कार्तिक माहात्म्य के चतुर्थ अध्याय में भगवान विष्णु के मत्स्यावतार की कथा के साथ-साथ माघ मास की कथा भी समाहित है। इस कथा के अनुसार देवताओं का दुःख सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें शंखचूड़ वध करने का आश्वासन/वर दिया और मत्स्यावतार ग्रहण करके कश्यप ऋषि के अंजलि वाले जल में प्रकट हुये और बढ़ने लगे, महर्षि कश्यप ने उन्हें क्रमशः कमंडल,कूप, तालाब, समुद्र में रखा। फिर भगवान ने शंखचूड़ का वध करके वेद लिया। पहले संस्कृत में मूल कथा दी गयी है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ दिया गया है फिर भावार्थ/सारांश दिया गया है।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4 मूल संस्कृत में
नारद उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः शफरीतुल्यरूपधृक् । स पपातांजलौ विंध्ये निवासे कश्यपस्य च ॥१॥
स तं कमंडलौ क्षिप्रं कृपया क्षिप्तवान्मुनिः । तावत्स न ममौ तत्र ततः कूपे न्यवेशयत् ॥२॥
तत्रापि न ममौ तावत्कासारे प्राक्षिपत्सताम् । एवं स सागरे क्षिप्तस्तत्र सोऽप्यन्ववर्द्धत ॥३॥
ततोऽवधीत्स तं शंखं विष्णुर्वै मत्स्यरूपधृक् । अथ तं स्वकरे धृत्वा बदरीवनमागतः ॥४॥
तत्राहूय ऋषीन्सर्वानिदमाज्ञापयद्विभुः । विष्णुरुवाच जलांतरे विशीर्णास्तु वेदास्तान्परिमार्गथ ॥५॥
आनयध्वं च त्वरिताः सरहस्यं जलांतरात् । तावत्प्रयागे तिष्ठामि देवतागणसंयुतः ॥६॥
नारद उवाच
ततस्तैः सर्वमुनिभिस्तपोबलसमन्वितैः । उद्धारिताः षडंगास्ते वेदा यज्ञसमन्विताः ॥७॥
तेषु यावन्मितं येन लब्धं तावन्मितस्य हि । स स एव ऋषिर्जातस्तदाप्रभृति पार्थिव ॥८॥
अथ सर्वेऽपि संगम्य प्रयागं मुनयो ययुः । विष्णवे सविधात्रे ते लब्धान्वेदान्न्यवेदयन् ॥९॥
लब्ध्वा वेदान्समग्रांस्तु ब्रह्माहर्षसमन्वितः । अयजच्चाश्वमेधेन देवर्षिगणसंवृतः ॥१०॥
यज्ञान्ते देवगन्धर्व सिद्धपन्नगगुह्यकाः । निपत्य दंडवद्भूमौ विज्ञप्तिं तत्र चक्रिरे ॥११॥
देवा ऊचुः
देवदेवजगन्नाथ विज्ञप्तिं शृणु नः प्रभो । हर्षकालोऽयमस्माकं तस्मात्त्वं वरदो भव ॥१२॥
स्थानेऽस्मिन्नृषयो वेदान्नष्टान्प्रापुः पुनः त्वयम् । यज्ञभागान्वयं प्राप्तास्त्वत्प्रसादाद्रमापते ॥१३॥
स्थानमेतदपि श्रेष्ठं पृथिव्यां पुण्यवर्द्धनम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं चास्तु प्रसादाद्भवतः सदा ॥१४॥
कालोऽप्ययं महापुण्यो ब्रह्मघ्नादिविशुद्धिकृत् । दत्ताक्षयकरश्चास्तु वरमेतद्वदस्व नः ॥१५॥
श्रीविष्णुरुवाच।
ममाप्येतन्मतं देवा यद्भवद्भिरुदाहृतम् । तत्तथास्तु लभत्वेतद्ब्रह्मक्षेत्रमिति प्रथाम् ॥१६॥
सूर्यवंशोद्भवो राजा गंगामत्रानयिष्यति । सा सूर्यकन्यया चात्र कालिंद्या संगमिष्यति ॥१७॥
यूयं च सर्वे ब्रह्माद्या निवसध्वं मया सह । तीर्थराजेऽति विख्यातं तीर्थमेतद्भविष्यति ॥१८॥
दानं तपो व्रतं होमो जपपूजादिकाः क्रियाः । अनंतफलदाः संतु मत्सांनिध्यप्रदाः सदा ॥१९॥
ब्रह्महत्यादि पापानि बहुजन्मकृतान्यपि । दर्शनादस्य तीर्थस्य विनाशं यांतु तत्क्षणात् ॥२०॥
देहत्यागं तथा धीराः कुर्वंति मम सन्निधौ । मत्तनुं प्रविशंत्येव पुनर्जन्मनि नो नराः ॥२१॥
पितॄन्निर्दिश्य ये श्राद्धं कुर्वंत्यत्र समागताः । तेषां पितृगणाः सर्वे यांतु ते मत्सलोकताम् ॥२२॥
कालोऽप्येष महापुण्यफलदोऽस्तु सदा नृणाम्। सूर्य्ये मकरगे प्रातः स्नायिनां पापनाशनम् ॥२३॥
मकरस्थरवौ माघे प्रातः स्नानं प्रकुर्वताम् । दर्शनादेव पापानि यांति सूर्याद्यथा तमः ॥२४॥
सलोकत्वं सरूपत्वं समीपत्वं त्रयं क्रमात् । नृणां ददाम्यहं स्नानान्माघे मकरगे रवौ ॥२५॥
यूयं मुनीश्वराः सर्वे शृणुध्वं वरदोऽस्मि वः । बदरीवनमध्येऽहं सदा तिष्ठामि सर्वगः ॥२६॥
अन्यत्र यच्छतैर्वर्षैस्तपसावाप्यते फलम् । तदत्र दिवसैकेन भवद्भिः प्राप्यते सदा ॥२७॥
स्थानस्य दर्शनं तस्य ये कुर्वंति नरोत्तमाः । जीवन्मुक्तास्तदा तेषु पापं नैवावतिष्ठते ॥२८॥
सूत उवाच
एवं देवान्देवदेवस्तदुक्त्वा तत्रैवांतर्द्धानमागात्स वेधाः ।
देवाः सर्वेऽप्यंशकैस्तत्र तस्थुश्चांतर्द्धानं प्रापुरिंद्रादयस्ते ॥२९॥
इमां च गाथां शृणुयान्नरोत्तमो यः श्रावयेद्वापि विशुद्धचित्तः ।
स तीर्थराजं बदरीवनं यत्कृत्वा फलं मां समवाप्नुयाच्च ॥३०॥
॥इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवादे चर्तुथोऽध्यायः ॥
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4 हिन्दी में
नारदजी ने कहा : ऐसा कहकर भगवान विष्णु मछली का रूप धारण कर के आकाश से जल में गिरे। उस समय विन्ध्याचल पर्वत पर तप कर रहे महर्षि कश्यप अपनी अंजलि में जल लेकर खड़े थे। भगवान उनकी अंजलि में जा गिरे। महर्षि कश्यप ने दया कर के उसे अपने कमण्डल में रख लिया। मछली के थोड़ा बड़ा होने पर महर्षि कश्यप ने उसे कुएं में डाल दिया। जब वह मछली कुएं में भी न समा सकी तो उन्होंने उसे तालाब में डाल दिया, जब वह तालाब में भी न आ सकी तो उन्होंने उसे समुद्र में डाल दिया।

वह मछली वहां भी बढ़ने लगी फिर मत्स्यरूपी भगवान विष्णु ने इस शंखासुर का वध किया और शंखासुर को हाथ में लेकर बद्रीवन में आ गये। वहाँ उन्होंने संपूर्ण ऋषियों को बुलाकर इस प्रकार आदेश दिया : मुनीश्वरों! तुम जल के भीतर बिखरे हुए वेदमंत्रों की खोज करो और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें सागर के जल से बाहर निकाल लाओ तब तक मैं देवताओं के साथ प्रयाग में ठहरता हूँ। तब उन तपोबल सम्पन्न महर्षियों ने यज्ञ और बीजों सहित सम्पूर्ण वेद मन्त्रों का उद्धार किया। उनमें से जितने मंत्र जिस ऋषि ने उपलब्ध किए वही उन बीज मन्त्रों का उस दिन से ऋषि माना जाना लगा।
तदनन्तर सब ऋषि एकत्र होकर प्रयाग में गये, वहाँ उन्होंने ब्रह्माजी सहित भगवान विष्णु को उपलब्ध हुए सभी वेद मन्त्र समर्पित कर दिए। सब वेदों को पाकर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने देवताओं और ऋषियों के साथ प्रयाग में अश्वमेघ यज्ञ किया। यज्ञ समाप्त होने पर सब देवताओं ने भगवान से निवेदन किया :
