कार्तिक माहात्म्य - नवमोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 9

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 9 मूल संस्कृत में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 9 – जब इन्द्र और बृहस्पति भगवान शंकर के दर्शन के लिए गए, तो शंकर जी ने उनकी परीक्षा लेने हेतु जटाधारी रूप धारण किया। इन्द्र के अहंकार के कारण भगवान शिव से वाद-विवाद हुआ, भगवान शिव के नेत्रों से जो क्रोध निकला, उसे समुद्र में फेंक दिया, जिसके परिणामस्वरूप रुदन करता एक बालक उत्पन्न हुआ जिसे जलंधर कहा गया।

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कार्तिक माहात्म्य - अष्टमोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 मूल संस्कृत में और हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 – कार्तिक व्रत की पूर्णता उसके उद्यापन से होती है, जो विशिष्ट विधियों द्वारा सम्पन्न होता है। कार्तिक माह के आठवें अध्याय में नारद मुनि महाराज पृथु को बताते हैं कि उद्यापन के लिए तुलसी के आसपास सुंदर मंडप बनाकर भगवान विष्णु और उनके द्वारपालों की मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। उपवास, गीत-संगीत और व्रत की नियमित विधियों के पालन से पापों का नाश और विष्णु लोक की प्राप्ति संभव है। उद्यापन से व्रतकर्ता को भगवान की कृपा मिलती है और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।

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कार्तिक माहात्म्य - सप्तमोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 7

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 7

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 7 : कार्तिक और माघादि मासव्रत करने वालों के लिये कुछ विशेष नियम बताये गये हैं और अन्य सभी व्रतों में भी इनका पालन करना आवश्यक होता है। इस प्रकार कार्तिक माहात्म्य के सातवें अध्याय में मुख्य रूप से नियमों की चर्चा – कर्तव्य और अकर्तव्य, विहित और निषिद्ध, ग्राह्य और त्याज्य आदि की चर्चा की गयी है।

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कार्तिक माहात्म्य - षष्ठोध्यायः

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6 : कार्तिक, माघ आदि मासों में प्रातः स्नान मुख्य कर्म होता है, कार्तिक माहात्म्य के छठे अध्याय में मुख्य रूप से स्नान की विधि बताई गयी है। घर, जलाशय आदि में स्नान करने संबंधी फलों का उल्लेख संगम/तीर्थों में स्नान के फल को अनंत बताया गया है। स्नानोपरांत तर्पण करने का निर्देश भी दिया गया है जो महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु की पूजा तो करे ही साथ ही ब्राह्मण की पूजा भी करे ऐसा भी बताया गया है।

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कार्तिक माहात्म्य - पञ्चमोध्यायः

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 : इसमें नित्यकर्म अर्थात शौच, शुद्धि आदि के विधान का उल्लेख करते हुये विष्णु-शिव आदि की पूजा करने, भजन-कीर्तन-नृत्य आदि का विधान बताया गया है। देवताओं के लिये वर्जित पुष्पों का भी इस आलेख में वर्णन किया गया है।

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कार्तिक माहात्म्य - चर्तुथोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 4 : देवताओं का दुःख सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें शंखचूड़ वध करने का आश्वासन/वर दिया और मत्स्यावतार ग्रहण करके कश्यप ऋषि के अंजलि वाले जल में प्रकट हुये और बढ़ने लगे, महर्षि कश्यप ने उन्हें क्रमशः कमंडल,कूप, तालाब, समुद्र में रखा। फिर भगवान ने शंखचूड़ का वध करके वेद लिया।

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कार्तिक माहात्म्य - तृतीयोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 : Kartik Mahatmya

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 3 : Kartik Mahatmya – कार्तिक मास में व्रत करने वालों को सब प्रकार से धन, पुत्र-पुत्री आदि देते रहना और उनकी सभी आपत्तियों से रक्षा करना। हे धनपति कुबेर! मेरी आज्ञा के अनुसार तुम उनके धन-धान्य की वृद्धि करना क्योंकि इस प्रकार का आचरण करने वाला मनुष्य मेरा रूप धारण कर के जीवनमुक्त हो जाता है।

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कार्तिक माहात्म्य - द्वितीयोध्यायः ; कार्तिक माहात्म्य अध्याय २

कार्तिक माहात्म्य द्वितीयोध्यायः – Kartik Mahatmya Adhyay 2

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 2 – Kartik Mahatmya Adhyay 2 : सत्यभामा पति की मृत्यु हो गयी तो शोकाकुल होने पर भी उसने धैर्य धारण किया और पति की अंतिम क्रिया करने के उपरांत आजीवन दो विशेष व्रतों का पालन करती रही एक एकादशी और दूसरी कार्तिक। दूसरे अध्याय की कथा में यह स्पष्ट हो जाता है कि कार्तिक मास भी एक व्रत ही है।

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कार्तिक माहात्म्य - प्रथमोध्यायः - कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1 – Kartik mahatmya

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 1 – Kartik mahatmya : एकदास्वर्गलोकाद्वैनारदोद्वारिकांगतः ॥ दिदृक्षयाभगवतोदेवदेवस्य वेधसः ॥१॥
दृष्ट्वाकृष्णंततः पूजांकृत्वाभक्तिसमन्वितः॥ पारिजातस्यपुष्पैकं ददौभगवतेतदा ॥२॥
कृष्णोर्पितद्गृहीत्वातु रुक्मिण्यैदत्तवांस्तदा ॥ एतस्मिन्नंतरेचैव नारदोमुनिसत्तमः ॥३॥

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