत्रसमन्विताः ॥१२॥
तान्मार्गमाणः शंखोऽपि समुद्रांन्तर्गतो भ्रमन् । न ददर्श ततो दैत्यः क्वचिदेकत्र संस्थितान् ॥१३॥
अथ ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं विष्णुं शरणमन्वगात् । पूजोपकरणं गृह्य वैकुंठभवनं गतः ॥१४॥
तत्र तस्य प्रबोधाय गीतवाद्यादिकाः क्रियाः । चक्रुर्देवा गंधपुष्पधूपदीपान्मुहुर्मुहुः ॥१५॥
अथ प्रबुद्धो भगवांस्तद्भक्तिपरितोषितः । ददृशुस्ते सुरास्तत्र सहस्रार्कसमद्युतिम् ॥१६॥
उपचारैः षोडशभिः संपूज्य त्रिदशास्तदा । दंडवत्पतिता भूमौ तानुवाचाथ केशवः ॥१७॥
विष्णुरुवाच
वरदोऽहं सुरगणा गीतवाद्यादि मंगलैः । मनोऽभिलषितान्कामान्सर्वानेव ददामि वः ॥१८॥
इषस्य शुक्लैकादश्यां यावदुद्बोधिनी भवेत् । निशातुर्यांशशेषेण गीतवाद्यादि मंगलम् ॥१९॥
कुर्वंति मनुजा नित्यं भवद्भिर्यद्यथाकृतम् । ते मत्प्रियकरा नित्यं मत्सान्निध्यं व्रजंति हि ॥२०॥
पाद्यार्घाचमनीयाद्यैर्भवद्भिर्यद्यथाकृतम् । तदद्भुतगुणं यस्माज्जातंवः सुखकारणम् ॥२१॥
अद्यप्रभृति वेदास्तु मंत्रबीजमखान्विताः । प्रत्यब्दं कार्तिके मासि विश्रमंत्वप्सु सर्वदा ॥२२॥
वेदाः शंखहृताः सर्वे तिष्ठंत्युदकसंस्थिताः । तानानयाम्यहं देवा हत्वा सागरनंदनम् ॥२३॥
मत्स्यरूपोऽहमपि भवामि जलमध्यगः । भवंतोऽपि मया सार्द्धमायांतु समुनीश्वराः ॥२४॥
कालेऽस्मिन्नेव कुर्वंति प्रातः स्नानं नरोत्तमाः । ते सर्वयज्ञावभृथैः सुस्नाताः स्युर्न संशयः ॥२५॥
ये कार्तिकव्रतं सम्यङ्नित्यं कुर्वंति मानवाः । ते देहांते त्वया शक्र प्राप्या मद्भवनं तदा ॥२६॥
विघ्नेभ्यो रक्षणं तेषां यया कार्यं तथा त्वया । देया त्वया च वरुण पुत्रपौत्रादि संततिः ॥२७॥
धनवृद्धिर्धनाध्यक्ष त्वया कार्या ममाज्ञया । ममरूपधराः साक्षाज्जीवन्मुक्ताश्च ते नराः ॥२८॥
आजन्ममरणाद्यैश्च कृतमेतद्व्रतोत्तमम् । यथोक्तविधिना सम्यक्ते मान्या भवतामपि ॥२९॥
एकादश्यां यतश्चाहं भवद्भिः प्रतिबोधितः । अतश्चैषा तिथिर्मान्या सदैव प्रीतिदा मम ॥३०॥
व्रतद्वयं सम्यगिदं नरैः कृतं कृष्णस्य सान्निध्यदमस्ति नान्यत् ।
दानानि तीर्थानि तपांसि यज्ञाः स्वर्लोकदानेन सदा सुरोत्तमाः ॥३१॥
॥इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवादे तृतीयोऽध्यायः ॥
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 हिन्दी में
सत्यभामा ने कहा : हे प्रभो! आप तो सभी काल में व्यापक हैं और सभी काल आपके आगे एक समान हैं फिर यह कार्तिक मास ही सभी मासों में श्रेष्ठ क्यों है? आप सब तिथियों में एकादशी और सभी मासों में कार्तिक मास को ही अपना प्रिय क्यों कहते हैं? इसका कारण बताइए।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे भामिनी! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। इसी प्रकार एक बार महाराज बेन के पुत्र राजा पृथु ने प्रश्न के उत्तर में देवर्षि नारद से प्रश्न किया था और जिसका उत्तर देते हुए नारद जी ने उसे कार्तिक मास की महिमा बताते हुए कहा :
हे राजन! एक समय शंख नाम का एक राक्षस बहुत बलवान एवं अत्याचारी हो गया था। उसके अत्याचारों से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई। उस शंखासुर ने स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं पर विजय प्राप्त कर इन्द्रादि देवताओं एवं लोकपालों के अधिकारों को छीन लिया। उससे भयभीत होकर समस्त देवता अपने परिवार के सदस्यों के साथ सुमेरु पर्वत की गुफाओं में बहुत दिनो तक छिपे रहे। तत्पश्चात वे निश्चिंत होकर सुमेरु पर्वत की गुफाओं में ही रहने लगे।

उधर जब शंखासुर को इस बात का पता चला कि देवता आनन्दपूर्वक सुमेरु पर्वत की गुफाओं में निवास कर रहे हैं, तो उसने सोचा कि ऎसी कोई दिव्य शक्ति अवश्य है जिसके प्रभाव से अधिकारहीन यह देवता अभी भी बलवान हैं। सोचते-सोचते वह इस निर्णय पर पहुंचा कि वेदमन्त्रों के बल के कारण ही देवता बलवान हो रहे हैं। यदि इनसे वेद छीन लिये जाएँ तो वे बलहीन हो जाएंगे। ऎसा विचारकर शंखासुर ब्रह्माजी के सत्यलोक से शीघ्र ही वेदों को हर लाया। उसके द्वारा ले जाये जाते हुए भय से उसके चंगुल से निकल भागे और जल में समा गये।
