कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इसमें महाराज मुचुकुन्द की पुत्री चंद्रभागा और उसके पति शोभन की कथा है। शोभन अतिदुर्बल था जो एक बार ससुराल गया जहां मनुष्यों की बात तो दूर पशुओं को भी एकादशी के दिन भोजन नहीं दिया जाता था। दुर्बल शोभन एकादशी करते हुये दिवंगत हो गया और एकादशी व्रत के प्रभाव से उसे दिव्यलोक की प्राप्ति हुई जो अस्थिर था। पुनः चंद्रभागा ने जब जाना तो अपने व्रत के प्रभाव से उस अस्थिर पुर को स्थिर कर दिया।
सर्वप्रथम रमा (कार्तिक कृष्ण पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Rama ekadashi vrat katha
रमा एकादशी व्रत कथा मूल संस्कृत में
युधिष्ठिर उवाच
कथयस्व प्रसादेन मम स्नेहाज्जनार्दन । कार्तिकस्यासिते पक्षे किं नामैकादशी भवेत् ॥
श्रीकृष्ण उवाच
श्रूयतां राजशार्दूल कथयामि तवाग्रतः । कार्तिके कृष्णपक्षे तु रमानाम्नी सुशोभना ॥
एकादशी समाख्याता महापापहरा परा । अस्याः प्रसङ्गतो राजन् माहात्म्यं प्रवदामि ते ॥
मुचुकुन्द इति ख्यातो बभूव नृपतिः पुरा । देवेन्द्रेण समं यस्य मित्रत्वमभवन्नृप ॥
यमेन वरुणेनैव कुबेरेण समं तथा । विभीषणेन चैतस्य सखित्वमभवत्सह ॥५॥
विष्णुभक्तः सत्यसन्धो बभूव नृपतिः सदा । तस्यैवं शासतो राजन् राज्यं निहतकण्टकम् ॥
बभूव दुहिता गेहे चन्द्रभागा सरिद्वरा । शोभनाय च सा दत्ता चन्द्रसेनसुताय वै ॥
स कदाचित् समायातः श्वशुरस्य गृहे नृप । एकादशी व्रतमिदं समायातं सुपुण्यदम् ॥
समागते व्रतदिने चन्द्रभागात्वचिन्तयत् । किं भविष्यति देवेश मम भर्ताऽतिदुर्बलः ॥
क्षुधां न सहते सोऽपि पिता चैवोग्रशासनः । पटहस्ताड्यते यस्य सम्प्राप्ते दशमीदिने ॥१०॥
न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं न भोक्तव्यम् हरेर्दिने । श्रुत्वा पटहनिर्घोषं शोभनस्त्वब्रतीत् प्रियाम् ॥
किं कर्तव्यं मया कान्ते देहि शिक्षां सुशोभने। कृतेन येन मे सम्यग् जीवितं न विनश्यति ॥
चन्द्रभागोवाच
मत्पितुर्वेश्मनि विभो भोक्तव्यं नैव केनचित् । गजैरश्वैस्तथा चान्यैरन्यैः पशुभिरेव च ॥
तृणमन्नं तथा वारि न भोक्तव्यं हरेर्दिने । मानवैश्च कुतः कान्त भुज्यते हरिवासरे ॥
यदि त्वं भोक्ष्यसे कान्त ततो गेहात् प्रयास्यताम् । एवं विचार्य मनसा सुदृढं मानसं कुरु ॥१५॥
शोभन उवाच
सत्यमेतत्त्वया चोक्तं करिष्येऽहमुपोषणम् । दैवेन विहितं यद्वै तत्तथैव भविष्यति ॥
इति दिष्टे मतिं कृत्वा चकार व्रतमुत्तमम् । क्षुत्तृषापीडिततनुः स बभूवातिदुःखितः ॥
एवं व्याकुलिते तस्मिन्नादित्योऽस्तमगाङ्गिरिम् । वैष्णवानां नराणां सा निशा हर्षविवर्द्धिनी ॥
हरिपूजारतानां च जागरासक्त चेतसाम् । बभूव नृपशार्दूल शोभनस्यातिदुःसहा ॥
रवेरुदयवेलायां शोभनः पञ्चतां गतः । दाहयामास राजा तं राजयोग्यैश्च दारुभिः ॥२०॥
चन्द्रभागा नात्मदेहं ददाह पितृवारिता । कृत्वौर्ध्वदैहिकं तस्य तस्थौ जनकवेश्मनि ॥
शोभनेन नृपश्रेष्ठ ! रमाव्रतप्रभावतः । प्राप्तं देवपुरं रम्यं मन्दराचलसानुनि ॥
अनुत्तममनाधृष्यमसंख्येयगुणान्वितम् । हेमस्तम्भमयैः सौधैर्वैदूर्यमणिमण्डितैः ॥
