कार्तिक माहात्म्य - पंचदशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में – वीरभद्र को भूमि पर गिरा देख शिवगणों में हाहाकार मच गया और वो वहां चले गये जहां भगवान शंकर थे। तब स्वयं भगवान शंकर युद्ध करने आये एवं जलंधर के साथ उनका युद्ध होने लगा, जब जलंधर को प्रतीत हुआ कि भगवान शिव अजेय हैं तो उसने माया का प्रयोग किया और सभी अचेत से हो गये

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माघशुक्ल जया एकादशी कथा - Jaya Ekadashi

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya ekadashi vrat katha

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya ekadashi vrat katha : माघ शुक्ला एकादशी, जिसे जया कहा जाता है, पापों को नष्ट करने वाली है। इस दिन व्रत करने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। वासुदेव की कृपा से यह एकादशी भक्तों को मोक्ष और स्वर्गलोक का सुख देती है।

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माघकृष्ण षट्तिला एकादशी कथा - Shattila ekadashi

षट्तिला एकादशी व्रत कथा – Shattila ekadashi vrat katha

षट्तिला एकादशी व्रत कथा – Shattila ekadashi vrat katha : माघ महीने की षट्तिला एकादशी पर विशेष पूजा और तिल का दान करते हुए पापों का नाश किया जा सकता है। इसमें स्नान, उपवास और भगवान कृष्ण का स्मरण आदि करना चाहिये। पाठ में एक ब्राह्मणी की कथा भी है, जिसने कठिन व्रतों से स्वर्ग प्राप्त किया किन्तु अन्नदान नहीं करने के कारण उसके घर में धन और अन्न की कमी थी। अंततः उसने षट्तिला एकादशी का व्रत किया, जिससे उसे समृद्धि प्राप्त हुई।

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कार्तिक माहात्म्य - चतुर्दशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में – कार्तिक माहात्म्य के चौदहवें अध्याय में नंदीश्वर, गणेश और कार्तिकेय इन तीनों के साथ कालनेमि, शुम्भ और निशुंभ के युद्ध का वर्णन है। जब दैत्यसेना पीड़ित होने लगी तब स्वयं जलंधर युद्ध करने आ गया। जलंधर ने वीरभद्र के मस्तक पर परिघ से प्रहार किया जिससे वह छिन्नमस्तक होकर रुधिर वमन करता हुआ भूमि पर गिर गया।

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कार्तिक माहात्म्य - षड्विंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 – उसी समय नारदजी आए और कहा कि धनेश्वर ने पुण्यात्माओं के दर्शन-संभाषण-स्पर्श आदि संसर्ग से पुण्य प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि धनेश्वर के पाप नष्ट हो चुके हैं क्योंकि यह पुण्य कर्म करने वाले लोगों के संपर्क में रहा है। इसके बाद यमराज ने धनेश्वर को नरक दिखाने की आज्ञा दी।

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पापांकुशा एकादशी व्रत कथा - Papankusha ekadashi vrat katha

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा – Papankusha ekadashi vrat katha

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा – Papankusha ekadashi vrat katha : आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। पापों के लिये यह एकादशी अंकुश के सामान है इसीलिये इसका नाम पापांकुशा एकादशी है। मनुष्य जब तक पापांकुशा एकादशी नहीं करता है तब तक उसके शरीर का पाप नष्ट नहीं होता। इस एकादशी के प्रभाव से मनोकामना की पूर्ति होती है एवं स्वर्ग/मोक्ष के द्वार भी खुल जाते हैं।

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पौषकृष्ण सफला एकादशी कथा - Safala ekadashi

सफला एकादशी व्रत कथा – Safala ekadashi vrat katha

सफला एकादशी व्रत कथा – Safala ekadashi vrat katha : पौष कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘सफला एकादशी’ है। इस दिन नारायण का पूजन करनी चाहिए और अच्छे ऋतु-फलों से भगवान का पूजन करना चाहिए; स्वच्छ नारियल, बिजौरे, जम्बीरी, अनार, सुपारी आदि से विधिपूर्वक पूजन करें। व्रत वाले दिन दीपदान करने और जागरण करने का भी विशेष महत्व है।

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देवशयनी एकादशी व्रत कथा - Devshayani ekadashi vrat katha

देवशयनी एकादशी व्रत कथा – Devshayani ekadashi vrat katha

देवशयनी एकादशी व्रत कथा – Devshayani ekadashi vrat katha : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी है। इसका एक अन्य नाम पद्मा एकादशी भी है। इसमें राजा मान्धाता की कथा है जिसमें एक बार उनके राज्य में वर्षा बंद होने से अकाल हो गया और प्रजासहित अंगिरा मुनि के उपदेश से देवशयनी एकादशी का व्रत किया जिससे वर्षा हुई और अकाल का निवारण हो गया।

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कार्तिक माहात्म्य - द्वाविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 – एक दिन विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के बाद भोजन बनाया, किन्तु कोई उसे चुरा ले गया। उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि पूजा का समय छूट जाता। अगले दिन भी भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने जाते समय भोजन फिर चुराया गया। इस क्रम में सात दिन बीत गये। विष्णुदास सोचने लगे – कौन ऐसा कर रहा है? उन्होंने रसोई की रक्षा करने का निश्चय किया।

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कार्तिक माहात्म्य - अष्टाविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 – प्राचीनकाल में भगवान शिव तथा माता पार्वती विहार कर रहे थे। उस समय उनके विहार में विघ्न उपस्थित करने के उद्देश्य से अग्निदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। विहार के आनन्द में विघ्न उपस्थित हो जाने के कारण कुपित होकर माता पार्वती ने सभी देवताओं को शाप दे दिया।

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