शंखासुर ने वेदमंत्रों तथा बीज मंत्रों को ढूंढते हुए सागर में प्रवेश किया परन्तु न तो उसको वेद मंत्र मिले और ना ही बीज मंत्र।जब शंखासुर सागर से निराश होकर वापिस लौटा तो उस समय ब्रह्माजी पूजा की सामग्री लेकर सभी देवताओं के साथ भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और भगवान को गहरी निद्रा से जगाने के लिए गाने-बजाने लगे और धूप-गन्ध आदि से बारम्बार उनका पूजन करने लगे।
धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित किये जाने पर भगवान की निद्रा टूटी और वह देवताओं सहित ब्रह्माजी को अपना पूजन करते हुए देखकर बहुत प्रसन्न हुए, तथा कहने लगे: मैं आप लोगों के इस कीर्तन एवं मंगलाचरण से बहुत प्रसन्न हूँ। आप अपना अभीष्ट वरदान मांगिए, मैं अवश्य प्रदान करुंगा। जो मनुष्य आश्विन शुक्ल की एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक ब्रह्ममुहूर्त में उठकर मेरी पूजा करेंगे उन्हें तुम्हारी ही भाँति मेरे प्रसन्न होने के कारण सुख की प्राप्ति होगी। आप लोग जो पाद्य, अर्ध्य, आचमन और जल आदि सामग्री मेरे लिए लाए हैं वे अनन्त गुणों वाली होकर आपका कल्याण करेगी।
शंखासुर द्वारा हरे गये सम्पूर्ण वेद जल में स्थित हैं। मैं सागर पुत्र शंखासुर का वध कर के उन वेदों को अभी लाए देता हूँ। आज से मंत्र-बीज और वेदों सहित मैं प्रतिवर्ष कार्तिक मास में जल में विश्राम किया करुंगा। अब मैं मत्स्य का रुप धारण करके जल में जाता हूँ। तुम सब देवता भी मुनीश्वरों सहित मेरे साथ जल में आओ। इस कार्तिक मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य प्रात:काल स्नान करते हैं वे सब यज्ञ के अवभृथ-स्नान द्वारा भली-भाँति नहा लेते हैं।
हे देवेन्द्र! कार्तिक मास में व्रत करने वालों को सब प्रकार से धन, पुत्र-पुत्री आदि देते रहना और उनकी सभी आपत्तियों से रक्षा करना। हे धनपति कुबेर! मेरी आज्ञा के अनुसार तुम उनके धन-धान्य की वृद्धि करना क्योंकि इस प्रकार का आचरण करने वाला मनुष्य मेरा रूप धारण कर के जीवनमुक्त हो जाता है।
जो मनुष्य जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त विधिपूर्वक इस उत्तम व्रत को करता है, वह आप लोगों का भी पूजनीय है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुम लोगों ने मुझे जगाया है इसलिए यह तिथि मेरे लिए अत्यन्त प्रीतिदायिनी और माननीय है। हे देवताओ! यह दोनों व्रत नियमपूर्वक करने से मनुष्य मेरा सान्निध्य प्राप्त कर लेते हैं। इन व्रतों को करने से जो फल मिलता है वह अन्य किसी व्रत से नहीं मिलता। अत: प्रत्येक मनुष्य को सुखी और निरोग रहने के लिए कार्तिक माहात्म्य और एकादशी की कथा सुनते हुए उपर्युक्त नियमों का पालन करना चाहिए।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 भावार्थ/सारांश
कार्तिक माहात्म्य के तृतीय अध्याय में कार्तिक मास का माहात्म्य तो बताया ही गया है साथ ही साथ प्रबोधिनी एकादशी अर्थात देवोत्थान एकादशी की कथा और माहात्म्य भी प्रकट किया गया है। सत्यभामा ने जब कार्तिक और एकादशी की श्रेष्ठता का कारण पूछा तो भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व की एक कथा सुनाई जो पहले महाराज पृथु को नारद जी ने सुनाया था।
इस अध्याय में सागर के बलवान पुत्र शंखचूड़ का प्रसंग बताया गया है जो कि अत्यंत बलशाली था और देवताओं को प्रताड़ित करता था। पीड़ित देवता भगवान विष्णु के पास अपनी व्यथा सुनाने के लिये गये तो भगवान विष्णु शयन कर रहे थे। देवताओं ने गंध-पुष्प-धूप-दीप आदि नाना उपचारों से भगवान विष्णु की पूजा किया जिसके पश्चात भगवान विष्णु जगे और देवताओं के संकट निवारण का वरदान दिया और कार्तिक एवं देवोत्थान एकादशी का माहात्म्य भी स्वयं कहा।
भगवान विष्णु ने कहा : शंखासुर द्वारा हरे गये सम्पूर्ण वेद जल में स्थित हैं। मैं सागर पुत्र शंखासुर का वध कर के उन वेदों को अभी लाए देता हूँ। आज से मंत्र-बीज और वेदों सहित मैं प्रतिवर्ष कार्तिक मास में जल में विश्राम किया करुंगा। अब मैं मत्स्य का रुप धारण करके जल में जाता हूँ। तुम सब देवता भी मुनीश्वरों सहित मेरे साथ जल में आओ। इस कार्तिक मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य प्रात:काल स्नान करते हैं वे सब यज्ञ के अवभृथ-स्नान द्वारा भली-भाँति नहा लेते हैं। इसी प्रकार कार्तिक मास व एकादशी व्रत का और भी माहात्म्य बताया।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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