स्फटिकैर्विविधाकारैर्विचित्रैरुपशोभितम् । सिंहासनसमारूढः सुश्वेतच्छत्रचामरः ॥
किरीटकुण्डलयुतो हारकेयूरभूषितः । स्तूयमानश्च गन्धर्वैरप्सरोगणसेवितः ॥२५॥
वन्दिनैः शोभते तत्र देवराडपरो यथा । सोमशर्मेति विख्यातो मुचुकुन्दपुरे वसन् ॥
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन भ्रमन्विप्रो ददर्श तम् । नृपजामातरं ज्ञात्वा तत्समीपं जगाम सः ॥
आसनादुत्थितः शीघ्रं नमश्चक्रे द्विजोत्तमम् । चकार कुशलप्रश्नं श्वशुरस्य नृपस्य च ॥
कान्तायाश्चन्द्रभागायास्तथैव नगरस्य च ।
सोमशर्मोवाच
कुशलं वर्तते राजञ्छ्वशुरस्य गृहे तव ॥
चन्द्रभागा कुशलिनी सर्वतः कुशलं पुरे । स्ववृत्तं कथ्यतां राजन्नाश्चर्यं परमं मम ॥३०॥
पुरं विचित्रं रुचिरं न दृष्टं केनचिन्मया । एतदाचक्ष्व नृपते कुतः प्राप्तमिदं त्वया ॥
शोभन उवाच
कार्तिकस्यसिते पक्षे नाम्ना चैकादशी रमा । तामुपोष्य मया प्राप्तं द्विजेन्द्र पुरमध्रुवम् ॥
ध्रुवं भवति येनैव तत्कुरुष्व द्विजोत्तम ।
द्विजेन्द्र उवाच
कथमध्रुवमेतद्धि कथं हि भवति ध्रुवम् ॥
तत्त्वं कथय राजेन्द्र तत्करिष्यामि नान्यथा ।
शोभन उवाच
मयैतद्विहितं विप्र श्रद्धाहीनं व्रतोत्तमम् ॥
तेनाहमध्रुवं मन्ये ध्रुवं भवति तच्छृणु । मुचुकुन्दस्य दुहिता चन्द्रभागा सुशोभना ॥३५॥
तस्य कथय वृत्तान्तं ध्रुवमेतद्भविष्यति । तच्छ्रुत्वाऽथ द्विजवरस्तस्यै सर्वं न्यवेदयत् ॥
श्रुत्वाऽथ सा द्विजवचो विस्मयोत्फुल्ललोचना । प्रत्यक्षमथवा स्वप्नस्त्वयैत्कथ्यते द्विज ॥
सोमशर्मोवाच
प्रत्यक्षं पुत्रि त्वत्कान्तो मया दृष्टो महावने । देवतुल्यमनाधृष्यं दृष्टं तस्य पुरं मया ॥
अध्रुवं तेन तत्प्रोक्तं ध्रुवं भवति तत्कुरु ।
चन्द्रभागोवाच
तत्र मां नय विप्रर्षे पतिदर्शनलालसाम् ॥
आत्मनो व्रतपुण्येन करिष्यामि पुरं ध्रुवम् । आवयोर्द्विजसंयोगो यथा भवति तत्कुरु ॥४०॥
प्राप्यते हि महत् पुण्यं कृत्वा योगं वियुक्तया । इति श्रुत्वा सह तया सोमशर्मा जगाम ह ॥
आश्रमं वामदेवस्य मन्दराचलसन्निधौ । वामदेवोऽशृणोत्सर्वं वृत्तान्तं कथितं तयोः ॥
अभ्यषिञ्चच्चन्द्रभागां वेदमन्त्रैरथोज्ज्वलाम् । ऋषिमन्त्रप्रभावेण विष्णुवासरसेवनात् ॥
दिव्यदेहो बभूवासौ दिव्यां गतिमवाप ह । पत्युः समीपमगमत्प्रहर्षोत्फुल्ललोचना ॥
सहर्षः शोभनोऽतीवदृष्टा कान्तां समागताम् । समाहूय स्वके वामे पार्श्वे तां संन्यवेशयत् ॥४५॥
सा प्रोवाच प्रियं हर्षाच्चन्द्रभागा शुभं वचः। शृणु कान्त हितं वाक्यं यत्पुण्यं विद्यते मयि ॥
अष्टवर्षाधिका आसम् यदाहं पितृवेश्मनि। मया ततः प्रभृति च कृतमेकादशीव्रतम् ॥
यथोक्तविधिसंयुक्तं श्रद्धायुक्तेन चेतसा। तेन पुण्यप्रभावेण भविष्यति पुरं ध्रुवम् ॥
सर्वकामसमृद्धं च यावदाभूतसंप्लवम्। एवं सा नृपशार्दूल रमते पतिना सह ॥
दिव्यभोगा दिव्यरूपा दिव्याभरणभूषिता । शोभनोऽपि तया सार्द्धं रमते दिव्यविग्रहः ॥५०॥
रमाव्रतप्रभावेण मन्दराचलसानुनि । चिन्तामणिसमा ह्येषा कामधेनुसमाऽथवा ॥
रमाभिधाना नृपते तवाग्रे कथिता मया । ईदृशं च व्रतं राजन् ये कुर्वन्ति नरोत्तमाः ॥
ब्रह्महत्यादिपापानि नाशं यान्ति न संशयः । एकादशीव्रतानां च पक्षयोरुभयोरपि ॥
