कार्तिक माहात्म्य त्रयोदशोऽध्यायः - कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 – इस कथा का एक अन्य आशय भी है वो यह है कि यदि आप धर्म का पालन करते भी हैं किन्तु देवताओं को अप्रसन्न कर रखा है तो वो असंतुष्ट देवता आपके विनाश का कारण बनते हैं। जलंधर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता था, रावण-कंस आदि की भांति न तो दुराचारी था न ही आततायी। फिर भी नारद जी ने देवताओं का हित साधने हेतु उस कर्म के लिये प्रेरित किया जो उसके विनाश का कारण बना।

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कार्तिक माहात्म्य - अष्टमोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 मूल संस्कृत में और हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 – कार्तिक व्रत की पूर्णता उसके उद्यापन से होती है, जो विशिष्ट विधियों द्वारा सम्पन्न होता है। कार्तिक माह के आठवें अध्याय में नारद मुनि महाराज पृथु को बताते हैं कि उद्यापन के लिए तुलसी के आसपास सुंदर मंडप बनाकर भगवान विष्णु और उनके द्वारपालों की मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। उपवास, गीत-संगीत और व्रत की नियमित विधियों के पालन से पापों का नाश और विष्णु लोक की प्राप्ति संभव है। उद्यापन से व्रतकर्ता को भगवान की कृपा मिलती है और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।

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कार्तिक माहात्म्य - पञ्चमोध्यायः

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 : इसमें नित्यकर्म अर्थात शौच, शुद्धि आदि के विधान का उल्लेख करते हुये विष्णु-शिव आदि की पूजा करने, भजन-कीर्तन-नृत्य आदि का विधान बताया गया है। देवताओं के लिये वर्जित पुष्पों का भी इस आलेख में वर्णन किया गया है।

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ऋषि पंचमी व्रत पूजा विधि और कथा

ऋषि पंचमी व्रत कथा

ऋषि पंचमी व्रत कथा : भाद्र शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी कहा जाता है। इस दिन व्रत पूर्वक अरुंधतिसहित सप्तर्षियों का पूजन करना चाहिये। पूजा करने के उपरांत कथा श्रवण करे और फिर विसर्जन दक्षिणा करे। इस व्रत का माहात्म्य चकित करने वाला है क्योंकि यह व्रत प्रायश्चित्तात्मक है। स्त्रियां जो रजस्वला संबंधी स्पर्शास्पर्श नियमादि का उल्लंघन करती हैं चाहे ज्ञात रूप से हो अथवा अज्ञात रूप से ऋषि पंचमी के प्रभाव से उस दोष का शमन हो जाता है।

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कार्तिक माहात्म्य - विंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 20

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 20 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 20 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में – हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें साधुवाद है, क्योंकि तुम सदैव भगवान विष्णु के भजन में तत्पर रहते हो और दीनों पर दया करते हो। आपने जो कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उसके आधे भाग का दान देने से आपको दूना पुण्य प्राप्त हुआ है और सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो गये हैं। इसके (कलहा) भी सैकड़ों जन्म के पाप समाप्त हो गये हैं, और अब यह दिव्य विमान के साथ वैकुण्ठधाम में जायेगी।

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कार्तिक माहात्म्य - पंचदशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 15 मूल संस्कृत में – वीरभद्र को भूमि पर गिरा देख शिवगणों में हाहाकार मच गया और वो वहां चले गये जहां भगवान शंकर थे। तब स्वयं भगवान शंकर युद्ध करने आये एवं जलंधर के साथ उनका युद्ध होने लगा, जब जलंधर को प्रतीत हुआ कि भगवान शिव अजेय हैं तो उसने माया का प्रयोग किया और सभी अचेत से हो गये

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स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है - Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai : आत्मकल्याण करने के लिये ही सभी को मानव शरीर की प्राप्ति होती है जिसमें द्विजाति को बड़े ही क्लेश होते हैं। किन्तु स्त्री और शूद्रों को आत्मकल्याण के लिये अधिक श्रम/क्लेश करने की आवश्यकता नहीं होती है, स्त्री पति की सेवा मात्र से और शूद्र द्विजों की सेवा मात्र से आत्मकल्याण के अधिकारी हो जाते हैं एवं इसी कारण धन्य कहे गये हैं। इसके साथ ही सतयुग, त्रेता, द्वापर इन तीनों युगों की तुलना में कलयुग में बहुत ही अल्प प्रयास मात्र नाम संकीर्तन से ही आत्मकल्याण हो जाता है इसलिये अन्य सभी युगों की तुलना में कलयुग श्रेष्ठ होता है।

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कार्तिक माहात्म्य अध्याय 11 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 11 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 11 – जलंधर भगवान विष्णु से लक्ष्मी और गणों सहित अपने निवास पर रहने का वर मांगता है, जो विष्णु स्वीकार कर लेते हैं। तत्पश्चात जलंधर त्रिभुवन पर शासन करता है, देव-दानव-यक्ष-गन्धर्व आदि सभी उसके वशवर्ती हो जाते हैं,देवताओं के सभी रत्नादि पर भी जलंधर का अधिकार हो जाता है। जलंधर प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करता है।

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कार्तिक माहात्म्य - द्वाविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 22 – एक दिन विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के बाद भोजन बनाया, किन्तु कोई उसे चुरा ले गया। उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि पूजा का समय छूट जाता। अगले दिन भी भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने जाते समय भोजन फिर चुराया गया। इस क्रम में सात दिन बीत गये। विष्णुदास सोचने लगे – कौन ऐसा कर रहा है? उन्होंने रसोई की रक्षा करने का निश्चय किया।

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पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा – Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा – Padmini ekadashi vrat katha : अधिकमास में प्रथम पक्ष शुक्ल होता है और द्वितीय पक्ष कृष्ण होता है। अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी एकादशी है। पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा में मुख्य रूप से एकादशी व्रत का माहात्म्य तो बताया ही गया है साथ ही एकादशी व्रत की विधि भी बताई गयी है। इस कथा में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के जन्म की भी कथा है।

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