कार्तिक माहात्म्य का पंचम अध्याय कार्तिक मास के नियम और विधि का निर्धारण करता है। इसी हेतु इसमें नित्यकर्म अर्थात शौच, शुद्धि आदि के विधान का उल्लेख करते हुये विष्णु-शिव आदि की पूजा करने, भजन-कीर्तन-नृत्य आदि का विधान बताया गया है। देवताओं के लिये वर्जित पुष्पों का भी इस आलेख में वर्णन किया गया है। इस अध्याय में भजन की विशेष महत्ता भी बताई गयी है और भगवान विष्णु ने नारद से कहा कि मैं न तो वैकुण्ठ और न ही योगियों के हृदय में वास करता हैं, जहां मेरे भक्त भजन आदि करते हैं मैं वही वास करता हूँ। सर्वप्रथम मूल पाठ संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी अर्थ और फिर भावार्थ/सारांश।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 मूल संस्कृत में
पृथुरुवाच
महाफलं त्वया प्रोक्तं मुने कार्त्तिकमाघयोः । तयोः स्नानविधिं सम्यङ्नियमानपि नो वद॥१॥
उद्यापनविधिं चैव यथावद्वक्तुमर्हसि ॥२॥
नारद उवाच
त्वं विष्णोरंशसंजातो नाज्ञातं विद्यते तव । तथापि वदतः सम्यङ्माहात्म्यं शृणु वेनज ॥३॥
आश्विनस्य तु मासस्य या शुक्लैकादशी भवेत् । कार्तिकव्रतनियमं तस्यां कुर्यादतंद्रितः ॥४॥
रात्र्यां तुर्यांशशेषायां मुदो तिष्ठत्सदा व्रती । नैर्ऋत्यां संव्रजेद्वासाद्बहिः सोदकभाजनः ॥५॥
दिवासंध्या सुकर्णस्थ ब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः । अंतर्धाय तृणं भूमौ शिरः प्रावृत्य वाससा ॥६॥
वक्त्रं नियम्य यत्नेन ष्ठीवनश्वासवर्जितः । कुर्यान्मूत्रपुरीषे च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥७॥
गृहीतशिश्नश्चोत्थाय गृहीत्वा शुचिमृत्तिकाम् । गंधलेपक्षयकरं शौचं कुर्यादतंद्रितः ॥८॥
एका लिंगे गुदे पंच तथा वामकरे दश । उभयोः सप्त दातव्यास्तथा तिस्रस्तु पादयोः ॥९॥
एतच्छौचं गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणः। वानप्रस्थस्य त्रिगुणं यतीनां च चतुर्गुणं ॥
यद्दिवा विहितं शौचं तदर्द्धं निशि कीर्तितं ॥१०॥
तदर्द्धमातुरे प्रोक्तं मार्गस्थः तदर्द्धकम् । शौचकर्मविहीनस्य सकला निष्फलाः क्रियाः ॥११॥
मुखशुद्धिविहीनस्य न मंत्राः फलदाः स्मृताः । दंत जिह्वा विशुद्धिं च ततः कुर्यात्प्रयत्नतः ॥१२॥
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते ॥१३॥
इति मंत्रं समुच्चार्य द्वादशांगुलकं सदा । समिधा क्षीरवृक्षस्य क्षयाहोपोषणं विना ॥१४॥
प्रतिपद्दर्श नवमी षष्ठीश्चार्कदिनं तथा । चंद्रसूर्योपरागे च न कुर्याद्दंतधावनम् ॥१५॥
कंटकीवृक्षकार्पास निर्गुंडी ब्रह्मवृक्षजम् । वटैरंडविगंधाढ्यं वर्जयेद्दंतधावने ॥१६॥
ततो विष्णोः शिवस्यापि गृहं गच्छेत्प्रसन्नधीः । गंधपुष्पसतांबूलान्गृहीत्वा भक्तितत्परः ॥१७॥
तत्र देवस्य पाद्यार्घाद्युपचारान्पृथक्पृथक् । कृत्वा स्तुत्वा पुनर्नत्वा कुर्याद्गीतादिमंगलम् ॥१८॥
तालवेणुमृदंगादि ध्वनियुक्तान्सनर्त्तकान् । पुष्पैर्गंधैः सतांबूलैर्गायनानपि चार्चयेत् ॥१९॥
देवालये गानपरा यतस्ते विष्णुमूर्त्तयः । तपांसि यज्ञदानानि कृतादिषु जगद्गुरोः ॥२०॥
तुष्टिदानि कलौ नित्यं भक्त्या देवस्य सत्पतेः । क्व त्वं वससि देवेश मया पृष्टस्तु पार्थिव ॥
विष्णुरेवं तदा प्राह मद्भक्तिपरितोषितः ॥२१॥
नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायंति तत्र तिष्ठामि नारद ॥२२॥
तेषां पूजादिकं गंधपुष्पादि क्रियते नरैः। तेन प्रीतिं तथा यामि न तथा मत्प्रपूजनात् ॥२३॥
मत्पुराणकथां श्रुत्वा मद्भक्तानां च गायनम्। नेच्छंति ये नरा मूढा मद्द्वेष्यास्ते भवंति हि ॥२४॥
शिरीषोन्मत्तगिरिजा मल्लिका शाल्मलीभवैः। अर्कजैः कर्णिकारैश्च विष्णुर्नार्च्यस्तथाक्षतैः ॥२५॥
जपा कुंद शिरीषैश्च यूथिका मालती भवैः। केतकीभव पुष्पैश्च नैवार्च्यः शंकरस्तथा ॥२६॥
गणेशं तुलसीपत्रैर्दुर्गां नैव च दूर्वया। मुनिपुष्पैस्तथा सूर्यं लक्ष्मीकामो न चार्चयेत् ॥२७॥
सुगंधीनि प्रशस्तानि पूजायां सर्वदैव तु। एवं पूजाविधिं कृत्वा देवदेवं क्षमापयेत् ॥२८॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२९॥
ततःप्रदक्षिणंकृत्वा दंडवत्प्रणिपत्यच। पुनःक्षमापयेद्देवंगायनाद्यं समाचरेत् ॥३०॥
विष्णोः शिवस्यापि च पूजनादिकं कुर्वंति सम्यङ्निशि कार्तिके ये ।
निर्धूतपापाः सह पूर्वजैस्ते प्रयांति विष्णोर्भवनं मनुष्याः ॥३१॥
॥इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवादे पञ्चमोऽध्यायः ॥
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 हिन्दी में
राजा पृथु बोले : हे नारद जी! आपने कार्तिक मास में स्नान का फल कहा, अब कार्तिक और माघ मास मासों में विधिपूर्वक स्नान करने की विधि, नियम और उद्यापन की विधि भी बतलाइये।
देवर्षि नारद ने कहा : हे राजन्! आप भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए हैं, अत: यह बात आपको ज्ञात ही है फिर भी आपको यथाचित विधान बतलाता हूँ। आश्विन माह में शुक्लपक्ष की एकादशी से कार्तिक के व्रत करने चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर जल का पात्र लेकर गाँव से बाहर नैर्ऋत्य दिशा में जाना चाहिए। उसके बाद जो मनुष्य मुख शुद्धि नहीं करता, उसे किसी भी मन्त्र का फल प्राप्त नहीं होता है। अत: दाँत और जीभ को पूर्ण रूप से शुद्ध करना चाहिए और निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए दातुन तोड़नी चाहिए।
“हे वनस्पते! आप मुझे आयु, कीर्ति, तेज, प्रज्ञा, पशु, सम्पत्ति, महाज्ञान, बुद्धि और विद्या प्रदान करो।”
इस प्रकार उच्चारण करके वृक्ष से बारह अंगुल की दांतुन ले, दूध वाले वृक्षों से दांतुन नहीं लेनी चाहिए। इसी प्रकार कपास, कांटेदार वृक्ष तथा जले हुए वृक्ष से भी दांतुन लेना मना है। जिससे उत्तम गन्ध आती हो और जिसकी टहनी कोमल हो, ऎसे ही वृक्ष से दन्तधावन ग्रहण करना चाहिए। प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, छठी, रविवार को, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण में दांतुन नहीं करनी चाहिए।
तत्पश्चात भली-भाँति स्नान कर के फूलमाला, चन्दन और पान आदि पूजा की सामग्री लेकर प्रसन्नचित्त व भक्तिपूर्वक विष्णु मंदिर अथवा शिवालय में जाकर सभी देवी-देवताओं की अर्ध्य, आचमनीय आदि वस्तुओं से पृथक-पृथक पूजा करके प्रार्थना एवं प्रणाम करना चाहिए फिर भक्तों के स्वर में स्वर मिलाकर श्रीहरि का कीर्तन करना चाहिए।
मन्दिर में जो गायक भगवान श्रीहरि का कीर्तन करने आये हों उनका माला, चन्दन, ताम्बूल आदि से पूजन करना चाहिए क्योंकि देवालयों में भगवान विष्णु को अपनी तपस्या, योग और दान द्वारा प्रसन्न करते थे परन्तु कलयुग में भगवन्नाम गुणगान को ही भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करने का एकमात्र साधन माना गया है।