यथा शुक्ला तथा कृष्णा तिथिभेदं न कारयेत् । सेवितैकादशी नृणां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥
धेनुः कृष्णा तथा श्वेता उभयोः सदृशं पयः । तथैव तुल्यफलदं स्मृतमेकादशीव्रतम् ॥५५॥
एकादशीव्रतानां च माहात्म्यं शृणुयान्नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥
॥ इतिश्री ब्रह्मवैवर्तपुराणे कार्तिककृष्णे रमा एकादशीव्रतमाहात्म्यं समाप्तम् ॥२३॥
रमा एकादशी व्रत कथा हिन्दी में
युधिष्ठिर राजा बोले – हे जनार्दन ! कार्तिक कृष्णपक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? यह मेरे ऊपर स्नेह करते हुए प्रसत्रता से मुझसे कहिए ।
श्रीकृष्ण बोले – हे राजशार्दूल ! कार्तिक कृष्णपक्ष में रमा नाम की सुन्दर एकादशी होती है, उसको मैं कहता हूँ, तुम सुनो। यह सब पापों को हरने वाली है। हे राजन् ! इसके माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ ।
हे नृप । प्राचीन समय में मुचुकुन्द नाम का राजा था, उसकी इन्द्र से मित्रता थी, यम, वरुण, कुबेर और विभीषण से भी उसकी मित्रता हो गई । हे राजन् ! वह राजा विष्णु का भक्त और सत्यवादी था । धर्म से पालन करते हुए उसका निष्कंटक राज्य हो गया।
उसके घर में बेटी थी, उसका नाम चन्द्रभागा था। उसका चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ विवाह हो गया । हे नृप ! वह शोभन कभी अपने श्वसुर के घर पर आया। उसी दिन पवित्र एकादशी का व्रत आया । व्रत का दिन आने पर चन्द्रभागा विचार करने लगी कि हे ईश्वर ! क्या होगा ? मेरा पति तो बहुत निर्बल है । वह क्षुधा को सहन नहीं कर सकता और मेरे पिता का शासन बहुत कठिन है । दशमी को ढिंढोरा पिटवा देते हैं कि एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए ।

डुगडुगी का शब्द सुनकर शोभन अपनी स्त्री से बोला । हे कान्ते ! अब मुझे क्या करना चाहिए ? हे शोभने ! जिसके करने से मेरा जीवन नष्ट न हो ऐसी शिक्षा दो ।
चन्द्रभागा बोली – हे विभो ! मेरे पिता के घर में कोई भोजन नहीं करता। हाथी, घोड़े तथा पशु भी नहीं खाते । हे कान्त ! एकादशी को पशु भी घास, अन्न, जल ग्रहण नहीं करते तो एकादशी के दिन मनुष्य कैसे भोजन करेंगे ? हे कान्त ! यदि भोजन करना चाहें तो घर से चले जाइये, मन से विचार कर निश्चय कर लीजिए ।
शोभन बोला – तुमने सत्य कहा है, मैं व्रत करूँगा, जो भाग्य में लिखा है वह वैसा ही होगा । इस प्रकार भाग्य का विचार करके उसने उत्तम व्रत को किया । भूख-प्यास से शरीर पीड़ित हो गया और वह बहुत दुखी हुआ । वह व्याकुल हो रहा था। सूर्य अस्त हो गये। वह रात्रि वैष्णव मनुष्यों को हर्ष बढ़ाने वाली हुई । हे नृपशार्दूल ! भगवान् की पूजा करने वाले और जागरण करने वालों को वह रात्रि आनन्द देने वाली हुई और शोभन के लिए असह्य हो गई । सूर्योदय के समय शोभन की मृत्यु हो गई।
राजा ने राजा के योग्य सुगन्धित चन्दन की लकड़ी से उसका दाह कर्म कराया । चन्द्रभागा ने पिता के निषेध करने से अपना शरीर नहीं जलाया, उसका अन्तिम संस्कार करके पिता के घर में रहने लगी ।
