पौषकृष्ण सफला एकादशी कथा - Safala ekadashi

सफला एकादशी व्रत कथा – Safala ekadashi vrat katha

सफला एकादशी व्रत कथा – Safala ekadashi vrat katha : पौष कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘सफला एकादशी’ है। इस दिन नारायण का पूजन करनी चाहिए और अच्छे ऋतु-फलों से भगवान का पूजन करना चाहिए; स्वच्छ नारियल, बिजौरे, जम्बीरी, अनार, सुपारी आदि से विधिपूर्वक पूजन करें। व्रत वाले दिन दीपदान करने और जागरण करने का भी विशेष महत्व है।

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इंदिरा एकादशी व्रत कथा - Indira ekadashi vrat katha

इंदिरा एकादशी व्रत कथा – Indira ekadashi vrat katha in hindi

इंदिरा एकादशी व्रत कथा – Indira ekadashi vrat katha in hindi : आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने कथा कहते हुये महिष्मति पूरी के राजा इन्द्रसेन के द्वारा इंदिरा एकादशी व्रत करने से उसके पिता के सद्गति होने का माहात्म्य बताया।

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कार्तिक माहात्म्य - सप्तविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 27

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 27 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 27 – भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेतपति धनेश्वर को नरकों का अनुभव कराने के बाद बताया कि इन नरकों में पापियों को कठोर दंड मिलता है, जैसे तप्तबालुक, अन्धतामिस्र, और कुम्भीपाक। जो लोग भूखों की सहायता नहीं करते या गरिमामयी वस्तुओं का अपमान करते हैं, वे इन नरकों में सज़ा के लिए जाते हैं। अंत में, धनेश्वर को यक्षलोक ले जाकर राजा बनाया गया, और उसके नाम पर तीर्थ बना, जिसे पुण्य स्थान माना गया। कार्तिक मास का व्रत मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम है।

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माघशुक्ल जया एकादशी कथा - Jaya Ekadashi

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya ekadashi vrat katha

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya ekadashi vrat katha : माघ शुक्ला एकादशी, जिसे जया कहा जाता है, पापों को नष्ट करने वाली है। इस दिन व्रत करने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। वासुदेव की कृपा से यह एकादशी भक्तों को मोक्ष और स्वर्गलोक का सुख देती है।

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कार्तिक माहात्म्य त्रयोदशोऽध्यायः - कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 13 – इस कथा का एक अन्य आशय भी है वो यह है कि यदि आप धर्म का पालन करते भी हैं किन्तु देवताओं को अप्रसन्न कर रखा है तो वो असंतुष्ट देवता आपके विनाश का कारण बनते हैं। जलंधर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता था, रावण-कंस आदि की भांति न तो दुराचारी था न ही आततायी। फिर भी नारद जी ने देवताओं का हित साधने हेतु उस कर्म के लिये प्रेरित किया जो उसके विनाश का कारण बना।

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अनन्त व्रत कथा - Anant Vrat Katha

अनन्त व्रत कथा – Anant Vrat Katha 1 Chap.

अनन्त व्रत कथा : भाद्र शुक्ल चतुर्दशी को अनंत व्रत – पूजा की जाती है और कथा श्रवण करके अनंत धारण किया जाता है। बात जब कथा श्रवण की आती है तो देववाणी अर्थात संस्कृत का विशेष महत्व व फल होता है।

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माघकृष्ण षट्तिला एकादशी कथा - Shattila ekadashi

षट्तिला एकादशी व्रत कथा – Shattila ekadashi vrat katha

षट्तिला एकादशी व्रत कथा – Shattila ekadashi vrat katha : माघ महीने की षट्तिला एकादशी पर विशेष पूजा और तिल का दान करते हुए पापों का नाश किया जा सकता है। इसमें स्नान, उपवास और भगवान कृष्ण का स्मरण आदि करना चाहिये। पाठ में एक ब्राह्मणी की कथा भी है, जिसने कठिन व्रतों से स्वर्ग प्राप्त किया किन्तु अन्नदान नहीं करने के कारण उसके घर में धन और अन्न की कमी थी। अंततः उसने षट्तिला एकादशी का व्रत किया, जिससे उसे समृद्धि प्राप्त हुई।

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स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है - Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai : आत्मकल्याण करने के लिये ही सभी को मानव शरीर की प्राप्ति होती है जिसमें द्विजाति को बड़े ही क्लेश होते हैं। किन्तु स्त्री और शूद्रों को आत्मकल्याण के लिये अधिक श्रम/क्लेश करने की आवश्यकता नहीं होती है, स्त्री पति की सेवा मात्र से और शूद्र द्विजों की सेवा मात्र से आत्मकल्याण के अधिकारी हो जाते हैं एवं इसी कारण धन्य कहे गये हैं। इसके साथ ही सतयुग, त्रेता, द्वापर इन तीनों युगों की तुलना में कलयुग में बहुत ही अल्प प्रयास मात्र नाम संकीर्तन से ही आत्मकल्याण हो जाता है इसलिये अन्य सभी युगों की तुलना में कलयुग श्रेष्ठ होता है।

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एकादशी व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा – संक्षेप में 26 एकादशी की व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा : सभी एकादशी के अलग-अलग नाम कहे गए हैं अरु सभी एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा भी विभिन्न नामों से की जाती है। सभी एकादशी के फल भी अलग-अलग बताये गए हैं जो नामानुसार परिलक्षित भी होते हैं। यहाँ सभी एकादशी के कथा संक्षेप में प्रस्तुत की जा रही है। यथाशीघ्र प्रत्येक एकादशी की अलग-अलग पूर्ण कथा भी प्रस्तुत की जाएगी।

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कार्तिक माहात्म्य - अष्टमोध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 मूल संस्कृत में और हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 8 – कार्तिक व्रत की पूर्णता उसके उद्यापन से होती है, जो विशिष्ट विधियों द्वारा सम्पन्न होता है। कार्तिक माह के आठवें अध्याय में नारद मुनि महाराज पृथु को बताते हैं कि उद्यापन के लिए तुलसी के आसपास सुंदर मंडप बनाकर भगवान विष्णु और उनके द्वारपालों की मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। उपवास, गीत-संगीत और व्रत की नियमित विधियों के पालन से पापों का नाश और विष्णु लोक की प्राप्ति संभव है। उद्यापन से व्रतकर्ता को भगवान की कृपा मिलती है और सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।

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