योगिनी एकादशी व्रत कथा – Yogini ekadashi vrat katha

योगिनी एकादशी व्रत कथा - Yogini ekadashi vrat katha

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। योगिनी एकादशी की कथा में हेममाली नामक यक्ष की कथा है जो कुबेर का माली था। एक दिन कुबेर भगवान शिव की पूजा कर रहा था किन्तु यह पुष्प लेकर उपास्थित न हुआ जिसके कारण कुबेर ने इसे कुष्ठ और पत्नी वियोग का श्राप दे दिया। कालक्रम से योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से हेममाली शापमुक्त होता है। यहां योगिनी एकादशी व्रत की कथा दी गयी है।

सर्वप्रथम योगिनी (आषाढ़ कृष्ण पक्ष) एकादशी मूल माहात्म्य/कथा संस्कृत में दिया गया है तत्पश्चात हिन्दी में अर्थ, तत्पश्चात भावार्थ/सारांश एवं अंत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं। Yogini ekadashi vrat katha

योगिनी एकादशी व्रत कथा हिन्दी में

युधिष्ठिर बोले – ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की निर्जला एकादशी का माहात्म्य मैंने सुन लिया । आषाढ़ कृष्णा एकादशी का क्या नाम है । हे मधुसूदन ! कृपा करके मुझसे कहिए।

श्री कृष्ण जी बोले – हे राजन् ! व्रतों में उत्तम व्रत (योगिनी एकादशी) मैं तुमसे कहता हूँ । आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकाद‌शी का व्रत सब पापों को दूर करके भुक्ति और मुक्ति को देने वाला है । हे नृपश्रेष्ठ ! यह एकादशी व्रत बड़े – बड़े पापों का नाश करने वाली और संसाररूपी सागर में डूबे हुए मनुष्यों को पार लगाने वाली सनातनी है । हे नराधिप ! यह योगिनी त्रिलोकी में सारांश है। पुराणों में लिखी हुई पापनाशिनी कथा का मैं वर्णन करता हूँ ।

अलकापुरी का राजा कुबेर शिवजी का पूजन किया करते थे । उनका माली हेममाली नाम का यक्ष था । उसकी स्त्री सुन्दरी थी, उसका नाम विशालाक्षी था। एक दिन वह माली पत्नी हेममाली के स्नेह से युक्त होकर कामदेव के वशीभूत हो गया और वह मानसरोवर से फूल लाकर अपनी स्त्री के प्रेम में फँसकर घर पर ही ठहर गया, फूल देने के लिए कुबेर के स्थान पर नहीं गया । कुबेर देव मन्दिर में शिवजी का पूजन कर रहे थे ।

हे राजन् ! दोपहर पश्चात् भी वह पुष्प लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ । हेममाली अपने घर में स्त्री के साथ रमण कर रहा था । विलम्ब के कारण कुपित होकर

कुबेर बोले : हे यक्षो ! दुष्ट हेममाली क्यों नहीं आया? इसका निश्चय करो । इस प्रकार बारम्बार कहने लगे ।

यक्ष बोले – हे नृप ! वह स्त्री का प्रेमी अपने घर अपनी इच्छा से स्त्री के साथ खेल कर रहा है। इस वचन को सुनकर कुबेर क्रोध में भर गये और शीघ्रता से हेममाली को बुलाया। देर हो जाने के कारण वह माली भी भय से व्याकुल होकर वहाँ आया और कुबेर को नमस्कार करके सामने खड़ा हो गया।

उसको देखकर कुबेर के नेत्र क्रोध से लाल हो गये , क्रोध से होंठ फड़कने लगे और कुपित होकर कुबेर ने कहा –

“अरे पापी ! दुष्ट ! दुराचारी ! तूने देवता का अपराध किया । इसलिए तेरे शरीर में श्वेत कुष्ठ हो जाय और स्त्री से सदा वियोग रहे और इस स्थान से गिरकर नीच गति को प्राप्त हो जा।”

कुबेर के इस प्रकार कहने पर वह स्थान से गिर गया और श्वेत कुष्ठ से पीड़ित होकर दुखी हुआ। ऐसे भयंकर वन में गया जहाँ अन्न और जल नहीं मिलता था , न दिन में सुख था, न रात में नींद आती थी । छाया में शीत से और धूप में गर्मी से पीड़ित रहता था। परन्तु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरण – शक्ति दूर नहीं हुई , पापयुक्त होने पर भी पूर्व कर्म का स्मरण बना रहा।

एक बार वह भ्रमण करता हुआ हिमालय पर्वत पर चला गया । वहाँ पर तपस्वी मार्कण्डेय मुनीश्वर का दर्शन किया , हे राजन् ! उनकी आयु ब्रह्माजी के सात दिन के बराबर है । उनका आश्रम ब्रह्माजी की सभा के समान है।