हे नृपश्रेष्ठ ! रमा के प्रभाव से मंदराचल के शिखर पर शोभन को बहुत रमणीक देवपुर मिला । वह बहुत उत्तम और अनेक गुणों से युक्त था, उसमें पन्नों से जड़े हुए सुवर्ण के खंभे थे । अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में वह निवास करने लगा, सिंहासन पर बैठ गया । श्वेतछत्र और चमर युक्त, हार और कुण्डल से भूषित, गन्धर्वों से स्तुति किए जाते हुए एवं अप्सराओं से सेवित, बन्दियों से युक्त वह, दूसरे इन्द्र के समान लग रहा था ।
मुचुकुन्दपुर में निवास करने वाला सोमशर्मा नामक ब्राह्मण ने तीर्थ-यात्रा प्रसंग में भ्रमण करता हुआ उस राजा के जमाई को देखा, वह उसके पास गया । उस शोभन ने शीघ्र सिंहासन से उठकर ब्राह्मण को नमस्कार किया और अपने श्वसुर की क्षेम कुशल पूछी और अपनी स्त्री चन्द्रभागा तथा नगरवासियों की कुशल पूछी।
सोमशर्मा बोले – हे राजन् ! तुम्हारे श्वसुर के घर में कुशल है, चन्द्रभागा कुशल है और नगर में सर्वत्र कुशल है। हे राजन् ! आप अपना कुशल-वृत्तान्त कहिये। मुझको बड़ा आश्चर्य है, मैंने ऐसा विचित्र नगर कभी नहीं देखा । हे राजन् ! यह आपको कैसे मिला सो कहिए ।
शोभन बोला – कार्तिक कृष्णपक्ष में एकादशी होती है, हे द्विजेन्द्र ! उसका उपवास करने से यह अस्थिरपुर मुझको मिला है। हे द्विजोत्तम ! जिस तरह यह अटल हो जाए ऐसा यत्न करिये ।
ब्राह्मण बोले – हे राजेन्द्र ! यह स्थिर क्यों नहीं है और अटल किस तरह होगा ? वह मुझसे कहिये, मैं उसका निश्चय करूंगा ।
शोभन बोला – हे विप्र ! मैंने यह व्रत श्रद्धापूर्वक नहीं किया । अतः मैं इस नगर को अस्थिर समझता हूँ। इसके अटल होने का उपाय सुनिये । मुचुकुन्द राजा की सुन्दर चन्द्रभागा नाम की पुत्री है, उससे यह वृत्तान्त कहिये तब यह नगर स्थिर हो जाएगा ।
यह बात सुन कर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने सब वृत्तान्त चन्द्रभागा से कह दिया । ब्राह्मण का वचन सुनकर चन्द्रभागा आश्चर्य से प्रफुल्लित हो गई ।
ब्राह्मण से बोली – हे द्विज ! जो तुम कह रहे हो यह वृत्तान्त प्रत्यक्ष है अथवा स्वप्न ।
सोमशर्मा बोले – हे पुत्रि ! तुम्हारे पति को मैंने महावन में आँखों से देखा है और देवताओं के समान उसका प्रकाशवान् पुर भी मैंने देखा। उसने उसको अस्थिर बताया है, उसके अटल होने का उपाय करो।
चन्द्रभागा बोली – हे विप्रर्षि ! मुझको पति के दर्शन की अभिलाषा है, अतः मुझको वहाँ ले चलिये । हे द्विज ! अपने व्रत के पुण्य से मैं उस नगर को अटल कर दूँगी। जिस प्रकार हम दोनों का मिलाप हो जाय ऐसा उपाय करिये । बिछुड़े हुए का मिलाप कराने से बड़ा पुण्य होता है, यह सुनकर सोमशर्मा उसके साथ चला गया ।
मन्दराचल पर्वत के समीप वामदेव के आश्रम में सोमशर्मा गये, वामदेव ने उनका कहा हुआ सब वृत्तान्त सुना । उज्ज्वल चन्द्रभागा का वेद के मन्त्र से अभिषेक किया। ऋषि के मन्त्रों के प्रभाव और एकादशी के व्रत के प्रभाव से, चन्द्रभागा का दिव्य शरीर हो गया और दिव्य गति को प्राप्त हुई। प्रसन्नता से प्रफुल्लित नेत्र किये हुए अपने पति के समीप पहुँच गई ।