“देवाधिदेव जगन्नाथ! इस स्थान पर ब्रह्माजी ने खोये हुए वेदों को पुन: प्राप्त किया है और हमने भी यहाँ आपके प्रसाद से यज्ञभाग पाये हैं। अत: यह स्थान पृथ्वी पर सबसे श्रेष्ठ, पुण्य की वृद्धि करने वाला एवं भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाला हो। साथ ही यह समय भी महापुण्यमय और ब्रह्मघाती आदि महापापियों की भी शुद्धि करने वाला हो तथा तय स्थान यहाँ दिये हुए दान को अक्षय बना देने वाला भी हो, यह वर दीजिए।”
भगवान विष्णु बोले : देवताओं! तुमने जो कुछ कहा है, वह मुझे स्वीकार है, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। आज से यह स्थान ब्रह्मक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध होगा, सूर्यवंश में उत्पन्न राजा भगीरथ यहाँ गंगा को ले आएंगे और वह यहाँ सूर्यकन्या यमुना से मिलेगी। ब्रह्माजी और तुम सब देवता मेरे साथ यहाँ निवास करो। आज से यह तीर्थ तीर्थराज के नाम से विख्यात होगा। तीर्थराज के दर्शन से तत्काल सब पाप नष्ट हो जाएंगे।
जब सूर्य मकर राशि में स्थित होगें उस समय यहाँ स्नान करने वाले मनुष्यों के सब पापों का यह तीर्थ नाश करेगा। यह काल भी मनुष्यों के लिए सदा महान पुण्य फल देने वाला होगा। माघ में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर यहाँ स्नान करने से सालोक्य आदि फल प्राप्त होंगे। देवाधिदेव भगवान विष्णु देवताओं से ऎसा कहकर ब्रह्माजी के साथ वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात इन्द्रादि देवता भी अपने अंश से प्रयाग में रहते हुए वहां से अन्तर्धान हो गये। जो मनुष्य कार्तिक में तुलसी जी की जड़ के समीप श्रीहरि का पूजन करता है वह इस लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग कर के अन्त में वैकुण्ठ धाम को जाता है।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4 भावार्थ/सारांश
देवताओं का दुःख सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें शंखचूड़ वध करने का आश्वासन/वर दिया और मत्स्यावतार ग्रहण करके कश्यप ऋषि के अंजलि वाले जल में प्रकट हुये और बढ़ने लगे, महर्षि कश्यप ने उन्हें क्रमशः कमंडल,कूप, तालाब, समुद्र में रखा। समुद्र में जाने के बाद भगवान विष्णु (मत्स्यावतार) ने शंखचूड़ का वध किया और बदरीवन आ गये एवं ऋषियों को वेद मंत्र ढूंढने के लिये कहा।
तपोबल सम्पन्न महर्षियों ने यज्ञ और बीजों सहित सम्पूर्ण वेद मन्त्रों का उद्धार किया। उनमें से जितने मंत्र जिस ऋषि ने उपलब्ध किए वही उन बीज मन्त्रों का उस दिन से ऋषि माना जाना लगा। तदनंदर ऋषिगण प्रयाग गये जहां ब्रह्मा और विष्णु को सभी वेदमंत्र अर्पित किया और ब्रह्मा ने हर्षित होकर अश्वमेध यज्ञ किया।
फिर भगवान विष्णु से प्रयागक्षेत्र को श्रेष्ठ बनाने का वर माँगा जो भगवान विष्णु ने दिया और कहा कि यह क्षेत्र ब्रह्मक्षेत्र नाम से विख्यात होगा व भगीरथ गंगा को इसी क्षेत्र से लेकर जायेंगे व यमुना भी यहां आकर गंगा में मिल जाएगी। इस क्षेत्र का नाम तीर्थराज होगा और इसके दर्शन से ही सभी पापों का नाश होगा, माघ (मकर के सूर्य में) यह तीर्थ सभी पापों का नाश करेगा।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।
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