कार्तिक माहात्म्य - एकविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में – विष्णु पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा – सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की विधिपूर्वक आराधना करते हैं। इनमें कौन-सा साधन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, यह जानने के लिए पार्षदों ने पूर्वजन्म की कथा सुनाने लगे। उन्होंने बताया कि कांचीपुरी में चोल नामक एक राजा हुए थे, जिनके शासन में कोई दरिद्र या दुःखी नहीं था।

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जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - Jitiya Vrat Katha

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा – Jitiya Vrat Katha

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा : स्त्रियां पुत्र और पति की दीर्घायु कामना से जितिया का कठिन व्रत किया करती हैं। यह व्रत इतना कठिन होता है कि सामान्य व्रतों की तुलना में अधिक काल तक उपवास करना पड़ता है और उसमें भी बड़ी बात है कि जल आदि का ग्रहण करना भी निषिद्ध होता है।

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कार्तिक माहात्म्य - षड्विंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 26 – उसी समय नारदजी आए और कहा कि धनेश्वर ने पुण्यात्माओं के दर्शन-संभाषण-स्पर्श आदि संसर्ग से पुण्य प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि धनेश्वर के पाप नष्ट हो चुके हैं क्योंकि यह पुण्य कर्म करने वाले लोगों के संपर्क में रहा है। इसके बाद यमराज ने धनेश्वर को नरक दिखाने की आज्ञा दी।

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फाल्गुन शुक्ल आमलकी एकादशी व्रत कथा - Amalaki ekadashi vrat katha

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – Mokshada ekadashi vrat katha

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – Mokshada ekadashi vrat katha : मोक्षदा एकादशी व्रत की कथा राजा वैखानस से संबंधित है जिसमें राजा वैखानस अपने पिता के नरक में कष्ट भोगते देख कर मोक्ष के उपाय ढूंढते हैं। उन्हें मुनि का आशीर्वाद मिलता है, जो मोक्षदा एकादशी करने का सुझाव देते हैं। राजा वैखानस ने इस व्रत को विधिपूर्वक किया और भगवान विष्णु की उपासना की, जिसके बाद उन्होंने अपने पिता को स्वर्ग में स्थान प्राप्त करते देखा।

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कार्तिक माहात्म्य - चतुर्विंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 24

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 24 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 24 – ब्रह्मा ने यज्ञ करने का निर्णय लिया था और उस वक्त त्वरा और गायत्री के बीच विवाद हुआ। यज्ञ के समय त्वरा ने गायत्री को अपनी जगह बैठाने पर शाप दिया, कि सब देवता नदियां बन जाएंगे और गायत्री ने त्वरा को भी नदी बनने का श्राप दे दिया। इस पर देवता परेशान हुए और उनकी अनुपस्थिति के कारण यज्ञ में विघ्न आ गया। अंत में, सब देवता अपने अंशों से नदियाँ बने, जिसमें कृष्णा और वेणी शामिल हैं।

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पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा – Padmini ekadashi vrat katha

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा – Padmini ekadashi vrat katha : अधिकमास में प्रथम पक्ष शुक्ल होता है और द्वितीय पक्ष कृष्ण होता है। अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी एकादशी है। पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा में मुख्य रूप से एकादशी व्रत का माहात्म्य तो बताया ही गया है साथ ही एकादशी व्रत की विधि भी बताई गयी है। इस कथा में कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के जन्म की भी कथा है।

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वरुथिनी एकादशी व्रत कथा - Varuthini ekadashi vrat katha

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा – Varuthini ekadashi vrat katha

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा – Varuthini ekadashi vrat katha : वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम वरूथिनी एकादशी है। इस एकादशी की कथा में एकादशी व्रत की विशेष विधियों और नियमों का वर्णन किया गया है। यह एकादशी पुनर्जन्म के दुःख से मुक्ति प्रदान करती है। राजा मान्धाता, धुन्धुमार इसी व्रत के प्रभाव से स्वर्ग गये। भगवान शंकर भी इसी व्रत को करके ब्रह्मकपाल से मुक्त हुये।

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कार्तिक माहात्म्य - षष्ठोध्यायः

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 6 : कार्तिक, माघ आदि मासों में प्रातः स्नान मुख्य कर्म होता है, कार्तिक माहात्म्य के छठे अध्याय में मुख्य रूप से स्नान की विधि बताई गयी है। घर, जलाशय आदि में स्नान करने संबंधी फलों का उल्लेख संगम/तीर्थों में स्नान के फल को अनंत बताया गया है। स्नानोपरांत तर्पण करने का निर्देश भी दिया गया है जो महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु की पूजा तो करे ही साथ ही ब्राह्मण की पूजा भी करे ऐसा भी बताया गया है।

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पौषशुक्ल पुत्रदा एकादशी कथा - Putrada Ekadashi

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा – Putrada ekadashi vrat katha

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा – Putrada ekadashi vrat katha : पुत्रदा एकादशी की कथा में राजा सुकेतुमान पुत्रहीनता से दुखी था, लेकिन इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। मुनियों की कृपा से राजा ने यह व्रत किया और सफलतापूर्वक एक तेजस्वी पुत्र पाया। यह व्रत न केवल इस लोक में पुत्र देता है, बल्कि मृत्यु के उपरांत स्वर्ग में भी स्थान दिलाता है।

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