शोभन भी अपनी आयी हुई स्त्री को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे बुलाकर अपनी बायीं तरफ बैठा लिया। वह चन्द्रभागा अपने पति से प्रसन्न होकर सुन्दर वचन बोली –
“हे कान्त ! जो कुछ पुण्य मेरे पास है उसको सुनिये । जब मैं पिता के घर में ८ वर्ष की थी तभी से मैंने एकादशी का व्रत विधिपूर्वक और श्रद्धायुक्त चित्त से किया है। उस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारा नगर अचल हो जाएगा ।”
महाप्रलय तक सब कार्य पूर्ण होंगे। हे नृपशार्दूल ! इस प्रकार वह अपने पति के साथ आनन्द से रहने लगी । वह दिव्य रूप होकर सुन्दर आभूषणों से सुशोभित हुई सुख भोगने लगी, शोभन भी उसके साथ दिव्य रूप होकर विहार करने लगा । रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से वे मन्दराचल के शिखर पर आनन्द करने लगे।
यह एकादशी चिन्तामणि अथवा कामधेनु के समान है । हे नृपते ! यह रमा नाम की एकादशी तुम्हारे सामने कही। हे राजन् ! जो उत्तम मनुष्य इस व्रत को करते हैं और जो दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत करते हैं, निःसंदेह उनके ब्रह्महत्यादि पाप नाश को प्राप्त होते हैं ।
जैसे एकादशी शुक्लपक्ष की है वैसे ही कृष्णपक्ष की है इसमें भेद न समझना चाहिए । एकादशी का सेवन करने से मनुष्यों को सुख और मुक्ति मिलती है । जैसे काली और सफेद दोनों गायों का दूध एक सा होता है उसी प्रकार दोनों एकादशियों का व्रत एक सा होता है । जो मनुष्य एकादशी के व्रतों का माहात्म्य सुनता है वह सब पापों से छूट कर विष्णुलोक में आनन्द करता है ।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक प्रतापी राजा हुए जिनका नाम मुचुकुन्द था और उनकी मित्रता इन्द्र तक से थी। वो विष्णुभगवान के परमभक्त थे और उनके राज्य में सबको एकादशी करना अनिवार्य था। उनकी पुत्री का नाम चंद्रभागा था जिसका विवाह शोभन के साथ हुआ था।
एक बार अत्यंत दुर्बल शोभन भी एकादशी के अवसर पर ही ससुराल आ गया जिससे उसकी पत्नी चिंतित हो गई की वह एकादशी का उपवास कैसे करेगा ? अंततः शोभन ने एकादशी कर लिया लेकिन अगली सुबह होते ही उसकी मृत्यु हो गई। व्रत के प्रभाव से वह मन्दराचल पर्वत पर देवपुर का राजा बन गया।
एक समय तीर्थ यात्रा करते हुये मुचुकुंदपुर निवासी सोमशर्मा ब्राह्मण वहां पहुंचे तो शोभन को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। शोभन ने बताया की यह देवपुर उसे रमा एकादशी के प्रभाव से प्राप्त हुआ है किन्तु श्रद्धारहित करने से यह अस्थिर है। यदि चंद्रभागा को ये बात बताई जाय तो वो इसे लोक को अटल कर सकती है।
सोमशर्मा ने वापस आकर चंद्रभागा को शोभन के देवपुर का प्रसंग बताया तो वह वहां ले जाने लिये कहने लगी। सोमशर्मा उसे वामदेव मुनि के पास ले गये जिनके अभिमंत्रित जल छिड़कने से चंद्रभागा के शरीर भी दिव्य हो गया और वह देवपुर अपने पति शोभन के पास पहुँच गयी और अपने एकादशी व्रत के पुण्य से चंद्रभागा ने उस लोक को भी स्थिर कर दिया।
कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।