कार्तिक माहात्म्य - पञ्चमोध्यायः

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 5 : इसमें नित्यकर्म अर्थात शौच, शुद्धि आदि के विधान का उल्लेख करते हुये विष्णु-शिव आदि की पूजा करने, भजन-कीर्तन-नृत्य आदि का विधान बताया गया है। देवताओं के लिये वर्जित पुष्पों का भी इस आलेख में वर्णन किया गया है।

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अनन्त व्रत कथा - Anant Vrat Katha

अनन्त व्रत कथा – Anant Vrat Katha 1 Chap.

अनन्त व्रत कथा : भाद्र शुक्ल चतुर्दशी को अनंत व्रत – पूजा की जाती है और कथा श्रवण करके अनंत धारण किया जाता है। बात जब कथा श्रवण की आती है तो देववाणी अर्थात संस्कृत का विशेष महत्व व फल होता है।

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कार्तिक माहात्म्य - चतुर्दशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 14 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में – कार्तिक माहात्म्य के चौदहवें अध्याय में नंदीश्वर, गणेश और कार्तिकेय इन तीनों के साथ कालनेमि, शुम्भ और निशुंभ के युद्ध का वर्णन है। जब दैत्यसेना पीड़ित होने लगी तब स्वयं जलंधर युद्ध करने आ गया। जलंधर ने वीरभद्र के मस्तक पर परिघ से प्रहार किया जिससे वह छिन्नमस्तक होकर रुधिर वमन करता हुआ भूमि पर गिर गया।

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कार्तिक माहात्म्य - एकविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 21 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में – विष्णु पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा – सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की विधिपूर्वक आराधना करते हैं। इनमें कौन-सा साधन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है, यह जानने के लिए पार्षदों ने पूर्वजन्म की कथा सुनाने लगे। उन्होंने बताया कि कांचीपुरी में चोल नामक एक राजा हुए थे, जिनके शासन में कोई दरिद्र या दुःखी नहीं था।

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योगिनी एकादशी व्रत कथा - Yogini ekadashi vrat katha

योगिनी एकादशी व्रत कथा – Yogini ekadashi vrat katha

योगिनी एकादशी व्रत कथा – Yogini ekadashi vrat katha : योगिनी एकादशी की कथा में हेममाली नामक यक्ष की कथा है जो कुबेर का माली था। एक दिन कुबेर भगवान शिव की पूजा कर रहा था किन्तु यह पुष्प लेकर उपास्थित न हुआ जिसके कारण कुबेर ने इसे कुष्ठ और पत्नी वियोग का श्राप दे दिया। कालक्रम से योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से हेममाली शापमुक्त होता है।

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कार्तिक माहात्म्य अध्याय 10 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 10 मूल संस्कृत में, हिन्दी अर्थ सहित

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 10 – वृंदा से विवाहित जलंधर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था, एक बार संयोग से उसे राहु का कटा सिर दिखा जिसके बारे में उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से प्रश्न किया तो शुक्राचार्य ने समुद्रमंथन से अमृत-रत्नादि निकलने से लेकर अमृतपान करने वाले राहु का भगवान विष्णु द्वारा सिर कटने की पूरी कथा बताई, जिसे सुनकर जलंधर अत्यंत क्रुद्ध हुआ और दैत्यों की सेना जुटाकर देवताओं से युद्ध करने लगा।

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कार्तिक माहात्म्य - पंचविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 25

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 25 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 25 – सतयुग में देश, त्रेता में ग्राम तथा द्वापर में कुलों को दिया पुण्य या पाप मिलता था, लेकिन कलियुग में कर्त्ता को ही भोगना पड़ता है। संसर्ग से पाप व पुण्य दूसरे को मिलते हैं। मैथुन में एकत्र होना और एक साथ भोजन करने से पाप-पुण्य का फल मिलता है। जो पंक्ति में बैठे हुए भोजन करने वालों की पत्तल लांघता है, वह अपने पुण्य का भाग देता है। बिना ऋण उतारे मृत्यु को प्राप्त होने पर ऋण देने वाले पुण्य के भागी होते हैं। इस प्रकार दूसरों के लिए पुण्य या पाप बिना दिए भी मिल सकते हैं, किन्तु यह नियम कलियुग में लागू नहीं होते। कलियुग में तो कर्त्ता को ही अपने पाप व पुण्य भोगने पड़ते हैं।

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कामिका एकादशी व्रत कथा - kamika ekadashi vrat katha in hindi

कामिका एकादशी व्रत कथा – kamika ekadashi vrat katha in hindi

कामिका एकादशी व्रत कथा – kamika ekadashi vrat katha in hindi : श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस एकादशी की कथा में विशेषतः एकादशी व्रत का माहात्म्य वर्णित है जिसको सुनने मात्र से भी वाजपेय यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। ब्रह्महत्या – गर्भहत्या जैसे जघन्य पाप भी इस एकादशी के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा में भगवान विष्णु को तुलसी अतिप्रिय है यह भी बताया गया है।

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स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है - Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों है – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai

स्त्री, शूद्र और कलयुग श्रेष्ठ क्यों – Stri, Shudra & Kalyug kyu shreshth hai : आत्मकल्याण करने के लिये ही सभी को मानव शरीर की प्राप्ति होती है जिसमें द्विजाति को बड़े ही क्लेश होते हैं। किन्तु स्त्री और शूद्रों को आत्मकल्याण के लिये अधिक श्रम/क्लेश करने की आवश्यकता नहीं होती है, स्त्री पति की सेवा मात्र से और शूद्र द्विजों की सेवा मात्र से आत्मकल्याण के अधिकारी हो जाते हैं एवं इसी कारण धन्य कहे गये हैं। इसके साथ ही सतयुग, त्रेता, द्वापर इन तीनों युगों की तुलना में कलयुग में बहुत ही अल्प प्रयास मात्र नाम संकीर्तन से ही आत्मकल्याण हो जाता है इसलिये अन्य सभी युगों की तुलना में कलयुग श्रेष्ठ होता है।

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कार्तिक माहात्म्य - अष्टाविंशोऽध्यायः, कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 मूल संस्कृत में, अर्थ हिन्दी में

कार्तिक माहात्म्य अध्याय 28 – प्राचीनकाल में भगवान शिव तथा माता पार्वती विहार कर रहे थे। उस समय उनके विहार में विघ्न उपस्थित करने के उद्देश्य से अग्निदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। विहार के आनन्द में विघ्न उपस्थित हो जाने के कारण कुपित होकर माता पार्वती ने सभी देवताओं को शाप दे दिया।

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