नारद जी राजा पृथु से बोले : हे राजन! एक बार मैंने भगवान से पूछा कि हे प्रभु! आप सबसे अधिक कहाँ निवास करते हैं? इसका उत्तर देते हुए भगवान ने कहा :
“हे नारद! मैं वैकुण्ठ या योगियों के हृदय में ही निवास नहीं करता अपितु जहाँ मेरे भक्त मेरा कीर्तन करते हैं, मैं कहाँ अवश्य निवास करता हूँ।”
जो मनुष्य चन्दन, माला आदि से मेरे भक्तों का पूजन करते हैं उनसे मेरी ऐसी प्रीति होती है जैसी कि मेरे पूजन से भी नहीं हो सकती।
नारद जी ने फिर कहा : शिरीष, धतूरा, गिरजा, चमेली, केसर, कन्दार और कटहल के फूलों व चावलों से भगवान विष्णु की पूजा नहीं करनी चाहिए। अढ़हल, कन्द, गिरीष, जूही, मालती और केवड़ा के पुष्पों से भगवान शंकर की पूजा नहीं करनी चाहिए। जिन देवताओं की पूजा में जो फूल निर्दिष्ट हैं उन्हीं से उनका पूजन करना चाहिए। पूजन समाप्ति के बाद भगवान से क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए।
“हे सुरेश्वर, हे देव! न मैं मन्त्र जानता हूँ, न क्रिया, मैं भक्ति से भी हीन हूँ, मैंने जो कुछ भी आपकी पूजा की है उसे पूरा करें।”
इस प्रकार से प्रार्थना करने के पश्चात साष्टांग प्रणाम करके भगवद कीर्तन करना चाहिए। श्रीहरि की कथा सुननी चाहिए और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। जो मनुष्य उपरोक्त विधि के अनुसार कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करते हैं वह जगत के सभी सुखों को भोगते हुए अन्त में मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 भावार्थ/सारांश
कार्तिक और माघ मास के महत्व को जानने के उपरांत महाराज पृथु ने नारद जी से कार्तिक और माघ मास स्नान की विधि के बारे में पूछा तो नारद जी ने प्रातः कृत्य का वर्णन करते हुये शौच की पूरी विधि का वर्णन किया और शौच विधि, दंतधावन विधि और स्नान विधि का वर्णन करते हुये ब्रह्ममुहूर्त में जगने, जल का पात्र लेकर गाँव से बाहर नैर्ऋत्य दिशा में जाकर शौच करने, तत्पश्चात शुद्धि की विधि, फिर दंतधावन का महत्व और विधि में दातुन ग्रहण करने का मंत्र, दंतधावन हेतु निषिद्ध तिथियां और वनस्पति का भी वर्णन किया।
आगे उन्होंने कहा कि तत्पश्चात स्नान करके पूजा की सामग्रियां लेकर विष्णु मंदिर अथवा शिवालय जाये, भक्ति पूर्वक नाना प्रकार के उपचारों से भगवान की पूजा करे। फिर भक्तों सहित भगवन्नाम का कीर्तन-भजन-नृत्य आदि करे। कृतादि अन्य युगों में तपस्या, योग, दानादि का विशेष महत्व था किन्तु कलयुग में भजन-कीर्तन का ही अधिक महत्व है। भगवान विष्णु ने भजन के महत्व का वर्णन स्वयं किया है और कहा है कि न तो मैं वैकुण्ठ में वसता हूँ न ही योगियों के हृदय में, मेरे भक्त जहां भक्तिपूर्वक भजन-कीर्तन गान करते हैं मैं वही वसता हूँ।
देवताओं के लिये निषिद्ध पुष्पों का वर्णन इस प्रकार किया गया है :
- विष्णु के लिये निषिद्ध – शिरीष, धतूरा, गिरजा, चमेली, केसर, कन्दार और कटहल के फूलों व चावलों से भगवान विष्णु की पूजा नहीं करनी चाहिए।
- भगवान शिव के लिये निषिद्ध – ओरहुल, कन्द, गिरीष, जूही, मालती और केवड़ा के पुष्पों से भगवान शंकर की पूजा नहीं करनी चाहिए।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।