वहाँ पर वह गया। उसने पाप किया था इससे दूर से ही उनके चरणों में प्रणाम किया। परोपकारी मार्कण्डेय मुनीश्वर ने उसको कुष्ठी देखकर उसे बुलाकर यह कहा :

तुमको कुष्ठ कैसे हो गया ? तुमने कौन सा बुरा काम किया? इस प्रकार मार्कण्डेय के पूछने पर वह बोला ।

हेममाली बोला – मैं कुबेर का सेवक हूँ, हेममाली मेरा नाम है। हे मुने ! मैं नित्य मानसरोवर से फूल लाकर । शिवजी के पूजन के समय कुबेर को देता था । एक दिन मुझको देर हो गई । क्योंकि कामदेव के वशीभूत होकर मैं स्त्री के साथ विषय-भोग में लग गया । हे मुने ! फिर कुपित होकर कुबेर ने मुझे शाप दे दिया जिससे मेरे शरीर में कुष्ठ हो गया और स्त्री से वियोग हो गया ।

अब कोई पुण्य उदय हो गया जिससे मैं आपके समीप आ गया । सज्जनों का चित्त स्वाभाविक परोपकारी होता है, इसलिए हे मुनिश्रेष्ठ ! मुझ पापी को उपदेश दीजिए ।

मार्कण्डेय जी बोले – तूने सत्य कहा है, झूठ नहीं बोला। इसलिए शुभ फल देने वाले व्रत का मैं उपदेश करूंगा । तू आषाढ़ कृष्णपक्ष की योगिनी नाम की एकादशी का व्रत कर । इस व्रत के प्रभाव से निश्चय कुष्ठ दूर हो जाएगा । मुनि के इस वाक्य को सुनकर उसने पृथ्वी पर प्रणाम किया। मुनि ने उसको उठाया तब वह बहुत प्रसन्न हुआ।

मार्कण्डेय जी के उपदेश से उसने यह उत्तम व्रत किया और व्रत के प्रभाव से वह देवरूप हो गया । स्त्री से उसका मिलाप हो गया और अच्छा सुख मिला ।

हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार योगिनी का व्रत मैंने तुमसे कहा । अ‌ट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है वह फल इस योगिनी एकादशी का व्रत करने वाले को मिलता है । हे नृप ! बड़े पापों को दूर करने वाली और बड़े पुण्यों का फल देने वाली आषाढ़ कृष्णा एकादशी का व्रत मैंने तुमसे कहा है ।

योगिनी एकादशी व्रत कथा का सारांश या भावार्थ

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। कथा के अनुसार अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परमभक्त थे। उनके यहाँ हेममाली नाम का एक यक्ष था जिसकी सुंदरी पत्नी का नाम विशालाक्षी था। हेममाली यक्ष शिवपूजन के लिये मानसरोवर से पुष्प लेकर कुबेर को नित्य देता था।

एक दिन काममोहित हेममाली दोपहर बाद भी पुष्प देने नहीं पहुंचा तो कुपित होकर कुबेर ने अन्य यक्षों को कारण ज्ञात करने के लिये कहा। अन्य यक्षों ने जब कुबेर को बताया कि हेममाली रमणरत है तो कुबेर और कुपित होकर तुरंत बुलाने के लिये कहा। भयभीत हेममाली कांपता हुआ कुबेर के सम्मुख प्रस्तुत हुआ तो कुबेर ने उसे श्राप दे दिया कि उसे श्वेत कुष्ठ हो जाये, स्त्री से सदा वियोग रहे और स्थानभ्रष्ट होकर नीचगति को प्राप्त हो जाये।

श्रापित हेममाली निर्जन वन में क्षुधातृष्णातुर होकर भटकने लगा केवल पूर्व शिव सेवा के पुण्य से उसकी स्मरणशक्ति बनी रही। एक दिन संयोग से वह हिमालय पर मार्कण्डेय मुनि के आश्रम के पास पहुंचा और अपने पाप की ग्लानि के कारण दूर से ही दंडवत प्रणाम किया तो मार्कण्डेय मुनि ने निकट बुलाकर दुःख का कारण पूछा और हेममाली ने सारा पूर्ववृतान्त सच-सच बता दिया।

सज्जन स्वभावतः परोपकारी होते हैं और मार्कण्डेय मुनि ने उसे श्रापमुक्ति हेतु योगिनी एकादशी का उपदेश दिया जिसको करने से हेममाली श्रापमुक्त हो गया।

  • योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में होती है।
  • इसको करने से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से कुष्ठादि सदृश रोगों और शापों का शमन होता है।
  • अ‌ट्ठासी हजार (88,000) ब्राह्मणों को भोजन कराने से जितना पुण्य होता है उतना पुण्य योगिनी एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है।

कथा पुराण में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *